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पुस्तक ‘गूंजे देश राग’ का लोकार्पण, सच्चिदानंद जोशी बोले- लेखक का जीते-जी सम्मान करो तो उसे संतोष मिले

नई दिल्ली : वरिष्ठ लेखक, रंगकर्मी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक ‘गूंजे देश राग’ का लोकार्पण एवं पुस्तक-परिचर्चा कार्यक्रम साहित्य अकादेमी नई दिल्ली में हुआ। पुस्तक का प्रकाशन यश पब्लिकेशंस ने किया है। यह पुस्तक डॉ. सच्चिदानंद जोशी की विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभवों पर केन्द्रित है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल और विशेष अतिथि प्रख्यात ट्रैवल ब्लॉगर डॉ. कायनात काजी रहे। इस अवसर पर यश पब्लिकेशन के निदेशक जतिन भारद्वाज भी उपस्थित रहे।डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया, प्रेरणा-स्रोतों और इसके शीर्षक के निहितार्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, यह यात्रा वर्णन उस तरह से नहीं लिखा गया है, जैसे आमतौर पर यात्रा वर्णन लिखे जाते हैं। यह पुस्तक यात्राओं के दौरान मिले मानवीय अनुभवों, आत्मीय व्यवहार और गहरी संवेदनाओं को सहेजने के उद्देश्य से लिखी गई है। जब आप विदेश में जाते हैं, तो कुछ ऐसी चीजें होती हैं, जो दिल को छू जाती हैं। तब आप उसे लोगों को बताना चाहते हैं। इस पुस्तक के जरिये मैंने यही प्रयास किया है।उन्होंने उल्लेख किया कि समय की तेज रफ्तार में साहित्य का कार्य आत्मीय क्षणों को थामना और उन्हें संवाद में बदलना है, चाहे वह कविता हो, कहानी हो या संस्मरण। उन्होंने कहा, यह लेखन कालजयी होने की महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं है, बल्कि उस सहज अपेक्षा से उपजा है कि रचना अपने समय के पाठक से संवाद कर सके और उसे मानवीय मूल्यों पर सोचने के लिए प्रेरित कर सके। उन्होंने हिन्दी लेखक की दशा पर बात करते हुए कहा कि लेखक का जीते-जी सम्मान करो, तो उसे संतोष मिले। इस पुस्तक में शामिल यात्रा संस्मरण ‘हम तो ऐसे हैं भैया’ का पाठ कर उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन किया।मुख्य अतिथि व्योमेश ने कहा, ‘गूंजे देश राग’ एक सांस में पढ़ी जाने लायक पुस्तक है। हिन्दी की मुख्यधारा का जो लेखन है, उसने अपने ऊपर बहुत ज़्यादा दायित्व ले लिया है। वह बहुत महत्त्वाकांक्षी है, इसलिए अपने ऊपर अत्यधिक दबाव ले लिया है। वह हर ‘बार’ को उछलकर पार कर जाना चाहता है। लेकिन इस किताब में लेखक ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया है। हिन्दी का ‘राज रोग’ है अमर हो जाने की चाह, लेकिन वह इस पुस्तक में नहीं है। उन्होंने कहा, ऐसा लिखना चाहिए कि मरहम लगे। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ये नहीं लिखते कि मैं मरहम लगा रहा हूं, लेकिन वे अपने लेखन से खुद को भी स्वस्थ करते हैं और पाठकों को भी स्वस्थ करते हैं। ये पुस्तक आपको यह अनुभव करने के लिए प्रेरित करती है कि आप भी कवि हैं, आप भी लेखक हैं। यह भारत का गद्य है।कायनात काजी ने कहा, पुस्तक को पढ़ते समय ऐसा लगता है कि लेखक के साथ हम भी उस स्थान की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तक का यात्रा संस्मरण ‘प्रवासी घाट’ बहुत सरल और सहज तरीके से गिरमिटिया लोगों की पीड़ा को पाठकों के समक्ष साकार कर देता है। डॉ. जोशी के लेखन के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, साहित्य जगत के नवागंतुक डॉ. सच्चिदानंद जोशी के लेखन से प्रेरणा और ऊर्जा लेते हैं।कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार कात्यायनी चतुर्वेदी ने किया। उन्होंने लेखक की साहित्यिक यात्रा, रंगकर्म और सांस्कृतिक दृष्टि का सारगर्भित परिचय देते हुए चर्चा का सुंदर संचालन किया। अंत में, अर्पित शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में साहित्य, कला, रंगमंच और मीडिया जगत से जुड़े अनेक गणमान्य अतिथियों तथा पुस्तक-प्रेमियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का समापन सौहार्दपूर्ण संवाद और पुस्तक-हस्ताक्षर सत्र के साथ हुआ।—————