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RGIPT : जियोसाइंस से ग्रीन हाइड्रोजन तक, विद्यार्थियों को मिलेंगे नए शोध अवसर


शोध, नवाचार और उद्योग से बनेगा RGIPT का नया मॉडल : प्रो. हरीश हिरानी

पढ़ाई के साथ शोध और उद्योग से जुड़ेंगे विद्यार्थी, जियोसाइंस व ग्रीन हाइड्रोजन के नए कार्यक्रम शुरू

अमेठी (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान (आरजीआईपीटी) जायस शिक्षा, शोध और उद्योग के बीच समन्वय मजबूत करने की दिशा में नई पहल कर रहा है। संस्थान में एमएससी जियोसाइंस और ग्रीन हाइड्रोजन पर शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही विद्यार्थियों को उद्योग प्रशिक्षण, मेंटरशिप और अनुभव आधारित सीखने के अवसर दिए जा रहे हैं।

संस्थान के निदेशक प्रो. हरीश हिरानी ने कहा कि संस्थान को उच्च गुणवत्ता वाला और अन्य संस्थानों से अलग बनाने के उद्देश्य से लगातार नए शैक्षणिक कार्यक्रम, शोध परियोजनाएं और उद्योग आधारित प्रशिक्षण शुरू किए जा रहे हैं। संस्थान का जोर अब केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान, शोध, नवाचार और उद्योग की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने पर है।

उन्होंने बताया कि संस्थान इस वर्ष एमएससी जियोसाइंस का नया कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है। यह कार्यक्रम ऊर्जा क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। भारत में ऊर्जा संसाधनों की खोज और उनके बेहतर उपयोग के लिए जियोसाइंस विशेषज्ञों की आवश्यकता है। कार्यक्रम के शुरुआती तीन सेमेस्टर में विद्यार्थियों को जियोसाइंस से संबंधित विषयों की पढ़ाई कराई जाएगी, जबकि अंतिम छह महीने के सेमेस्टर में उन्हें प्रोजेक्ट करने का अवसर मिलेगा।

इस कार्यक्रम की खासियत यह होगी कि अंतिम सेमेस्टर में विद्यार्थी संस्थान के किसी भी संबंधित विभाग के साथ अपना प्रोजेक्ट कर सकेंगे। वे कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसे विभागों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। इससे उन्हें जियोसाइंस के साथ अन्य तकनीकी क्षेत्रों का व्यावहारिक ज्ञान भी मिलेगा। प्रो. हिरानी के मुताबिक, इससे विद्यार्थियों के सामने रोजगार के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में पीएचडी करने के अवसर भी बढ़ेंगे।

शनिवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम मंत्रालय की पहल से स्थापित आरजीआईपीटी की कोशिश है कि उसकी पहचान अन्य संस्थानों से अलग हो। संस्थान की स्थापना वर्ष 2008 में हुई थी और शुरुआत में प्रवेश के लिए जेईई एडवांस पर मुख्य जोर था। कोविड काल के दौरान जेईई मेन्स के माध्यम से भी प्रवेश की व्यवस्था शुरू की गई। पिछले वर्ष जेईई एडवांस में शामिल विद्यार्थियों को भी आवेदन का अवसर दिया गया था, जिसका काफी अच्छा प्रतिसाद मिला और करीब 900 विद्यार्थी प्रतीक्षा सूची में रहे।

ग्रीन हाइड्रोजन पर शोध को दिया जा रहा बढ़ावा

निदेशक ने बताया कि आरजीआईपीटी में ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी कई शोध परियोजनाओं पर काम चल रहा है। संस्थान की अलग-अलग टीमें उद्योगों के साथ मिलकर परियोजनाएं तैयार कर रही हैं। कुछ परियोजनाएं सीधे उद्योगों की जरूरतों से जुड़ी हैं, जबकि संस्थान के ऐसे संकाय सदस्य भी हाइड्रोजन पर शोध कर रहे हैं, जिन्होंने इसी क्षेत्र में पीएचडी की है।

उन्होंने बताया कि संस्थान में इलेक्ट्रोलाइजर सहित हाइड्रोजन उत्पादन से जुड़ी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार की हाइड्रोजन नीति को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप कुछ प्रस्ताव भी तैयार किए हैं। उनका कहना था कि शोध को केवल कागजों और प्रयोगशाला तक सीमित रखने के बजाय वास्तविक प्लांट के माध्यम से प्रदर्शित करने का प्रयास किया जा रहा है।

आरजीआईपीटी में हाइड्रोजन उत्पादन के लिए स्थान उपलब्ध कराया गया है और इस दिशा में काम आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही हाइड्रोजन उत्पादन के जैविक मार्ग पर भी शोध किया जा रहा है। जैविक कचरे और अन्य स्रोतों से गैस उत्पादन की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक तकनीक विकसित की जा सके।

प्रो. हिरानी ने कहा कि हाइड्रोजन का अणु बहुत छोटा होने के कारण उसका सुरक्षित भंडारण अभी भी चुनौती है। इसलिए हाइड्रोजन को किसी अन्य उपयोगी रूप में परिवर्तित कर उसकी वैल्यू चेन विकसित करने पर भी शोध की जरूरत है। संस्थान इस दिशा में विभिन्न विकल्पों पर काम कर रहा है।

