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दमन के विरुद्ध विद्रोह और दामोदर हरि चापेकर

जयंती पर विशेष

(डॉ. एस.के. गोपाल)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों, प्रस्तावों और जनसभाओं का इतिहास नहीं है। यह उन असंख्य देशभक्तों के साहस, त्याग और बलिदान का इतिहास भी है जिन्होंने विदेशी शासन के अन्याय और दमन के सामने झुकने से इनकार कर दिया। ऐसे ही महान क्रांतिकारियों में दामोदर हरि चापेकर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने उस समय ब्रिटिश शासन को चुनौती दी जब अंग्रेजी सत्ता स्वयं को अजेय मानती थी। उनका जीवन अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार, राष्ट्रस्वाभिमान और अदम्य साहस का प्रेरक उदाहरण है।

दामोदर हरि चापेकर का जन्म 24 जून 1869 को महाराष्ट्र के चिंचवड़ में हुआ था। उनके पिता हरि विनायक चापेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। परिवार में धार्मिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रप्रेम की भावना विद्यमान थी। बाल्यकाल से ही दामोदर में आत्मसम्मान, अनुशासन और देशभक्ति के संस्कार विकसित हुए। वे शारीरिक व्यायाम, संगठन और समाज सेवा में विशेष रुचि रखते थे। उनके दोनों भाई, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर भी समान विचारों वाले थे। तीनों भाइयों ने युवावस्था में ही यह अनुभव कर लिया था कि विदेशी शासन भारतीय समाज के सम्मान और स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ी बाधा है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में भारत में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार हो रहा था। महाराष्ट्र इस जागरण का प्रमुख केंद्र था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भारतीय स्वाभिमान और राष्ट्रीय अधिकारों की प्रखर आवाज बन चुके थे। उनके विचारों का प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा था। दामोदर हरि चापेकर भी इस राष्ट्रीय वातावरण से प्रभावित हुए। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर युवाओं में संगठन, शारीरिक क्षमता और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करने का प्रयास प्रारंभ किया। उनका विश्वास था कि आत्मसम्मान से रहित समाज कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।

सन् 1896 में पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्लेग महामारी फैल गई। महामारी से लोगों का जीवन संकट में पड़ गया। बीमारी से लड़ने के स्थान पर ब्रिटिश प्रशासन ने ऐसे कदम उठाए जिन्होंने जनता के दुख को और बढ़ा दिया। प्लेग नियंत्रण के नाम पर अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों को व्यापक अधिकार दे दिए गए। वे बिना अनुमति किसी भी घर में प्रवेश कर सकते थे। महिलाओं की गोपनीयता और सम्मान की उपेक्षा की जाती थी। धार्मिक मान्यताओं का भी ध्यान नहीं रखा जाता था। अनेक परिवारों को अपमान और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

इन कठोर कार्रवाइयों का नेतृत्व प्लेग कमिश्नर वाल्टर चार्ल्स रैंड कर रहा था। उसके व्यवहार ने जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया। लोगों को लगने लगा कि महामारी से अधिक पीड़ा अंग्रेज अधिकारियों के दमनकारी रवैये से मिल रही है। समाज के अनेक वर्गों ने इस व्यवहार का विरोध किया किंतु प्रशासन ने जनता की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया।

दामोदर हरि चापेकर और उनके भाइयों ने इन घटनाओं को केवल प्रशासनिक भूल नहीं माना। उन्होंने इसे भारतीय समाज के सम्मान पर आघात के रूप में देखा। उनके मन में यह भावना प्रबल हुई कि यदि अन्याय का प्रतिरोध नहीं किया गया तो अंग्रेजी शासन और अधिक निरंकुश हो जाएगा। उन्होंने निर्णय लिया कि जनता के अपमान के लिए उत्तरदायी अधिकारियों को दंडित किया जाना चाहिए।

22 जून 1897 को महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में पुणे में एक भव्य समारोह आयोजित किया गया। समारोह समाप्त होने के बाद रैंड और उसका सहयोगी लेफ्टिनेंट चार्ल्स आयर्स्ट अपने वाहनों से लौट रहे थे। इसी अवसर पर दामोदर हरि चापेकर और उनके साथियों ने दोनों अधिकारियों पर गोली चलाई। यह घटना ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रतिकार की एक ऐतिहासिक घटना बन गई। दोनों अधिकारी गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

इस घटना ने अंग्रेज प्रशासन को झकझोर दिया। शासन ने इसे अपनी सत्ता के लिए बड़ी चुनौती माना। व्यापक स्तर पर जांच और गिरफ्तारियां शुरू हुईं। अंततः दामोदर हरि चापेकर को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चलाया गया। अंग्रेजी अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई। 18 अप्रैल 1898 को उन्हें फाँसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु केवल अट्ठाईस वर्ष थी।

दामोदर हरि चापेकर ने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने कृत्य को राष्ट्र और समाज के सम्मान की रक्षा का प्रयास माना। उनका विश्वास था कि अन्याय का प्रतिकार करना प्रत्येक देशभक्त का कर्तव्य है। उनके बलिदान ने अनेक युवाओं के मन में स्वतंत्रता और स्वाभिमान की भावना को और प्रबल बनाया।

दामोदर हरि चापेकर के बाद उनके दोनों भाइयों बालकृष्ण और वासुदेव को भी अंग्रेजी शासन ने गिरफ्तार किया। उन्हें भी मृत्युदंड दिया गया। इस प्रकार चापेकर परिवार ने राष्ट्र के लिए अपने तीन युवा पुत्रों का बलिदान दिया। भारतीय इतिहास में ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है। चापेकर बंधुओं का त्याग स्वतंत्रता संग्राम की अमूल्य धरोहर बन गया।

इतिहासकारों का मत है कि चापेकर बंधुओं की कार्रवाई ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। इस घटना ने यह सिद्ध किया कि भारतीय युवक केवल अन्याय सहने के लिए तैयार नहीं हैं। वे अपने सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष भी कर सकते हैं। आगे चलकर अनेक क्रांतिकारी संगठनों और स्वतंत्रता सेनानियों ने उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त की। उनके साहस ने राष्ट्रवादी चेतना को नई ऊर्जा प्रदान की।

आज स्वतंत्र भारत में दामोदर हरि चापेकर का स्मरण केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अन्याय, दमन और अपमान के विरुद्ध आवाज उठाना समाज का नैतिक दायित्व है। उन्होंने अपने समय की चुनौतियों का सामना साहस और दृढ़ता से किया। उनका बलिदान हमें राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है।

दामोदर हरि चापेकर का जीवन भारतीय युवाओं के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है। उनका नाम उन अमर सेनानियों में सदैव स्मरण किया जाएगा जिन्होंने स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार करने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। दमन के विरुद्ध उनका विद्रोह केवल एक घटना ही नहीं थी अपितु भारतीय आत्मसम्मान की उद्घोषणा थी जिसकी गूंज स्वतंत्रता प्राप्ति तक सुनाई देती रही और आज भी राष्ट्रप्रेम की भावना को प्रेरित करती है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वाधीनता संग्राम के अध्येता व स्वतंत्र पत्रकार है और ये उनके निजी विचार हैं।)