लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। बात चाहे मूर्तिकला, हस्तकला, चित्रकारी की हो या अन्य कला की, आज भी कई कारीगर ऐसे हैं जो अपने पुरखों के काम को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं और उसे अपनी आजीविका का साधन बना रहे हैं। यही नहीं ये कलाकार देशभर में अलग-अलग काम कर पुरानी विधाओं को आज भी जीवंत किए हुए हैं। ऐसे ही बुनकरों और हस्त शिल्पियों की अद्भुत कलाओं का संगम इन दिनों लखनऊ के निराला नगर में स्थित सरस्वती विद्या मंदिर के माधव सभागार में देखने को मिल रहा है।
माधव सभागार में चल रही मध्य प्रदेश मृगनयनी प्रदर्शनी हस्तशिल्प एवं हथकरघा मेले में चंदेरी, बाघ एवं महेश्वरी के बुनकर अपने हुनर को पेश कर रहे हैं। जिनके द्वारा स्वयं के हाथों से गढ़ी साड़ी एवं सूट्स की विभिन्न वैरायटी हैं। वहीं हथकरघा की वस्तुओं की लखनऊवासी बहुत सराहना भी कर रहे हैं। वहीं प्रदर्शनी में भीड़ उमड़ रही है और लोग खासकर महिलाये जमकर खरीदारी भी कर रही है।

इस प्रदर्शनी में 16 कलाकार चंदेरी और 4 कलाकार बाघ प्रिंट के साथ पहुंचे हैं। जिसमें चंदेरी जिले से आए आशा राम अहिरवार, लाला राम अहिरवार, मनीष अहिरवार के अलावा मो. अनस, मो. अशद और मो. रजा चंदेरी प्रिंट की साड़ियां और सूट लेकर आए हैं। वहीं खंडवा के तेज बहादुर सिंह छपाई प्रिंट हैंडलूम साड़ियां और सूट लेकर आए हैं।
जबकि राष्ट्रपति पदक विजेता धार जिले के युसूफ खत्री की टीम के सदस्य अतीक ODOP में शामिल बाघ प्रिंट की आकर्षक साड़ियां और सूट लेकर आए हैं। जिसमें वह महेश्वरी सिल्क डिजाइनर सूट और मोडाल बाघ प्रिंट पहली बार लेकर आए हैं।
चंदेरी प्रिंट : परंपरा और शाही अंदाज का अनूठा संगम
भारतीय पारंपरिक वस्त्रों की दुनिया में चंदेरी प्रिंट और कपड़े का विशेष स्थान है। मध्य प्रदेश के चंदेरी शहर से जुड़ी यह कला अपनी हल्की, पारदर्शी बनावट और आकर्षक डिजाइनों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

चंदेरी वस्त्रों का इतिहास भी काफी समृद्ध रहा है। प्राचीन काल में यह कपड़ा राजघरानों की पहली पसंद हुआ करता था, जिसके कारण इसे शाही परिधान के रूप में भी जाना जाता है। वर्तमान समय में चंदेरी साड़ियां, सलवार सूट, दुपट्टे और इंडो-वेस्टर्न परिधानों में इसका व्यापक उपयोग किया जा रहा है। चंदेरी प्रिंट और कपड़ों की सबसे बड़ी पहचान उनकी हल्की पारदर्शिता, आकर्षक डिजाइन और पारंपरिक शिल्प का आधुनिक रूप है, जो इसे हर वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बना रहा है।
महेश्वरी प्रिंट : सादगी और परंपरा का आकर्षक संगम
मध्य प्रदेश के महेश्वर से जुड़ी यह कला अपनी सादगी, हल्के वजन और आकर्षक डिजाइनों के लिए जानी जाती है। महेश्वरी वस्त्र मुख्य रूप से सिल्क और कॉटन के मिश्रण से तैयार किए जाते हैं, जो इन्हें पहनने में हल्का और आरामदायक बनाते हैं। खासकर गर्म मौसम में इसकी मांग अधिक रहती है। इसकी एक विशेष पहचान इसका रिवर्सिबल बॉर्डर है, जिसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है।

महेश्वरी साड़ियों का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है, जब अहिल्याबाई होल्कर ने महेश्वर में बुनकरों को बसाकर इस कला को बढ़ावा दिया। उनके प्रयासों से यह परंपरा आज भी जीवित है और देश-विदेश में अपनी पहचान बनाए हुए है। आज के समय में महेश्वरी साड़ियां, दुपट्टे, सलवार सूट और कुर्तों के रूप में व्यापक रूप से उपयोग की जा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी सादगी, हल्कापन और पारंपरिक डिजाइन इसे रोजमर्रा से लेकर विशेष अवसरों तक पहनने के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
धार के बाघ से दुनिया तक : पारंपरिक बाघ प्रिंट की अनूठी विरासत
मध्यप्रदेश के धार जिले के छोटे से कस्बे ‘बाघ’ से जुड़ी बाघ प्रिंट कला आज देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। इस पारंपरिक हस्तकला का नाम भी इसी कस्बे पर आधारित है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार लगभग 1000 वर्ष पूर्व सिंथ (वर्तमान पाकिस्तान) से विस्थापित होकर आए कारीगरों ने यहां इस कला को विकसित किया। उस दौर की विपरीत परिस्थितियों और शासकों की तानाशाही के बीच पनपी यह कला सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के प्रभाव से भी प्रभावित रही है।

बाघ छपाई की प्रक्रिया बेहद जटिल और श्रमसाध्य मानी जाती है। एक कपड़े को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 25 से 30 दिन का समय लगता है, जिसमें कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इस कला की खासियत यह है कि इसमें केवल प्राकृतिक सामग्री का ही उपयोग किया जाता है।
प्रक्रिया की शुरुआत ‘खारा पद्धति’ से होती है, जिसमें कपड़े को सनचोरा (समुद्री नमक), अरंडी के तेल और बकरी की मैंगनी (गोबर) के मिश्रण में डुबोकर सुखाया जाता है। यह प्रक्रिया तीन बार दोहराई जाती है। इसके बाद कपड़े को बहेड़ा (हरेड़ा) पाउडर के घोल में डुबोया जाता है, जिससे रंगों को पकड़ने की क्षमता बढ़ती है।

बाघ प्रिंट की पहचान उसके प्राकृतिक रंगों से होती है। लाल रंग फिटकरी और इमली के बीज से तैयार किया जाता है, जबकि काले रंग के लिए लोहे के बुरादे और गुड़ को 15 से 20 दिनों तक मिलाकर रखा जाता है। छपाई के लिए विभिन्न प्रकार के लकड़ी के ब्लॉक्स जैसे कोर, साज, बोद, कलम और बुर्रा का उपयोग किया जाता है।
छपाई के बाद कपड़े को करीब 15 दिनों तक सुखाया जाता है। इसके पश्चात उसे बहते नदी के पानी में धोकर धावली फूलों और अलीजरीन (आल वृक्ष की जड़) के मिश्रण में तांबे की कढ़ाई में उबाला जाता है, जिससे रंग स्थायी और चमकदार बनते हैं।
आज बाघ प्रिंट केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि कारीगरों की मेहनत, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बन चुका है। जब भी आप बाघ प्रिंट के वस्त्र पहनें, उस अनदेखे कारीगर के समर्पण और कला को जरूर याद करें, जिसने अपनी मेहनत से इसे जीवंत बनाया है।
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