Wednesday , June 24 2026

लेख/स्तम्भ

क्या सनातन का विरोध और अपमान ही सेक्युलर राजनीति है? 

(मृत्युंजय दीक्षित) भारत विभाजन के साथ मिली स्वाधीनता से कोई सबक न लेते हुए भारत की राजनीति आज तक तुष्टिकरण के आधार पर चलती रही है। मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए तथाकथित समाजवादी लालू ने सम्मानित नेता आडवाणी जी को जेल में डाल दिया और एक कदम …

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भारतीय राजनीति में उपनामों की परंपरा : डॉ अतुल मलिकराम

भारत हो या विश्व का कोई भी देश, राजनीति में राजनेताओं को दिए जाने वाले उपनाम केवल संबोधन के लिए नहीं होते, बल्कि जनता के मन में बसे उनके व्यक्तित्व, योगदान और छवि का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। आज़ादी के पहले या बाद में, यह परंपरा निरंतर चलती रही है। …

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वैवाहिक संस्कार में घुलते नए लोकाचार

डॉ. एस. के. गोपाल  भारतीय जीवन में विवाह केवल एक उत्सव नहीं बल्कि उस सांस्कृतिक श्रृंखला का केंद्रीय संस्कार है, जिसकी डोर पीढ़ियों से चली आ रही है। विवाह का अर्थ मात्र दो व्यक्तियों का साथ आना नहीं, बल्कि दो कुलों, दो परिवारों और दो आत्माओं का ऐसा मिलन है, …

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अनदेखी से अवरुद्ध होती लोकतंत्र की धड़कन

डॉ. एस. के. गोपाल लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया का नाम नहीं है; यह सम्मान, सहभागिता और संस्थागत संतुलन की सतत साधना है। जब संस्कृति, भाषा और कलाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्र उपेक्षा के शिकार होने लगें, तो वह केवल सांस्कृतिक क्षय नहीं होता, वह लोकतंत्र की धड़कन को धीमा करने वाला …

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गली–गली में इतिहास, सड़क–सड़क में राजनीति

व्यंग्यबाण डॉ. एस. के. गोपाल इतिहासविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन कहा करते थे- “जहाँ संसार की प्राचीन सभ्यताएँ थीं, वहाँ गलियाँ थीं, सड़कें नहीं।” उनकी बात में सिर्फ इतिहास नहीं, भारतीय समाज का पूरा मनोविज्ञान छुपा है। गली- हमारे शहरों की आत्मा, मोहल्लों का चरित्र और जीवन का वह रास्ता …

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रचनात्मक हस्तक्षेप है ओटीटी सामग्री के नियमन की मांग

डॉ. एस.के. गोपाल इस वर्ष हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के रीवा अधिवेशन में ओटीटी प्लेटफार्मों और गेमिंग एप्स के नियमन की जो मांग उठाई गई, वह केवल सांस्कृतिक शुचिता का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर मुद्दा है। परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव …

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विधायी मूल्यों का संरक्षण आवश्यक

डॉ. एस. के. गोपाल जहाँ आज उत्तर प्रदेश का भव्य विधान भवन स्वाभिमान से खड़ा है, कभी वहाँ एक खुला मैदान हुआ करता था। अंग्रेजी शासन के समय तक इलाहाबाद ही प्रदेश की राजधानी थी और समस्त प्रशासनिक कार्य वहीं से संचालित होते थे। परंतु जैसे-जैसे अंग्रेजों का विस्तार बढ़ता …

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मानवीय दायित्व है शरणागत की रक्षा

डॉ. एस. के. गोपाल भारतीय परम्परा में शरणागत की रक्षा केवल सांस्कृतिक आदर्श नहीं, बल्कि इतिहास से लेकर आधुनिक संवैधानिक ढाँचे तक गहराई से स्थापित सिद्धांत है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में स्पष्ट कहा है- “जौ सभीति आवा सरनाई। रखिहहुँ ताहि प्राण की नाई।।’’ अर्थात् जो भयभीत होकर शरण ले, …

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पाकिस्तानी सेना प्रमुख की बढ़ी ताकत, सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा ?

मृत्युंजय दीक्षित  दरकता पाकिस्तान कई नागरिक समस्याओं जैसे महंगाई, बेरोजगारी, दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुओं को जुटाने की जद्दोज़हद से जूझ रहा है। बलोचिस्तान, खैबरपख्तूनवा जैसे प्रान्त सुलग रहे हैं। हुक्मरान इनको दबाने के लिए सीमाओं पर आग लगा रहे हैं। इस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का झुकाव …

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बिहार में एनडीए की बम्पर जीत का राजनीतिक संदेश

डॉ. एस.के. गोपाल बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किया है। एनडीए की प्रचंड जीत केवल सीटों का अंतर नहीं, बल्कि सामाजिक–राजनीतिक सोच में आए मौलिक परिवर्तन का संकेत है। मतदाताओं ने इस बार स्थिर शासन, अनुभव और प्रशासनिक विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी, …

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