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तुलना का दंश : जब शब्द बन जाते हैं मानसिक हिंसा

(भगवान प्रसाद गौड़)

हिंसा का अर्थ केवल शारीरिक आघात तक सीमित नहीं है। किसी व्यक्ति के मन, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को चोट पहुँचाने वाला व्यवहार भी हिंसा का ही एक रूप है। दुर्भाग्य से आधुनिक समाज में एक ऐसी मानसिक हिंसा निरंतर बढ़ रही है जिसे सामान्य और आवश्यक व्यवहार मान लिया गया है। यह है — तुलना की संस्कृति।

आज परिवारों, विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और निजी कंपनियों में तुलना को प्रेरणा का साधन समझा जाता है। अक्सर यह कहा जाता है कि “देखो, वह तुमसे बेहतर है”, “तुम्हारे मित्र ने अधिक अंक प्राप्त किए हैं” या “तुम्हारा सहकर्मी तुमसे अधिक सफल है।” पहली दृष्टि में ये सामान्य टिप्पणियाँ प्रतीत हो सकती हैं, किंतु वास्तव में ये व्यक्ति के आत्मसम्मान पर ऐसे अदृश्य प्रहार हैं जिनके घाव लंबे समय तक बने रहते हैं।

वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर सामाजिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। विद्यार्थियों में तनाव, चिंता और अवसाद की बढ़ती घटनाएँ, कार्यस्थलों पर मानसिक थकान और बढ़ता दबाव इसी संकट की ओर संकेत करते हैं। इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, किंतु निरंतर तुलना की प्रवृत्ति भी एक महत्वपूर्ण कारण है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

कोचिंग संस्थानों में रैंक और परिणामों की प्रतिस्पर्धा ने विद्यार्थियों को ऐसी दौड़ में खड़ा कर दिया है जहाँ उनकी पहचान केवल अंकों से निर्धारित होने लगी है। विद्यालयों में भी बच्चों की विशिष्ट प्रतिभाओं और रुचियों को समझने के बजाय उन्हें दूसरों के पैमानों पर परखा जाता है। वहीं कॉर्पोरेट जगत में कर्मचारियों का मूल्यांकन अक्सर एक-दूसरे से तुलना कर किया जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति स्वयं को एक संवेदनशील इंसान नहीं, बल्कि एक प्रदर्शन सूचकांक या आंकड़े के रूप में देखने लगता है।

प्रश्न यह है कि क्या किसी व्यक्ति की गरिमा को बार-बार ठेस पहुँचाना मानसिक हिंसा की श्रेणी में नहीं आता?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन का अधिकार प्रदान करता है। न्यायपालिका भी अनेक अवसरों पर मानवीय गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग मान चुकी है। ऐसे में यदि विद्यालय, कोचिंग संस्थान या कार्यस्थल ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देते हैं जहाँ व्यक्ति लगातार तुलना और मानसिक दबाव का सामना करे, तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन जाता है।

यह समझना आवश्यक है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और अपमानजनक तुलना में मौलिक अंतर है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए प्रेरित करती है, जबकि तुलना यह संदेश देती है कि उसका मूल्य किसी दूसरे की उपलब्धियों से तय होता है। प्रेरणा आत्मविश्वास को सशक्त बनाती है, जबकि तुलना उसे भीतर से क्षीण कर देती है।

समाज, परिवार, शिक्षक और संस्थान सभी को इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा। बच्चों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि सफलता का अर्थ किसी और से आगे निकलना नहीं, बल्कि स्वयं के बेहतर स्वरूप तक पहुँचना है। कर्मचारियों को यह महसूस कराना होगा कि उनकी पहचान केवल लक्ष्य और परिणामों से नहीं, बल्कि उनके योगदान, परिश्रम और मानवीय गरिमा से भी जुड़ी है।

समय की माँग है कि सरकार, शिक्षा नियामक संस्थाएँ, मानवाधिकार संगठन और न्यायपालिका इस विषय पर गंभीर विमर्श प्रारंभ करें। विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और कार्यस्थलों में होने वाली अपमानजनक तुलना के मानसिक प्रभावों का अध्ययन कराया जाए तथा ऐसी नीतियाँ विकसित की जाएँ जो व्यक्ति की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा सुनिश्चित कर सकें।

जब देश मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब तुलना की इस अदृश्य हिंसा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। संभव है कि यह व्यवहार कानून की दृष्टि में अपराध न हो, किंतु इसके दुष्परिणाम समाज में स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।

यदि किसी बच्चे का आत्मविश्वास टूट रहा है, किसी युवा की उम्मीदें बिखर रही हैं या कोई कर्मचारी स्वयं को निरर्थक महसूस करने लगा है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक विफलता का संकेत है।

तुलना को प्रेरणा का पर्याय मानने वाली सोच पर पुनर्विचार का समय आ चुका है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओं, परिस्थितियों और संभावनाओं में अद्वितीय है। उसकी तुलना किसी दूसरे से नहीं, बल्कि उसके अपने विकास और प्रगति से की जानी चाहिए। यही मानवीय गरिमा का सम्मान है और यही एक संवेदनशील, समावेशी तथा सभ्य समाज की वास्तविक पहचान भी है।

लेखक परिचय

(भगवान प्रसाद गौड़, पत्रकार, लेखक एवं जनसंपर्क विशेषज्ञ हैं। सामाजिक सरोकारों, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, दिव्यांग सशक्तिकरण और समसामयिक विषयों पर उनकी विशेष रुचि है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनके लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। वे जनहित के मुद्दों पर संवेदनशील एवं तथ्यपरक लेखन के लिए जाने जाते हैं। उपरोक्त लेख उनके निजी विचार हैं।)