(भगवान प्रसाद गौड़)
क्या हम सचमुच समाज की सेवा कर रहे हैं या केवल उसका प्रदर्शन? यह सवाल आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। हर तरफ समाज सेवा के नाम पर कार्यक्रम, सम्मान, फोटो और खबरें दिखाई देती हैं। तालियां भी बजती हैं, सराहना भी होती है। लेकिन जब शोर शांत होता है तब एक खामोश सवाल बचा रह जाता है-क्या वास्तव में कुछ बदला?
समाज सेवी संस्थान आज विकास और लोकहित के कई कार्य कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक संस्थाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य, दिव्यांग सहायता और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन इसी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है-सेवा का भाव धीरे-धीरे “दिखावे” में बदलता जा रहा है। मुद्दे उठाए जाते हैं, अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन जैसे ही प्रचार की रोशनी कम होती है, वैसे ही संवेदनाएं भी ठंडी पड़ जाती हैं। क्या यह सेवा है, या अवसर?
सवाल केवल समाज सेवी संस्थानों तक सीमित नहीं है। कॉरपोरेट जगत भी “सामाजिक उत्तरदायित्व” का दावा करता है। CSR के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। रिपोर्टें बनती हैं, प्रमाण पत्र लिए जाते हैं। लेकिन क्या यह उत्तरदायित्व है या केवल एक कानूनी प्रक्रिया? जिस समाज से कंपनियां संसाधन और लाभ लेती हैं, क्या उनके जीवन में स्थायी बदलाव लाने की कोई ईमानदार कोशिश होती है? या फिर यह भी एक “टिक मार्क” भर है। काम पूरा, जिम्मेदारी खत्म?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ संस्थानों ने समाज सेवा को एक “माध्यम” बना लिया है-व्यक्तिगत छवि निर्माण का या फिर काले धन को सफेद करने का। निजी फाउंडेशन, सीमित कार्य, और बड़े-बड़े दावे। इसका असर केवल व्यवस्था पर नहीं बल्कि समाज की मानसिकता पर भी पड़ता है। लोग अब सवाल पूछने लगे हैं-क्या सच में मदद हो रही है या केवल कहानी गढ़ी जा रही है?
और अब एक और खतरनाक प्रवृत्ति सामने आ रही है- “आस्था के नाम पर शोषण”। समाज सेवा और आध्यात्मिकता की आड़ में कुछ तथाकथित बाबा और गुरू लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं। वे विश्वास का लाभ उठाकर न केवल आर्थिक शोषण कर रहे हैं, बल्कि कई मामलों में हमारी नारी शक्ति की गरिमा और सम्मान के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह केवल अपराध नहीं बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने पर गहरा आघात है।
जब विश्वास ही शोषण का माध्यम बन जाए तो समाज की आत्मा घायल होती है। यह स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है, जब लोग डर, आस्था या सामाजिक दबाव के कारण आवाज उठाने से कतराते हैं। ऐसे मामलों में चुप्पी भी अपराध को बढ़ावा देती है।
दुनिया के कुछ देशों में इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सख्त पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था है। जर्मनी और यूनिटेड किंगडम जैसे देशों में संस्थाओं को अपने कार्यों और वित्त का खुला हिसाब देना होता है, और किसी भी प्रकार की अनियमितता पर त्वरित कार्रवाई होती है। हमें वहां से यह सीखने की जरूरत है कि सेवा के नाम पर कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून और नैतिकता से ऊपर नहीं हो सकती।
तो क्या कमी हमारे यहां कानून की है? शायद नहीं। कमी है उस जागरूकता और साहस की। जो गलत को गलत कह सके। हमें यह समझना होगा कि सेवा और शोषण के बीच एक स्पष्ट रेखा है-और उसे पहचानना समाज की जिम्मेदारी है।
एक सच्चे समाज सेवी संस्थान की पहचान क्या होनी चाहिए? वह जो विश्वास बनाए, न कि उसका दुरुपयोग करे। वह जो कमजोर को सशक्त बनाए, न कि उसकी मजबूरी का फायदा उठाए। और एक सच्चा समाज वही है, जो अपने भीतर छिपे ऐसे पाखंड को पहचानकर उसका विरोध करे।
अंततः समाज सेवा कोई इवेंट नहीं है, न ही यह किसी रिपोर्ट का हिस्सा है। यह एक सतत प्रतिबद्धता है। बिना स्वार्थ, बिना डर, और बिना दिखावे के।
आज जरूरत इस बात की है कि हम केवल सेवा की बात न करें बल्कि उसके नाम पर हो रहे पाखंड को भी उजागर करें।
क्योंकि जब सेवा के नाम पर शोषण होने लगे तो चुप रहना भी एक तरह की साझेदारी बन जाती है।
अब समय आ गया है-समाज केवल बदले नहीं, बल्कि जागे।

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