वो तंग गली मेरे बचपन की
हर मोड़ जहां इक याद खड़ी
कुछ धुंधली सी
कुछ प्यारी सी
जीवन की एक किताब मिली
दो चार पृष्ठ बस पलटे थे
सोंधी खुशबू से मन
पुलक उठा
मन हुआ बावरा
उड़ निकला
यादों की एक दुकान दिखी
जहां मिलती खुशियां
प्रेम-भाव से
मठरी थी वो
अहसास भरी।
जो चार कदम
हम बढ़ निकले
इक फाटक पर
हर आंख जमीं
होंठों पर मुस्कान भरी
पर आंखों में थी
कुछ तो नमी।
आंगन का वो पेड़ बड़ा सा
याद मुझे तो अब भी है
नाना की बसती जान थी जिसमें
वो क्यारी अब बेजान पड़ी।
वो नानी की बंद बरनियां
छुपा के कोने में रखी
खट्टी-मीठी यादों का
प्यारा भरा अहसास घुली।
जो आंख बंद कर बैठ गए
कुछ सीढ़ी पर अब धूल मिली
न चौखट अपनी
न आंगन अपना
पर यादों पर न धूल चढ़ी
अपनेपन की गहराई में
गहन वेदना मौन खड़ी
अब लौट चला
मन मेरा बावरा
अब आंखों में थी
केवल ही नमी
इक कसक रह गई
बाकी अब भी
क्यों चौखट मेरी
नीरव सी पड़ीl
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