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नो वॉर-नो पीस: सीजफायर के बीच झूलती दुनिया

(भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर)

पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बना वर्तमान परिदृश्य केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का एक जटिल प्रतिबिंब है। इस पूरे घटनाक्रम में “सीजफायर” एक ऐसा शब्द बनकर उभरा है, जो ऊपर से शांति का संकेत देता है लेकिन भीतर कई स्तरों पर अविश्वास, शर्तें और रणनीतिक समीकरण लिए हुए है।

आज का सीजफायर पारंपरिक युद्धविराम से अलग है। यह केवल हथियारों की गूंज थमने का परिचायक नहीं बल्कि एक रणनीतिक विराम जैसा लगता है। जिसमें सभी पक्ष खुद को फिर से व्यवस्थित करते हैं। अपनी कमजोरियों को सुधारते हैं और अगले कदम की तैयारी करते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह शांति की शुरुआत है या किसी बड़े संघर्ष से पहले की खामोशी? 

ढुलमुल नीति और भरोसे का संकट

इस पूरे परिदृश्य में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहा है। उनकी “दबाव और संवाद” की दोहरी रणनीति एक ओर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और दूसरी ओर बातचीत की पेशकश ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनिश्चितता को बढ़ाया है।

इस प्रकार की नीति अल्पकालिक तौर पर विरोधी पक्ष को झुकाने का प्रयास करती है लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह भरोसे को कमजोर करती है। ईरान परमाणु समझौता इसका प्रमुख उदाहरण है। जहां कूटनीति से बनी सहमति को एकतरफा निर्णय से तोड़ दिया गया। इसके बाद किसी भी नए समझौते या सीजफायर पर विश्वास करना ईरान के लिए कठिन हो गया है।

ईरान की शर्तें

सम्मान और स्वायत्तता का आग्रह – ईरान इस पूरे घटनाक्रम में एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरता है, जो केवल युद्ध को टालना नहीं चाहता बल्कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय भूमिका को स्पष्ट रूप से स्थापित करना चाहता है। उसकी संभावित शर्तें- जैसे आर्थिक प्रतिबंधों का हटना, तेल निर्यात की स्वतंत्रता, परमाणु कार्यक्रम पर स्वायत्तता और भविष्य में समझौतों की स्थिरता। यह दर्शाती हैं कि वह अब “कमजोर पक्ष” की तरह नहीं बल्कि एक समान शक्ति के रूप में बातचीत करना चाहता है।

यह रुख अमेरिका के लिए एक चुनौती बन सकता है। क्योंकि एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में वह अपने प्रभाव और नियंत्रण को सीमित करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगा। परिणामस्वरूप सीजफायर एक मनोवैज्ञानिक संघर्ष का रूप ले लेता है।जहां दोनों पक्ष अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं।

सीजफायर: समाधान या तैयारी का दौर?

इतिहास यह बताता है कि कई बार युद्धविराम केवल एक “अंतराल” होता है, न कि अंतिम समाधान। खाड़ी युद्ध से पहले भी लंबे समय तक तनाव और कूटनीतिक प्रयास चलते रहे लेकिन अंततः संघर्ष हुआ। इसी तरह शीत युद्ध के दौरान भी दुनिया ने एक लंबा “नो वॉर, नो पीस” का दौर देखा। जिसमें प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन भय और प्रतिस्पर्धा लगातार बनी रही।

आज का सीजफायर भी इसी श्रेणी में आता दिखाई देता है।जहां शांति की बात तो हो रही है लेकिन अंदर ही अंदर सैन्य तैयारी, कूटनीतिक गठबंधन और आर्थिक दबाव की रणनीतियां जारी हैं। यह स्थिति खतरनाक है क्योंकि इसमें अनिश्चितता सबसे अधिक होती है।

वैश्विक प्रभाव

सीमाओं से परे संकट – इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम आदमी के जीवन तक पहुंचता है। विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग इस संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील हैं। जहां किसी भी प्रकार का तनाव तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। तेल की कीमतों में वृद्धि, महंगाई में उछाल और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता। ये सभी प्रभाव अंततः आम व्यक्ति तक पहुंचते हैं। यह संघर्ष केवल देशों के बीच नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

भारत की भूमिका: संतुलन और जिम्मेदारी

इस तनाव में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के संबंध सभी प्रमुख पक्षों के साथ हैं।अमेरिका और इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी है तो ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा आधारित संबंध।

ऐसे में भारत को चाहिए कि वह संतुलित कूटनीति अपनाए और किसी एक पक्ष में झुकाव न दिखाए। ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करे और वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान दे। खाड़ी देशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाए। भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” इस समय उसकी सबसे बड़ी ताकत है जो उसे एक जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है।

यह वक्त शांति की वास्तविक परीक्षा है। सीजफायर केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यदि यह केवल समय खरीदने या रणनीतिक लाभ लेने का माध्यम बनकर रह जाता है तो यह भविष्य में और बड़े संघर्ष का कारण बन सकता है।

लेकिन, यदि इसे ईमानदारी से संवाद, विश्वास बहाली और स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ाया जाता है तो यही विराम शांति की नींव भी बन सकता है। आज दुनिया को शक्ति प्रदर्शन से अधिक विश्वास निर्माण की आवश्यकता है। इतिहास हमें यह सिखाता है कि युद्ध अंततः विनाश लाता है, जबकि संतुलित कूटनीति और संवाद ही स्थिरता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अब यह निर्णय विश्व नेतृत्व के हाथ में है कि वे इस अवसर का उपयोग शांति के लिए करते हैं या इसे एक और संघर्ष की प्रस्तावना बनने देते हैं।

(लेखक भगवान प्रसाद गौड़ वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)