नेताजी बेहद मायूस और उदास थे. एकटक शून्य में निहारे जा रहे थे. चेहरे पर कोई भाव नहीं. पास बैठे उनके खास सलाहकार जागीर वनवासिया जी को भी कुछ सूझ नहीं रहा था कि नेताजी भाई साहब का मन कैसे बहलाया जाये. वनवासियाजी को लगा कि कहीं नेताजी की भाभीजी से लड़ाई तो नहीं हो गई है, जो इतने उदास बैठे हुए हैं. उन्होंने चुपके से नेताजी की प्रेमिका को मैसेज किया कि एक बार नेताजी से बात कर लीजिये वह बहुत दुखी लग रहे हैं.
प्रेमिका ने खटाक से नेताजी को फोन मिला लिया. नेताजी ने मोबाइल स्क्रीन पर देखा और फिर मुंह फेर लिया. वनवासिया जी परेशान हो गये. उन्होंने नेताजी से निवेदन किया कि नेताजी फोन उठा लिया जाये, क्या पता कोई जरूरी बात हो, लेकिन नेताजी ने अपने खास सलाहकार की भी नहीं सुनी. कुछ देर घनघनाने और वाइब्रेशन के चलते टेबल पर अपना पिछवाड़ा रगड़ने के बाद फोन शांत हो गया. नेताजी आज प्रेमिका या सलाहकार किसी से बात करने या सुनने के मूड में नहीं थे.
वनवासिया जी अभी कुछ और सोचते, तभी उनका सहयोगी दरवाजा खोल कर नेताजी के खास मित्र मंत्रीजी को लेकर अंदर आ गया. खास मित्र नेताजी के इतने बड़े लंगोटिया यार थे कि वह उनके सुख और दुख को एक झटके में पढ़ लेने वाले बेहद उम्दा पाठक थे. कमरे के अंदर आते ही उन्होंने नेताजी के चेहरे का भाव पढ़ लिया. उन्होंने नेताजी से कहा, ‘’भाई साहब आप क्यों दुखी हो रहे हैं? हम और आप मिलकर ग्यारह हैं, फिर आप इतना दुखी और परेशान क्यों हैं?’’
‘’भाई साहब, अब बताइये कितना दिन रहने के बाद हमारी पार्टी ने दस दिन पहले मंत्री पद की कसम दिलवाई और अब हमें कोई विभाग तक नहीं दे रहे हैं. बताइये ऐसा अन्याय होता है कहीं?’’ अभी मंत्रीजी कोई जवाब देते उसके पहले ही वनवासियाजी बीच में कूद पड़े, ठीक वैसे ही जैसे हनुमान जी पूंछ में आग लगाये जाने के बाद लंका में कूद पड़े थे, ‘’भाई साहब आपकी लोकप्रियता देखते हुए लगता है कि आपको अच्छा विभाग मिलने वाला है, इसीलिये देर हो रही है.’’
नेताजी ने कातर निगाहों से वनवासिया जी को देखा फिर मंत्रीजी की तरफ देखने लगे. मंत्री जी ने कहा, ‘’भाई साहब, आप बेकार में परेशान हो रहे हैं. विभाग मिलने पर बहुत टेंशन होता है, जिम्मेदारी बढ़ जाती है. जनता चोर और भ्रष्ट है, उसकी अपेक्षायें हम विभागीय मंत्रियों से ज्यादा हो जाती है. मुझे ही देख लीजिये कि मेरे विभाग में इतना काम है कि मुझसे अकेले सम्भलता ही नहीं है. आपकी भाभीजी और हमारे साले की मदद ना मिलती तो विभाग चलाना ही मेरे लिये असंभव था.’’
‘’तो फिर कैसे हमलोगों का काम चलेगा? चुनाव भी आने वाला है, जब काम ही नहीं होगा तो फिर मंत्री बनने का क्या फायदा’’, नेताजी ने उदासी भरे स्वर मे कहा? मंत्रीजी उनकी तकलीफ समझते हुए कहा,’’अरे कौन सा आपने चुनाव लड़ना है. दाम तो बिना विभाग के भी मिल सकता है. आप अभी मंत्री हैं बिना विभाग के, इसलिये आपका हक, आपकी जिम्मेदारी एवं दायित्व भी बनता है कि आप जो कोई भी मंत्रालय खाली देखें, जिसमें मंत्री ना बैठा हो, वहां बैठकर उसके विभाग की फाइलें निपटा दें.’’
‘’यह कैसे संभव है’’, नेताजी ने जिज्ञासा से पूछा? तब मंत्रीजी ने समझाया, ‘’देखिये, विभाग मिलने का मतलब कि आप शादीशुदा हो गये, और एक ही पत्नी के चंगुल में फंस गये. एक जगह बंध गये, जो करना है वहीं करना है, जबकि अभी बिना विभाग के आप एकदम कुंवारे टाइप हैं. कोई रोक-टोक नहीं, साले का भी कोई झंझट नहीं. जो मन करे वो खाइये, जब मन करे आइये-जाइये कोई रोकने या टोकने वाला नहीं है. जहां मन करे, वहां साइन करिये, एकदम से बिंदास जिंदगी.’’
नेताजी के के उदास चेहरे पर चमक उभर आई. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘’बात तो आपने बड़ी शानदार कही है, जरा विस्तार से तस्करा डालिये.’’ तब मंत्रीजी ने कहा, ‘’देखिये, आप मंत्री वाला कसम तो खा चुके हैं, विभाग आपके पास कोई है नहीं, तो जनता की जिम्मेदारी से आप मुक्त हैं. वैसे भी चुनाव लड़ना नहीं है तो आपने जनता का कोई टेंशन ही नहीं लेना है. जनता टेंशन ले तो लेती रहे, आपको तो कोई टेंशन ही नहीं लेना है. आपको बस सुबह मुंह उठाकर मंत्रालय जाने का टेंशन लेना है.’’
नेताजी ने खटाक से पूछा, ‘’मंत्रालय जाने का मतलब नहीं समझा.’’ तब मंत्री जी ने कहा, ‘’आप रोज मंत्रालय जाइये, और देखिये कि किस मंत्रालय का मंत्री अपने ऑफिस में नहीं बैठा है, वहां जाकर बैठ जाइये. कर्मचारियों को अपना मंत्री वाला कार्ड दिखाइये, फिर उनसे फाइल मंगाकर काम निपटाइये. जो भी विभाग खाली हो वहां बैठ जाइये. अपने लोगों को ठेका दीजिये. कभी पीडब्ल्यूडी चले जाइये, कभी सिंचाई चले जाइये, कभी आबकारी चले जाइये, कभी कहीं चले जाइये. खुल्ला सांड़ टाइप.’’
नेताजी उछलते, उसके पहले ही वनवासिया जी उछल पड़े, ‘’बहुत सही बात कही मंत्री जी आपने, इससे आप ज्यादा से ज्यादा विभागों के जरिये अधिक से अधिक लोगों की सेवा कर पायेंगे. साथ ही बिना विभाग के होने के चलते आप पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप भी नहीं लगा पायेगा. आपको विभाग मिल जायेगा तो आप पर भ्रष्टाचार का आरोप पक्का लगेगा, ऐसे में बिना विभाग के आप पाक साफ बचे रहेंगे, और जहां मन करेगा, वहां बैठ जायेंगे. बाकी हम देख लेंगे.’’
नेताजी के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान आ गई. उन्होंने तय किया कल सबेरे ही वह तैयार होकर पीडब्ल्यूडी के लिये निकलेंगे और इस बार टेंडर जागू महासभा के अवाना साहब को देंगे. वही भरोसे के आदमी हैं, नहीं तो आज के समय में भरोसे के आदमियों का बेहद अभाव है. इधर, वनवासिया जी ने मन ही मन तय किया कि मंत्री जी कल यदि आबकारी में बैठते हैं तो दो दुकान अपने जिले में सेंक्शन करा लूंगा. मंत्रीजी निश्चिंत थे कि पत्नी के ट्रांसफर पोस्टिंग देख लेने से उनकी जिम्मेदारी कितनी कम हो गई है!
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