राजा राममोहन राय जयंती (22 मई) पर विशेष
(डॉ. एस.के. गोपाल)
भारतीय समाज का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उन लोगों का भी इतिहास है जिन्होंने समय से आगे जाकर सोचा और समाज से ऐसे सवाल पूछे जिन्हें पूछने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं। राजा राममोहन राय ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्हें आधुनिक भारत का अग्रदूत कहा जाता है। आज हम महिला अधिकार, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक समानता की बातें सहज रूप से करते हैं वह सब अचानक नहीं आया। इसके पीछे लंबे संघर्षों की एक परंपरा रही है। राजा राममोहन राय उस परंपरा के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में थे। उन्होंने ऐसे समय में बदलाव की बात की, जब समाज का बड़ा हिस्सा बदलाव को धर्म और परंपरा के खिलाफ मानता था।
कहा जाता है कि अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज अनेक प्रकार की जड़ताओं से घिरा हुआ था। जातिगत ऊँच-नीच, महिलाओं की दयनीय स्थिति, अंधविश्वास, कर्मकांड और धार्मिक कट्टरता समाज को भीतर से कमजोर कर रहे थे। शिक्षा सीमित वर्ग तक सिमटी थी। समाज में जो प्रचलित था, वही सत्य माना जाता था। ऐसे समय में राजा राममोहन राय ने परंपराओं को आँख बंद करके स्वीकार करने से इनकार किया। उन्होंने यह कहने का साहस किया कि हर पुरानी चीज केवल इसलिए सही नहीं हो जाती क्योंकि वह पुरानी है। यही बात उन्हें अपने समय से अलग बनाती है।
22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर गाँव में जन्मे राजा राममोहन राय बचपन से ही जिज्ञासु और अध्ययनशील थे। उन्होंने संस्कृत, फारसी, अरबी और अंग्रेजी का अध्ययन किया। विभिन्न धर्मों और दर्शन को पढ़ते हुए उनके भीतर एक व्यापक दृष्टि विकसित हुई। वे केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि चिंतनशील मन के स्वामी थे। शायद यही कारण था कि वे समाज को केवल परंपरा की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता और विवेक की दृष्टि से देखने लगे।
राजा राममोहन राय के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सती प्रथा के विरुद्ध उनका संघर्ष माना जाता है। आज के समय में यह कल्पना करना कठिन है कि कभी भारतीय समाज में ऐसी व्यवस्था भी थी जहाँ पति की मृत्यु के बाद स्त्री को उसकी चिता पर जीवित जला दिया जाता था और इसे धार्मिक कर्तव्य कहा जाता था। दुखद यह था कि समाज का बड़ा हिस्सा इसे सामान्य मान चुका था। राजा राममोहन राय ने इस अमानवीय प्रथा को चुनौती दी। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर यह साबित करने का प्रयास किया कि सती प्रथा का कोई वास्तविक धार्मिक आधार नहीं है। लेकिन उनका संघर्ष केवल वैचारिक नहीं था। वे जानते थे कि समाज की सोच बदलना आसान नहीं होगा। उन्होंने लेख लिखे, लोगों से संवाद किया और शासन तक अपनी बात पहुँचाई। आखिरकार उनके प्रयासों और जनमत के दबाव के कारण तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 1829 में सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। यह केवल एक कानून ही नहीं था अपितु भारतीय समाज में मानवता की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम था।
राजा राममोहन राय महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के भी प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि जिस समाज में महिलाओं को सम्मान और शिक्षा नहीं मिलेगी, वह समाज कभी वास्तविक अर्थों में विकसित नहीं हो सकता। आज यह बात सामान्य लग सकती है लेकिन उस दौर में यह विचार बेहद साहसिक था। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, महिलाओं के संपत्ति अधिकार और स्त्री शिक्षा के पक्ष में लगातार आवाज उठाई। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने भारतीय समाज में महिला प्रश्न को पहली बार गंभीर सामाजिक प्रश्न के रूप में स्थापित किया।
