Monday , April 6 2026

उत्तर प्रदेश के जातिवादी राजनैतिक दलों का बेनकाब होता चेहरा 

(मृत्युंजय दीक्षित)

उत्तर प्रदेश में सभी राजनैतिक दलों ने वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियां तेज कर दी हैं। इन चुनावों की दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा लगभग स्पष्ट है जबकि सपा, बसपा व कांग्रेस सहित अन्य सभी क्षेत्रीय दलों ने भी अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। इनमें सपा और बसपा की चुनावी तैयारी कांग्रेस की तुलना में थोड़ा आगे है। 

लोकसभा चुनावो में प्राप्त बढ़त को बरकरार रखने के लिए सपा हर चुनावी  हथकंडा अपनाते हुए तमाम समुदायों को अपने पीडीए में जोड़ने के लिए सभी संभव प्रयास कर रही है और अनेक योजनाओं  की घोषणा भी कर रही है। यद्यपि प्रदेश में घटी कुछ आपराधिक घटनाओं ने समाजवादी पार्टी सहित सभी जातिवादी दलों का दोहरा चरित्र बेनकाब कर दिया है। 

प्रदेश के प्रयागराज में होने वाले माघ मेले में तथाकथित शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद व उनके शिष्यों  और प्रशासन के मध्य हुई दुर्भाग्यपूर्ण खींचतान के बाद समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में सभी दल ब्राह्मण हितैषी बनकर  भाजपा  पर हमलावर थे इनका प्रयास था कि  ब्राह्मण समाज येनकेन प्रकारेण भाजपा से नाराज होकर उनके पास आ जाए किंतु ऐसा अभी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहा है कि ब्राह्मण मतदाता सपा या किसी अन्य दल के साथ जा रहा है।   

इसके बाद फिल्, “घूसखोर पंडत” के शीर्षक को लेकर भी प्रदेश में खूब राजनीति हुई, इसी बीच ब्राह्मण शब्द का उपयोग एक सरकारी परीक्षा के प्रश्नपत्र में गलत तरह से हो गया जिससे ब्राह्मण समाज में नाराजगी फ़ैलाने का प्रयास हुआ किंतु सतर्क भाजपा नेतृत्व ने फ़िलहाल इस नाराजगी  को साध लिया है।  कुछ भी करके चुनाव जीतने का प्रयास कर रही समाजवादी पार्टी  हिंदू सनातन समाज को टुकड़ों – टुकड़ों में विभाजित कर, विभिन्न वर्गों में आपसी वैमनस्यता का भाव पैदा करके हिन्दू वोटों को बाँटने और मुस्लिम वोटों को साधने में लगी है। 

एक दिन समाजवादी नेता समाज के हर वर्ग को पीडीए की धारा से जोड़ने की बात करते हैं और दूसरे दिन ही ऐसी घटनाएं भी घट जाती हैं जिनके कारण उनकी असली मंशा बेनकाब हो जाती है और भाजपा को लाल टोपी वालों को सबसे बड़ा खतरा कहने का अवसर मिला जाता है। 

हरदोई जिले में समाजवादी नेता यदुनंदन वर्मा ने स्थनीय स्तर पर अपनी विकृत राजनीति चमकाने के लिए भगवान राम का आपत्तिजनक चरित्र चित्रण किया व माता कौशल्या के लिए भी आपत्तिजनक शब्द बोले जिसके लिए उनको जेल जाना पड़ा। जब वह जमानत पर बाहर आए तब भीम आर्मी व सपा के स्थानीय  नेताओं ने उनका भव्य स्वागत किया। समाजवादी पार्टी ने अपने नेता के उस रामद्रोही बयान की निंदा तक नहीं की। यह तथ्य भी सामने आया है कि यदुनंदन वर्मा ने करोड़ों  की सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। 1975 में ग्राम समाज की जमीन पर कब्जा कर जनता इंटर कालेज बना लिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि  हिंदुओं  के आराध्य प्रभु श्रीराम और माता कौशल्या पर अश्लील टिप्पणी करने वाले वर्मा खुद को समाजसेवी, शिक्षाविद और गरीबों का मसीहा बताते हैं लेकिन उनकी सेवा की जड़ें सीधे सरकारी जमीन हड़पने में धंसी हुई हैं। जो व्यक्ति मंचो से गरीबों, दलितों और पिछड़ों की सेवा का दावा करते नहीं थकता उसने उसी शोषित समाज की जमीन पर कब्जा कर रखा है। 

गाजियाबाद में एक दलित हिंदू युवक ने एक मुस्लिम लड़की से प्रेम विवाह किया  किंतु कुछ ही दिनों बाद जिहादी कट्टरपं थियों ने इस दलित हिंदू युवक की हत्या कर दी। यहां पर पीड़ित एक दलित हिंदू है किन्तु किसी भी दल ने उसके समर्थन में केवल इसलिए आवाज नहीं उठाई कि कहीं मुस्लिम वोट बैंक नाराज़ न हो जाए। 

वाराणसी में बीएचयू के हिंदी विभाग में एमए द्वितीय वर्ष के एक छात्र से जाति पूछकर मारपीट का मामला सामने आया। बीएचयू में एमएससी कर रहे हिमांशु यादव (समाजवादी छात्र सभा के अध्यक्ष) ने एक अन्य छात्र की जाति पूछकर उसको कई थप्पड़ मारे और विरोध करने पर जाति सूचक गालियां भी दीं। विद्यार्थी परिषद व पीड़ित युवक की शिकायत पर आरोपी हिमांशु यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है। समाजवादी नेता इस घटना की निंदा करने के बजाय आरोपी को बचाने का उपक्रम कर रहे हैं। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अभी जो लोग ब्राह्मण समाज के लिए खड़े होने का ढोंग कर रहे थे जब उनकी अपनी ही पार्टी के नेता ने अकारण ही केवल ब्राह्मण होने के कारण एक छात्र को पीट दिया वह सब चुप्पी साध गए। 

प्रदेश में घटी उक्त तीनों ही घटनाएं समाजवादी पार्टी तथा उसके साथियों के दोहरे चरित्र को उजागर करती हैं। समाजवादी पार्टी प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों को साथ लेकर अपनी रणनीति को नई धार देना चाहती है। दलित आबादी को पार्टी से जोड़ने के लिए गांव -गांव में डा. भीमराव आंबेडकर जयंती मनाने जा रही है किन्तु यदि समाजवादी पार्टी अपने दोहरे चरित्र से मुक्त नहीं होती तो ये सारे प्रयास व्यर्थ रहेंगे। 

(लेखक मृत्युंजय दीक्षित स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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