बायोगैस प्लांट की क्षमता तीन गुना बढ़ी

उन्होंने बताया कि संस्थान में बायोगैस के क्षेत्र में भी प्रयोग किए जा रहे हैं। कुछ महीने पहले जिस क्षमता के प्लांट पर काम शुरू किया गया था, शोध और तकनीकी सुधार के बाद उसकी क्षमता करीब तीन गुना तक बढ़ाई जा चुकी है। संस्थान का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिसका व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।

उन्होंने बताया कि पहले संस्थान के मेस में गैस की जरूरत के लिए आधा या एक सिलेंडर तक की आपूर्ति की जाती थी। लेकिन अब उत्पादन और तकनीकी क्षमता में सुधार के बाद तीन सिलेंडर तक की आपूर्ति संभव हो रही है। इसे शोध एवं तकनीकी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में कार्बन क्रेडिट जैसे विकल्पों के माध्यम से ऐसी परियोजनाओं की आर्थिक उपयोगिता भी बढ़ाई जा सकती है।

परीक्षा से आगे बढ़कर अनुभव आधारित सीखने पर जोर

प्रो. हिरानी ने कहा कि आज के दौर में केवल परीक्षा पास करके डिग्री और अच्छे ग्रेड हासिल करना पर्याप्त नहीं है। उद्योग जगत अब यह देखता है कि विद्यार्थी ने जो पढ़ा है, उसे वास्तविक परिस्थितियों में किस तरह लागू किया। इसलिए संस्थान ने अपने शैक्षणिक कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।

उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को अपना दायरा व्यापक रखते हुए खुले दिमाग से सीखना चाहिए। उनमें रचनात्मकता, जिज्ञासा और समस्या समाधान की क्षमता विकसित होना जरूरी है। आज की समस्या जरूरी नहीं कि चार वर्ष बाद भी वही रहे। इसलिए विद्यार्थियों को किसी समस्या का मौजूदा समाधान याद करने के बजाय बदलती परिस्थितियों में नई समस्या का समाधान खोजने की क्षमता विकसित करनी होगी।

उन्होंने बताया कि संस्थान ने शैक्षणिक गतिविधियों के साथ विद्यार्थियों को उद्योगों से जोड़ने की व्यवस्था की है। इसके लिए प्रशिक्षण और प्लेसमेंट से जुड़े अधिकारियों की टीम विद्यार्थियों को उद्योगों के साथ जोड़ने में सहयोग करेगी। प्रथम वर्ष के बाद करीब दो सप्ताह और द्वितीय वर्ष के बाद करीब चार सप्ताह के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार उद्योग में जाकर सीखने का अवसर दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि संस्थान का प्रयास है कि चार वर्ष बाद जब विद्यार्थी यहां से निकलें तो उनके पास केवल डिग्री और ग्रेड न हों, बल्कि वे यह भी बता सकें कि उन्होंने क्या सीखा, उसे किस तरह लागू किया और उससे क्या परिणाम हासिल हुआ।

हर विद्यार्थी को मिलेगा मेंटर, उद्योग विशेषज्ञ भी करेंगे मार्गदर्शन

प्रो. हिरानी ने बताया कि विद्यार्थियों के बेहतर मार्गदर्शन के लिए इस वर्ष नई मेंटरशिप व्यवस्था शुरू की गई है। प्रत्येक विद्यार्थी के लिए एक संकाय सदस्य को मेंटर बनाया गया है। मेंटर नियमित रूप से विद्यार्थियों से बातचीत करेंगे और उनकी पढ़ाई, करियर तथा अन्य समस्याओं को समझकर उनका मार्गदर्शन करेंगे।

प्रत्येक सेमेस्टर में कम से कम दो बार मेंटर और विद्यार्थियों की बैठक कराने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य ऐसा सहज वातावरण तैयार करना है, जिसमें विद्यार्थी बिना झिझक अपनी बात रख सकें। उन्होंने कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों के लिए परिवार के अभिभावक की तरह होते हैं और संस्थान में शिक्षक-विद्यार्थी संवाद को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

इसके साथ ही उद्योग जगत के विशेषज्ञों को भी विद्यार्थियों की मेंटरशिप से जोड़ने की पहल की गई है। विभिन्न उद्योगों के करीब 12 विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों के मार्गदर्शन के लिए अपनी सहमति दी है। उनके नाम और संपर्क नंबर विद्यार्थियों के साथ साझा किए जाएंगे। विद्यार्थी अपनी रुचि और करियर के क्षेत्र के अनुसार संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क कर सकेंगे और उद्योग की वास्तविक कार्यप्रणाली, आवश्यक कौशल तथा भविष्य की संभावनाओं के बारे में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकेंगे।

प्रो. हिरानी ने कहा कि आरजीआईपीटी का लक्ष्य विद्यार्थियों को केवल डिग्रीधारी बनाना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा सक्षम और आत्मविश्वासी युवा बनाना है, जो बदलती तकनीक, ऊर्जा क्षेत्र और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप खुद को लगातार विकसित कर सके। संस्थान में शिक्षा, शोध और उद्योग के बीच मजबूत समन्वय स्थापित कर विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है।