(डा.एस.के. गोपाल)
22 जून 2026 को लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र स्थित एक निजी कोचिंग संस्थान में लगी भीषण आग ने पूरे प्रदेश को स्तब्ध कर दिया। इस दर्दनाक हादसे में कई लोगों की मृत्यु हुई तथा अनेक घायल हुए हैं जिनका उपचार चल रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इतनी तेजी से फैली कि कई विद्यार्थियों को जान बचाने के लिए भवन से बाहर निकलने के असाधारण प्रयास करने पड़े। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं अपितु शहरी क्षेत्रों में बढ़ती सुरक्षा संबंधी लापरवाही का गंभीर संकेत भी है।
लखनऊ जैसे तेजी से विस्तार कर रहे महानगर में आग की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। कुछ वर्ष पूर्व विधानसभा के निकट हजरतगंज स्थित होटल लेवाना में लगी आग ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था। उस हादसे में कई लोगों की मृत्यु हुई और जांच में अग्नि सुरक्षा मानकों के गंभीर उल्लंघन सामने आए। घटना के बाद होटल को सीज कर दिया गया, जो आज भी बंद है। उस समय व्यापक चर्चा हुई थी कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे लेकिन समय बीतने के साथ वह संकल्प भी धीरे-धीरे धूमिल पड़ता गया।
हाल ही में विकासनगर की झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में लगी आग ने अनेक परिवारों को बेघर कर दिया। इससे पहले भी शहर के विभिन्न हिस्सों में दुकानों, गोदामों, बाजारों, अस्पतालों, निजी कार्यालयों तथा आवासीय परिसरों में आग लगने की घटनाएं सामने आती रही हैं। अधिकांश मामलों में कारण शॉर्ट सर्किट, विद्युत तंत्र की खराबी, सुरक्षा उपकरणों की अनुपलब्धता अथवा आपातकालीन व्यवस्थाओं का अभाव पाया गया। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि प्रत्येक घटना के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, जांच बैठती है, निर्देश जारी होते हैं और फिर सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। यह स्थिति बताती है कि हम अभी भी दुर्घटनाओं से स्थायी सबक लेने की संस्कृति विकसित नहीं कर पाए हैं।
अलीगंज की घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे शैक्षणिक और व्यावसायिक संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हजारों छात्र प्रतिदिन कोचिंग संस्थानों में जाते हैं। इनमें से अनेक संस्थान ऐसी इमारतों में संचालित होते हैं जो मूल रूप से शैक्षणिक गतिविधियों के लिए निर्मित नहीं होतीं। कहीं क्षमता से अधिक विद्यार्थियों को बैठाया जाता है, कहीं संकरी सीढ़ियां होती हैं, तो कहीं आपातकालीन निकास मार्ग का अभाव होता है। यदि किसी भवन में आग लग जाए, तो कुछ ही मिनटों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। ऐसे में केवल संस्थान संचालकों की ही नहीं बल्कि नियामक एजेंसियों की जिम्मेदारी भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।
समस्या का मूल कारण केवल नियमों का अभाव नहीं है, उनका प्रभावी पालन न होना है। अधिकांश संस्थानों में अग्निशमन यंत्र लगे होने का दावा किया जाता है परंतु अनेक मामलों में वे या तो अनुपयोगी होते हैं या वर्षों से उनकी जांच नहीं हुई होती। कई भवनों में अग्निशमन प्रणाली केवल कागजों तक सीमित रहती है। आपातकालीन निकास द्वार बंद पाए जाते हैं, विद्युत वायरिंग पुरानी होती है और सुरक्षा प्रशिक्षण का कोई प्रावधान नहीं होता। ऐसे में दुर्घटना होने पर लोग घबराहट में फंस जाते हैं और जनहानि की संभावना बढ़ जाती है।
इसके अतिरिक्त, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। भवन निर्माण की स्वीकृति एक विभाग देता है, अग्नि सुरक्षा प्रमाणन दूसरा विभाग करता है, विद्युत सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी अन्य एजेंसी के पास होती है और निगरानी का दायित्व प्रशासन पर होता है। जब तक इन सभी संस्थाओं के बीच नियमित संवाद, जवाबदेही और पारदर्शिता की व्यवस्था नहीं होगी तब तक नियमों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करना कठिन रहेगा। केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई करना किसी भी उत्तरदायी प्रशासन की पहचान नहीं हो सकती।
