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मेडिकल शिक्षा में ज्ञान से ज्यादा जरूरी व्यावहारिक दक्षता : डॉ. अभिजात सेठ

नई दिल्ली (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) द्वारा मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MSAI) के सहयोग से आयोजित दूसरे ICC मेडिकल एजुकेशन फोरम में भारत के चिकित्सा शिक्षा नियामकों, नर्सिंग क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और छात्र प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस मंच पर क्लिनिकल ट्रेनिंग, सिमुलेशन, योग्यता-आधारित पाठ्यक्रम और स्वास्थ्य सेवा शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े सुधारों पर व्यापक चर्चा हुई।

समारोह को विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC-नेशनल मेडिकल कमीशन) के चेयरपर्सन डॉ. अभिजात चंद्रकांत सेठ ने कहा कि भारत में अब 820 से अधिक मेडिकल कॉलेज हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की जिम्मेदारी अब केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा के शैक्षणिक और व्यावहारिक मानकों को बेहतर बनाना है। 

डॉ. सेठ ने कहा, “हमारी सफलता का अंतिम मापदंड यह नहीं होगा कि हम कितने डॉक्टर तैयार कर रहे हैं, बल्कि यह होगा कि हम किस तरह के डॉक्टर तैयार कर रहे हैं, जो समाज की सेवा करेंगे। हम दो-स्तरीय चिकित्सा शिक्षा प्रणाली नहीं बना सकते, जहाँ कुछ संस्थानों के छात्रों के पास उत्कृष्ट फैकल्टी, बेहतर चिकित्सा सामग्री, सिमुलेशन सुविधाओं और अनुसंधान के अवसर उपलब्ध हों, जबकि अन्य छात्रों को इन अवसरों में काफी कमी का सामना करना पड़े।”

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “आधुनिक शिक्षा को छात्रों को न केवल AI का उपयोग करने के लिए तैयार करना चाहिए, बल्कि इसे गहराई से समझने में भी सक्षम बनाना चाहिए। AI को कभी भी पेशेवर जिम्मेदारी और जवाबदेही का स्थान नहीं लेना चाहिए। मरीजों की देखभाल से जुड़े फैसलों के लिए अंततः डॉक्टर ही जवाबदेह रहेगा। यही वह बिंदु है, जहाँ तकनीक की सीमा समाप्त होती है और इंसानियत की शुरुआत होती है।”

उन्होंने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2026 में करीब 50,000 डॉक्टर संरचित ऑनलाइन AI प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं। वहीं, बोर्ड के CPR कार्यक्रम के तहत 2023 में करीब 20 लाख स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों तक प्रशिक्षण पहुँचाया गया।

इंडियन नर्सिंग काउंसिल (INC) के अध्यक्ष डॉ. टी. दिलीप कुमार ने पायलट ट्रेनिंग का उदाहरण देते हुए सिमुलेशन के जरिए नर्सिंग शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए काउंसिल की ओर से किए जा रहे प्रयासों के बारे में बताया।

डॉ. कुमार ने कहा, “यात्री की सुरक्षा पायलट के हाथ में होती है। पायलट को आमतौर पर सिमुलेटर के जरिए ट्रेनिंग दी जाती है। इसी तरह डॉक्टर और नर्स मरीज की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होते हैं।” उन्होंने नेशनल काउंसिल ऑफ स्टेट बोर्ड्स ऑफ नर्सिंग के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि BSc नर्सिंग के 50 प्रतिशत तक पाठ्यक्रम की पढ़ाई सिमुलेशन के जरिए की जा सकती है। 

उन्होंने बताया कि INC ने Jhpiego, Laerdal Medical India और SGT University, गुरुग्राम के साथ मिलकर भारत का पहला नेशनल रेफरेंस सिमुलेशन सेंटर बनाया। इसके बाद सज्जालाश्री इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग साइंसेज, बागलकोट में दूसरा सेंटर भी शुरू किया गया।

उन्होंने कहा, “हार्डवेयर लेना बहुत आसान है। पैसे खर्च करके हार्डवेयर खरीदा जा सकता है, लेकिन सॉफ्टवेयर ज्यादा महत्वपूर्ण है। यहां सॉफ्टवेयर से हमारा मतलब शिक्षक और फैकल्टी से है। उन्हें सिमुलेशन के जरिए पढ़ाने के लिए सही ट्रेनिंग देना जरूरी है। यह एक बड़ी चुनौती है।”

डॉ. कुमार ने बताया कि INC ने करीब 2,000 नर्सिंग फैकल्टी को सिमुलेशन आधारित कार्यक्रमों की ट्रेनिंग दी है। छह महीने के AI नर्सिंग कोर्स के लिए Digital Health Academy के साथ समझौता किया गया है। वहीं, नर्स प्रैक्टिशनर क्रिटिकल केयर कार्यक्रम को करीब 66 संस्थानों तक बढ़ाया गया है।

