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पत्रकारिता में विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का संकट – प्रो. संजय द्विवेदी

विश्व संवाद केंद्र ने मनाई आदि संवादवाहक नारद जी की जयंती

मुरादाबाद। विश्व संवाद केंद्र ने नारद जयंती के शुभ अवसर पर आरएसडी अकैडमी में पत्रकार गोष्ठी का आयोजन किया। “राष्ट्र परिवर्तन में पत्रकार की भूमिका” पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने अपने विचार रखे। देवऋषि नारद एवं भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, मुख्य अतिथि आरएसडी एकेडमी के निदेशक डॉ. विनोद कुमार मौजूद रहे एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता आईएफटीएम विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन विभाग के विभाग अध्यक्ष प्रोफ़ेसर राजेश शुक्ला द्वारा की गई। संचालन डा. माधव शर्मा ने किया।

गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए डॉ. विशेष गुप्ता द्वारा विषय प्रस्तुति की गई। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि सृष्टि के प्रथम संवादवाहक के रूप में देवऋषि नारद जी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। वे भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक हैं हम नारद जी का पत्रकार रूप देखें कि देवता, असुर, साधारण व्यक्ति तक जहां आवश्यकता होती थी वहां नारदजी उपस्थित होते थे। वह शत्रु और मित्र दोनों में ही लोकप्रिय थे। आनंद, भक्ति, विनम्रता, ज्ञान कौशल के कारण उन्हें देवऋषि की पदवी प्राप्त थी। इस अवसर पर विभाग प्रचार प्रमुख पवन जैन ने कहा पत्रकार को समाज के सजग प्रहरी के रूप में देखा जाता है।

मुख्य वक्ता प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी (महानिदेशक भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली) ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि भारत की पत्रकारिता का भारतीयकरण किये जाने की महती आवश्यकता है। वास्तव में पत्रकारिता शब्द पश्चिम से आया है। भारतीय संस्कृति की विशेषता विश्वमंगल लोक कल्याण जनसंचार संवाद है। नारद जी के कम्युनिकेशन में लोक कल्याण होता है। उन्होंने कहाकि भारतीय मूल्यों के आधार पर होने वाली पत्रकारिता के द्वारा ही नवभारत का निर्माण होगा। नारद जी लगातार भ्रमण करते थे। आज पत्रकारों को उनके इस गुण से सीखना चाहिए। पत्रकार अगर बैठ जाएगा, तो समाज से उसका संपर्क टूट जायेगा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का संकट है। पश्चिम के मूल्यों के कारण मीडिया में नकारात्मकता का भाव आया है। आज पत्रकार होने का मतलब ही नकारात्मकता को खोजना हो गया है। इसका कारण है कि हम अपने मूल्यों को भूलकर पश्चिम की पत्रकारिता को अपना रहे हैं। आईआईएमसी के महानिदेशक के अनुसार आज समाज के हर वर्ग में गिरावट आई है। समाज से अलग पत्रकारिता नहीं हो सकती। इसलिए सारी अपेक्षाएं पत्रकारों से करना ठीक नहीं है। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारों के अंदर सामाजिक सरोकार और समाज के लिए कुछ करने की संवेदना होती है। पत्रकारिता कठिन मार्ग है। कोरोना काल में अपनी जान को जोखिम में डालकर पत्रकार पत्रकारिता करते हैं। स्वतंत्रता के आंदोलन में भी पत्रकारों ने अहम भूमिका निभाई थी।

कार्यक्रम अध्यक्ष प्रोफेसर राजेश शुक्ला ने कहाकि मीडिया श्रेष्ठ शिक्षक है, जब हम कोई बात अपने विद्यार्थी से कहते हैं तो वह 10 में से 8 बातें नहीं मानता। आप अपने बच्चे को कुछ सिखाते हैं उनमें 10 में से 9 बातें नहीं मानता है, जबकि मीडिया कि 10 में से 8 बातों पर वह विश्वास करता है। इसलिए मीडिया को निष्पक्ष और सत्य का पक्ष प्रस्तुत करना चाहिये। मीडिया शिक्षा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया फील्ड अपार संभावनाओं से भरा है, किसी भी अन्य उद्योग की तुलना में इसकी विकास दर अधिक है यानि इसमें रोजगार के अत्यधिक अवसर हैं। आज ग्राफिक्स, एनिमेशन गेम, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न्यू मीडिया और नागरिक पत्रकारिता ने नौकरियों के अवसर पैदा कर दिए हैं।महानगर प्रचार प्रमुख संजीव चौधरी ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम गायन के द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में डॉ. काव्य सौरभ जैमिनी, डॉ मनोज रस्तोगी, एचपी शर्मा, संतोष गुप्ता, तरुण पाराशर, विशाल शुक्ला, राजीव हरि, राजन राज, सुधीर गोयल, दीपक प्रजापति, रवि तिवारी, दुष्यंत बाबा, अमित जायसवाल, महिपाल सिंह, नीरज सोलंकी, सागर रस्तोगी, विपुल जैन, हिमांशु शुक्ला, नंदिनी, काजल सैनी, धर्मेंद्र अग्रवाल, मोह. इमरान, फरदीन खान, मोहम्मद सैफअली, डॉ मुदित सिंघल, हरिमोहन गुप्ता डॉ. सत्यवीर सिंह, स्पर्श गुप्ता, प्रतीक गौतम, सचिन कुमार, नवनीत शर्मा, राकेश मिश्रा आदि प्रमुख पत्रकार एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।