वर्तमान परिस्थितियों में सबसे आवश्यक कदम व्यापक अग्नि सुरक्षा ऑडिट है। कोचिंग संस्थानों, विद्यालयों, अस्पतालों, होटलों, मॉलों, व्यावसायिक परिसरों तथा बहुमंजिला इमारतों की समयबद्ध जांच होनी चाहिए। जिन संस्थानों के पास वैध अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं हैं अथवा जहां निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है, उनके विरुद्ध तत्काल कार्रवाही की जानी चाहिए। केवल नोटिस जारी करना ही पर्याप्त नहीं होगा, अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित निरीक्षण और कठोर दंडात्मक व्यवस्था भी आवश्यक है। साथ ही निरीक्षण रिपोर्टों को सार्वजनिक करने की व्यवस्था भी विकसित की जानी चाहिए ताकि नागरिक स्वयं भी सुरक्षा की स्थिति से अवगत हो सकें।
इसके साथ ही अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता के साथ उनके रखरखाव और उपयोग का प्रशिक्षण भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में समय-समय पर मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए ताकि विद्यार्थियों और कर्मचारियों को आपातकालीन परिस्थितियों में सुरक्षित निकासी की प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान हो। विकसित देशों में यह सामान्य व्यवस्था है जबकि हमारे यहां इसे अक्सर औपचारिकता मान लिया जाता है। सुरक्षा संस्कृति तभी विकसित होगी जब प्रशिक्षण और अभ्यास को नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाएगा।
भवन निर्माण और उपयोग से संबंधित नियमों में भी सख्ती की आवश्यकता है। किसी भी बहुमंजिला भवन में पर्याप्त चौड़ाई वाली सीढ़ियां, स्पष्ट आपातकालीन निकास मार्ग, अग्निरोधक सामग्री का उपयोग और सुरक्षित विद्युत व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, भवनों की क्षमता के अनुरूप ही लोगों को प्रवेश देने का नियम भी प्रभावी ढंग से लागू होना चाहिए।
इस पूरी प्रक्रिया में नागरिक सहभागिता और जनजागरूकता की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रायः देखा जाता है कि लोग किसी भवन में स्पष्ट सुरक्षा कमियां होने के बावजूद उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। अभिभावक यह जानने का प्रयास नहीं करते कि जिस संस्थान में उनके बच्चे अध्ययन कर रहे हैं वहां अग्निशमन उपकरण कार्यशील हैं या नहीं। व्यापारी और भवन स्वामी भी कई बार सुरक्षा उपायों को अनावश्यक खर्च मान लेते हैं। यह मानसिकता बदलनी होगी। यदि नागरिक सजग होंगे, सुरक्षा मानकों के पालन की मांग करेंगे और किसी भी अनियमितता की सूचना संबंधित विभागों को देंगे तो दुर्घटनाओं की आशंका काफी हद तक कम की जा सकती है। सुरक्षा केवल सरकारी आदेशों से नहीं बल्कि सामूहिक चेतना से भी सुनिश्चित होती है।
अलीगंज की त्रासदी अनेक परिवारों के लिए अपूरणीय क्षति लेकर आई है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास केवल ऊंची इमारतों और बढ़ती सुविधाओं का नाम नहीं है, विकास का वास्तविक अर्थ सुरक्षित और उत्तरदायी व्यवस्था का निर्माण भी है। यदि इस हादसे को केवल एक और दुर्घटना मानकर भुला दिया गया तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना कठिन होगा। समय की मांग है कि संवेदना के साथ-साथ जवाबदेही भी तय हो, जांच के साथ-साथ सुधार भी हों और नियमों के साथ-साथ उनका कठोर अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। तभी उन लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने ऐसी दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाई है और तभी हम एक सुरक्षित समाज की दिशा में वास्तविक कदम बढ़ा सकेंगे।

Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal