Thursday , April 9 2026

संस्कृति को सशक्त बनाने का संकल्प

(डॉ.एस.के. गोपाल)

भारतेंदु नाट्य अकादमी ने उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक परिदृश्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। रंगमंच के माध्यम से समाज की संवेदनाओं को व्यक्त करना, नई प्रतिभाओं को मंच देना और कला के प्रति लोगों की रुचि को विकसित करना, ये सभी कार्य इस संस्था ने निरंतर किए हैं। यहां से निकलकर अनेक कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इस दृष्टि से यह अकादमी केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं अपितु सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रही है। पचास वर्षों की यात्रा केवल समय का विस्तार नहीं, यह साधना, समर्पण और निरंतर सृजन की सजीव गाथा है जिसने रंगमंच को समाज से जोड़े रखा और उसे जीवंत बनाए रखा। इस यात्रा में अनेक पीढ़ियों का योगदान समाहित है जिसने इस संस्था को परंपरा और प्रयोग दोनों का संगम बनाया है।

हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में आयोजित स्वर्ण जयंती नाट्य समारोह का शुभारंभ किया। इस अवसर पर अकादमी के भवन और प्रेक्षागृहों के जीर्णोद्धार कार्यों का लोकार्पण हुआ। पूर्व विद्यार्थियों, वरिष्ठ रंगकर्मियों और कलाविदों का सम्मान किया गया तथा ‘रंगवेद’ पत्रिका का विमोचन हुआ। यह सब मिलकर इस बात का संकेत देता है कि सांस्कृतिक संस्थाओं को नई ऊर्जा देने का प्रयास हो रहा है। मुख्यमंत्री ने भारतीय महापुरुषों के जीवन पर आधारित लघु नाटकों के लेखन और मंचन का आह्वान किया और विद्यालयों में सप्ताह में एक दिन सांस्कृतिक मंचन की बात कही। यह पहल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

इन प्रयासों के साथ कुछ व्यावहारिक प्रश्न भी सामने आते हैं। सरकारी प्रेक्षागृहों का किराया आज भी अनेक रंगकर्मियों के लिए बाधा बना हुआ है। सीमित संसाधनों में काम करने वाले कलाकार अच्छे विचारों के बावजूद मंच तक नहीं पहुंच पाते। यदि प्रेक्षागृह रियायती दर पर उपलब्ध कराए जाएं तो अधिक प्रस्तुतियां संभव होंगी और नई प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा। इसी प्रकार संस्कृति विभाग से जुड़े संस्थानों में लंबे समय से कई महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। इसका सीधा प्रभाव कार्य की गति और गुणवत्ता पर पड़ता है। नियुक्ति प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना आवश्यक है ताकि संस्थान पूरी क्षमता से कार्य कर सकें और योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू हो सकें।

यह भी उतना ही जरूरी है कि सरकारी आयोजन केवल औपचारिकता बनकर न रह जाएं। उनका उद्देश्य स्पष्ट हो और उनका प्रभाव दीर्घकालिक हो। कला और संस्कृति के क्षेत्र में किए जाने वाले प्रयासों में निरंतरता और गंभीरता आवश्यक है। कलाकारों को मंच मिले, दर्शकों को सार्थक प्रस्तुति मिले और समाज को विचार मिले, तभी ऐसे आयोजनों का वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा। मुख्यमंत्री की मंशा भी यही प्रतीत होती है कि संस्कृति को केवल अवसर विशेष का विषय न मानकर जनजीवन का हिस्सा बनाया जाए।

नाटक और रंगमंच समाज के दर्पण होते हैं। वे केवल मनोरंजन नहीं करते अपितु सोचने की दिशा देते हैं और संवेदनाओं को जागृत करते हैं। ऐसे में रंगमंच को सशक्त करना समाज को सशक्त करना है। आज आवश्यकता है कि पारंपरिक कला रूपों को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया जाए जिससे नई पीढ़ी उनसे जुड़ सके। साथ ही यह भी जरूरी है कि उनकी मूल आत्मा सुरक्षित रहे।

सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तार शहरों से आगे बढ़कर कस्बों और गांवों तक होना चाहिए। वहां प्रतिभा की कमी नहीं है, केवल अवसरों का अभाव है। यदि मंच और मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो अनेक नई संभावनाएं सामने आ सकती हैं। भारतेंदु नाट्य अकादमी जैसे संस्थान इस दिशा में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं और सांस्कृतिक प्रवाह को व्यापक बना सकते हैं।

संस्कृति को सशक्त बनाने के लिए केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं अपितु इच्छाशक्ति, प्रतिबद्धता और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। जब प्रेक्षागृह सुलभ होंगे, संस्थान सशक्त होंगे, कलाकारों को अवसर मिलेगा और आयोजन उद्देश्यपूर्ण होंगे, तब संस्कृति अपने वास्तविक रूप में समाज के जीवन का हिस्सा बनेगी। यही इस अवसर का सार है और यही हमारा सामूहिक संकल्प होना चाहिए।

(लेखक डा. एस.के. गोपाल कला समीक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)