Friday , August 21 2026

विसंगतियों के बीच सच तलाशते हरिशंकर परसाई

जयंती (22 अगस्त) पर स्मरण

(डॉ. एस.के. गोपाल)

हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई उस व्यंग्यकार के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने हंसी को सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया। उनकी रचनाएं पढ़ते हुए पाठक पहले मुस्कराता है और फिर ठिठक जाता है। जिस विसंगति पर वह हंस रहा होता है, उसका कोई हिस्सा उसे अपने आसपास भी दिखाई देने लगता है। परसाई ने पाखंड, दिखावे, स्वार्थ और दोहरेपन को सहज भाषा में सामने रखा। उनकी कलम ने हंसी को सवाल में बदला और व्यंग्य को समाज को देखने की दृष्टि दी।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के जमानी गांव में हुआ था। उन्होंने हिंदी व्यंग्य को गंभीर साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी भाषा आम बोलचाल की थी। वाक्य छोटे थे और विषय रोजमर्रा के जीवन से जुड़े थे। वे किसी व्यक्ति पर हंसने के लिए नहीं लिखते थे। उनकी नजर उन प्रवृत्तियों पर रहती थी जो व्यक्ति और समाज को भीतर से कमजोर करती हैं। इसलिए उनकी रचनाओं में व्यंग्य के साथ सुधार की चिंता भी दिखाई देती है।

जब मैं बीमार पड़ा रचना में उन्होंने बीमारी जैसी सामान्य स्थिति को सामाजिक व्यवहार का आईना बना दिया। बीमारी में आदमी को सहारे की जरूरत होती है। परसाई देखते हैं कि उसके आसपास सलाह देने वालों की कमी नहीं रहती। हर कोई अपना अनुभव बताता है। कोई इलाज सुझाता है तो कोई बीमारी को लेकर अपना ज्ञान दिखाता है। इस सहज प्रसंग में वे हमारी संवेदनहीनता और दिखावे को पकड़ लेते हैं। साधारण घटना उनके यहां सामाजिक व्यंग्य बन जाती है। बीमारी के बहाने वे उस मानसिकता पर चोट करते हैं जिसमें सहानुभूति से अधिक अपनी बात साबित करने की जल्दी होती है।

लक्ष्मी वंदना में धन के प्रति समाज की मानसिकता पर तीखी नजर है। लक्ष्मी यहां केवल धन की देवी नहीं हैं। वे उस सोच का प्रतीक हैं जिसमें धन के सामने चरित्र, योग्यता और नैतिकता पीछे छूट जाती है। समाज में धनवान व्यक्ति को मिलने वाले सम्मान और प्रभाव पर परसाई सवाल उठाते हैं। आज जब आर्थिक सफलता को प्रतिष्ठा का बड़ा पैमाना माना जाता है, यह व्यंग्य और भी प्रासंगिक लगता है। धन जरूरी है, लेकिन धन के आगे विवेक और मूल्य झुक जाएं तो समाज का संतुलन बिगड़ने लगता है।

परसाई की खासियत यह है कि वे उपदेश नहीं देते। वे आईना दिखाते हैं। पाठक पहले हंसता है और फिर सोचता है कि व्यंग्य की चोट कहीं उसी पर तो नहीं है। भोलाराम का जीव में सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता सामने आती है। सदाचार का ताबीज में नैतिकता के दिखावे पर चोट है। इन रचनाओं में व्यवस्था के साथ उस समाज पर भी सवाल है जो उसकी कमजोरियों को चुपचाप स्वीकार करता रहता है।

परसाई के यहां आम आदमी चिंता का केंद्र है। सरकारी दफ्तरों में फंसा व्यक्ति हो या बीमारी में सलाहों से घिरा आदमी, उनकी सहानुभूति उसके साथ है। वे उसकी मजबूरी को समझते हैं। इसलिए उनका व्यंग्य कमजोर व्यक्ति का मजाक नहीं उड़ाता। उनकी चोट उस व्यवस्था और मानसिकता पर पड़ती है जो आम आदमी को असहाय बनाती है। यही संवेदना उनके व्यंग्य को केवल हास्य से अलग करती है और उसे मानवीय बनाती है।

राजनीति, धर्म, समाज और परिवार उनकी रचनाओं के विषय बने परन्तु उनका मूल सरोकार मनुष्य और उसके व्यवहार से था। वे देखते थे कि आदर्शों की बातें करने वाला समाज व्यवहार में कितनी जल्दी स्वार्थ से समझौता कर लेता है। सत्ता बदलती है। चेहरे बदलते हैं। समय बदलता है। फिर भी अवसरवाद, पाखंड और निजी स्वार्थ की प्रवृत्तियां बनी रहती हैं। यही वजह है कि परसाई आज भी हमारे समय के लेखक लगते हैं।

आज सूचना का विस्तार हुआ है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है। साथ ही दिखावे, अफवाह और आधी अधूरी जानकारी का संसार भी बढ़ा है। धन और सफलता की चमक पहले से अधिक दिखाई देती है। ऐसे समय में लक्ष्मी वंदना हमें धन के प्रति अपनी दृष्टि पर विचार करने को कहती है। जब मैं बीमार पड़ा रचना हमारे सामाजिक व्यवहार का आईना सामने रखती है। क्या हम सचमुच किसी परेशान व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं या केवल सलाह देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं?

परसाई को पढ़ना असहमति और सवाल करने की आदत को मजबूत करना है। वे सिखाते हैं कि जो सामान्य दिखाई दे रहा है वह जरूरी नहीं कि सही भी हो। उनकी भाषा कठिन नहीं है। इसलिए उनकी बात सीधे पाठक तक पहुंचती है। वे हंसी के माध्यम से गंभीर सवाल उठाते हैं। उनका व्यंग्य किसी व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए नहीं, समाज को बेहतर बनाने की बेचैनी पैदा करने के लिए है। परसाई जी की दृष्टि हमें अपने व्यवहार और सामाजिक मूल्यों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। उनकी प्रासंगिकता इसी में है कि वे दूसरों पर हंसने से पहले खुद को देखने की दृष्टि देते हैं। उनकी व्यंग्यधर्मिता आज भी समाज के सामने आईना रखती है और पूछती है कि हम बदलती दुनिया में अपने मानवीय मूल्यों को कितना बचा पाए हैं।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल साहित्याचार्य एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)