नई दिल्ली : देश में पिछले एक साल के दौरान ग्रामीण इलाकों में महंगाई शहरी इलाकों की तुलना में कम रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक दवाब में कमी आई है। पिछले दो वर्षों 2023 और 2024 में ग्रामीण महंगाई शहरी महंगाई से ज्यादा थी, लेकिन 2025 में खाने-पीने की चीजों की कीमतें घटने से इसमें कमी आ गई।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह जानकारी संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में दी। सर्वेक्षण में बताया गया है कि ज्यादातर राज्यों में खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक के 2-6 प्रतिशत के सहनशीलता दायरे (टॉलरेंस बैंड) के अंदर रही। इस दौरान केवल केरल और लक्षद्वीप में खुदरा महंगाई 6 प्रतिशत से ऊपर गई। दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में महंगाई राष्ट्रीय औसत से कम रही, जबकि दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में औसत से ज्यादा दर्ज की गई।सर्वेक्षण में राज्य-वार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक(सीपीआई) महंगाई डेटा का भी विश्लेषण किया गया है। जनवरी 2014 से दिसंबर 2025 तक के मासिक आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया कि राज्यों में महंगाई का अंतर पूरी तरह अस्थायी नहीं था। कई बार राष्ट्रीय औसत से अलग स्थिति एक महीने से ज्यादा समय तक बनी रही। दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में महंगाई लगातार राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही, जबकि दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में महंगाई अक्सर औसत से कम रही।सर्वेक्षण में बताया गया कि जिन राज्यों में मजदूरी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, वहां महंगाई भी ज्यादा रही। साथ ही औद्योगिक उत्पादन की हिस्सेदारी का महंगाई पर उल्टा असर दिखा, यानी विनिर्माण क्षेत्र की कार्यकुशलता ने कीमतों पर दबाव कम किया। सर्वेक्षण में बताया गया कि जीएसटी लागू होने से राज्यों के बीच महंगाई के अंतर पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
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