उन्होंने यह बताया कि भारत पहली बार International Council of Nurses (ICN) के बोर्ड के लिए चुना गया है और भारत ने 2029 में ICN कांग्रेस की मेजबानी के लिए अपनी बोली भी जमा की है।

आईसीसी नेशनल हेल्थकेयर कमेटी की सह-अध्यक्ष और फोर्टिस हॉस्पिटल्स की एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट डॉ. ऋचा एस. देबगुप्ता ने कहाकि फोरम की थीम “एक्सीलेंस इन मेडिकल एजुकेशन, बीम्स विथ क्वालिटी” (चिकित्सा शिक्षा में उत्कृष्टता, गुणवत्ता से चमकती है) मौजूदा समय में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की स्थिति को दर्शाती है।

डॉ. देबगुप्ता ने कहा, “चिकित्सा के क्षेत्र में लगातार बदलाव हो रहे हैं, लेकिन एक चीज हमेशा बनी रहनी चाहिए और वह है हमारे द्वारा तैयार किए जाने वाले स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की गुणवत्ता। इसलिए, चिकित्सा शिक्षा केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे छात्रों में योग्यता, सही निर्णय लेने की क्षमता, करुणा, सीखने की जिज्ञासा और अच्छे चरित्र का विकास करना चाहिए।”

मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MSAI) की अध्यक्षा डॉ. चैत्रा बी.ए. ने फोरम में छात्रों का दृष्टिकोण रखा। उन्होंने इंटर्नशिप के दौरान डॉक्टरों को होने वाली अत्यधिक थकान और मानसिक दबाव का जिक्र करते हुए अपनी बात रखी।

MSAI के स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन से जुड़े नीति पत्र का हवाला देते हुए डॉ. चैत्रा ने कहा, “सिर्फ बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी होने का मतलब यह नहीं है कि हमारा कार्यबल मजबूत भी है। हमें यह देखना होगा कि ये पेशेवर कहाँ जा रहे हैं, वे किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, क्या उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण मिल रहा है और क्या वे इस व्यवस्था में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।”

AI पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “सवाल यह नहीं है कि चिकित्सा क्षेत्र में AI की जगह है या नहीं, क्योंकि यह पहले से ही इसका हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या हमारी चिकित्सा शिक्षा छात्रों को AI का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने के लिए तैयार कर रही है।”

उन्होंने पाठ्यक्रम तैयार करने और मूल्यांकन की प्रक्रिया में छात्रों की अधिक सीधी भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “अत्यधिक थकान कोई योग्यता नहीं है और बर्नआउट निश्चित रूप से कार्यबल को तैयार करने या बनाए रखने की रणनीति नहीं होनी चाहिए।”

लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. रितिका सूद ने प्रतिभागियों को 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर लागू की गई योग्यता-आधारित चिकित्सा शिक्षा (CBME) की दिशा में हुए बदलाव के बारे में विस्तार से बताया।

पुरानी व्यवस्था के बारे में बात करते हुए डॉ. सूद ने कहा, “पहले का पाठ्यक्रम काफी हद तक विषय-केंद्रित और शिक्षक-केंद्रित था, जिसमें व्यावहारिक इस्तेमाल की तुलना में रटने और तथ्यों को याद रखने पर अधिक जोर दिया जाता था। उस समय शुरुआती स्तर पर क्लिनिकल अनुभव देने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं थी।”

उन्होंने बताया कि CBME के तहत पूरे MBBS पाठ्यक्रम में 2,600 से अधिक तय दक्षताएं (competencies) शामिल की गई हैं। इसके साथ ‘डेमॉन्स्ट्रेट-ऑब्जर्व-असिस्ट-परफॉर्म’ (DOAP) पद्धति और एटीट्यूड, एथिक्स एंड कम्युनिकेशन (AETCOM) मॉड्यूल को भी शामिल किया गया है। इसे रोल-प्ले और मानकीकृत मरीजों के साथ अभ्यास के जरिए सिखाया जाता है और छात्रों का लगातार मूल्यांकन किया जाता है।

उन्होंने बताया कि भारत में अब करीब 706 मेडिकल संस्थान हैं, जहां हर साल लगभग एक लाख MBBS सीटें उपलब्ध हैं। हालांकि, उन्होंने फैकल्टी की तैयारी और परीक्षा की पारंपरिक संस्कृति को CBME को प्रभावी ढंग से लागू करने में लगातार बनी हुई चुनौतियां बताया।

फोरम की चर्चा से एक बात साफ हुई कि भारतीय चिकित्सा शिक्षा में मेडिकल कॉलेजों, सीटों और सिमुलेशन सेंटरों की संख्या बढ़ाना अब सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। असली चुनौती फैकल्टी को तैयार करना, बेहतर पाठ्यक्रम तैयार करना और छात्रों को AI आधारित चिकित्सा व्यवस्था के लिए तैयार करना है। इस मुद्दे पर मंच पर मौजूद सभी वक्ताओं की राय एक जैसी रही।