राजा राममोहन राय शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं मानते थे। वे उसे समाज की मानसिक मुक्ति का साधन समझते थे। उनका मानना था कि यदि समाज को बदलना है तो लोगों की सोच बदलनी होगी और सोच शिक्षा से बदलती है। यही कारण था कि वे आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और तर्क आधारित अध्ययन के समर्थक बने। उन्होंने यह महसूस किया था कि भारत यदि दुनिया के साथ आगे बढ़ना चाहता है तो उसे केवल पारंपरिक ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आधुनिक विज्ञान और नए विचारों को अपनाना भी जरूरी है। उस समय उनके इस दृष्टिकोण का काफी विरोध हुआ लेकिन आगे चलकर यही सोच आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आधारभूमि बनी।
1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की। यह संस्था केवल धार्मिक सुधार का मंच ही नहीं थी अपितु सामाजिक चेतना का आंदोलन थी। ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा, जातिगत भेदभाव और धार्मिक कट्टरता का विरोध किया। उसका मूल संदेश था—एक ईश्वर, मानव समानता और नैतिक जीवन। यहाँ यह समझना जरूरी है कि राजा राममोहन राय किसी धर्म के विरोधी नहीं थे। वे धर्म के नाम पर फैली संकीर्णता और अंधविश्वास के विरोधी थे। उन्होंने भारतीय परंपरा को पूरी तरह खारिज नहीं किया अपितु उसके भीतर सुधार की संभावनाएं खोजीं। यही कारण है कि उनके विचारों में टकराव कम और संवाद अधिक दिखाई देता है।
राजा राममोहन राय आधुनिक भारतीय पत्रकारिता के भी महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने समाचार पत्रों को समाज जागरण का माध्यम बनाया। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर थे और अंग्रेजी शासन द्वारा प्रेस पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों का विरोध करते थे। आज जब हम लोकतंत्र और विचारों की स्वतंत्रता की बात करते हैं तब यह याद रखना चाहिए कि उस दौर में सत्ता के खिलाफ बोलना आसान नहीं था। लेकिन राजा राममोहन राय ने यह जोखिम उठाया। उनका महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने कुछ सामाजिक सुधार किए। उनका वास्तविक महत्व इस बात में है कि उन्होंने भारतीय समाज को सोचने की नई आदत दी। उन्होंने लोगों को यह एहसास कराया कि समाज में जो कुछ चल रहा है, उस पर प्रश्न भी उठाए जा सकते हैं।
आज के समय में भी उनके विचार बेहद प्रासंगिक लगते हैं। तकनीक और सोशल मीडिया के इस दौर में सूचना तेजी से फैलती है लेकिन उसके साथ भ्रम और अंधविश्वास भी फैलते हैं। समाज आज भी कट्टरता, लैंगिक असमानता और सामाजिक विभाजन जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजा राममोहन राय की तार्किक दृष्टि और मानवीय सोच पहले से अधिक जरूरी लगती है। उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि समाज परिवर्तन केवल कानून बना देने से नहीं होता। उसके लिए सामाजिक चेतना पैदा करनी पड़ती है। लोगों को सोचने और सवाल करने की आदत डालनी पड़ती है। वर्ष 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल नगर में उनका निधन हुआ लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। वे केवल इतिहास के एक अध्याय का नाम नहीं हैं। वे भारतीय समाज की उस पहली बेचैनी का नाम हैं जिसने अंधविश्वास और जड़ता से बाहर निकलकर आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाने का साहस किया।
भारतीय समाज जब भी शिक्षा, महिला सम्मान, सामाजिक सुधार और आधुनिक चेतना की बात करेगा तब राजा राममोहन राय का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा। उन्होंने यह साबित किया कि समाज को बदलने के लिए केवल सत्ता नहीं, विचार और साहस भी चाहिए।

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