नई दिल्ली (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। 8वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन (ICSE) 2026 का नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आगाज हुआ। मोबियस फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस की थीम “Sustainability Education for Transformative Action” है। इसमें नीति-निर्माताओं, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, इंडस्ट्री लीडर्स, पर्यावरण विशेषज्ञों और युवाओं ने हिस्सा लिया।
कॉन्फ्रेंस ऐसे समय में शुरू हुई है, जब नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई अचानक बाढ़ ने एक बार फिर जलवायु संकट की गंभीरता को सामने रखा है। उद्घाटन सत्र में कई वक्ताओं ने इस आपदा का जिक्र करते हुए कहा कि जलवायु संकट अब भविष्य का कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता बन चुका है। दो दिनों तक चलने वाली कॉन्फ्रेंस में क्लाइमेट एक्शन, ग्रीन स्किल्स, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, बायोडायवर्सिटी और सस्टेनेबल आजीविका जैसे विषयों पर चर्चा होगी। इसके साथ ही देशभर के स्टूडेंट्स और युवा क्लाइमेट लीडर्स के लिए विशेष यूथ प्रोग्राम भी आयोजित किए जाएंगे।
भारत ने की प्रगति, लेकिन कमिटमेंट और एक्शन के बीच अंतर : प्रदीप बर्मन
मोबियस फाउंडेशन के चेयरमैन प्रदीप बर्मन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि भारत ने क्लाइमेट एक्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन क्लाइमेट कमिटमेंट और उन्हें जमीन पर लागू करने के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि 2025 में भारत ने अपनी इंस्टॉल्ड बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत नॉन-फॉसिल सोर्स से हासिल कर लिया, जो 2030 के लक्ष्य से पांच साल पहले है। देश की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता भी 290 गीगावॉट को पार कर चुकी है। उन्होंने इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
उन्होंने बताया कि 2019 में शुरुआत के बाद ICSE एक यूथ एंगेजमेंट प्लेटफॉर्म से आगे बढ़कर क्लाइमेट लिटरेसी और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देने वाला मंच बन गया है। इसके तहत पानी पहाड़ करिकुलम और नॉर्थ-ईस्ट में Mobius Young Climate Leaders Programme जैसी पहलें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे आइडिया चाहते हैं जो पार्टनरशिप बनें, ऐसी पार्टनरशिप जो कमिटमेंट में बदलें और ऐसे कमिटमेंट जो एक्शन में तब्दील हों।
सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ पर्यावरण का विषय नहीं : प्रियंका शर्मा
मोबियस फाउंडेशन की प्रेसिडेंट और CEO प्रियंका शर्मा ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं रह गया है। यह इस बात से जुड़ा है कि हम कैसे रहते हैं, कैसे सीखते हैं, कैसे काम करते हैं और लोगों व धरती के लिए बेहतर जीवन कैसे सुनिश्चित करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस साल का एजेंडा क्लासरूम एजुकेशन से आगे बढ़कर ग्रीन इकॉनमी पर फोकस कर रहा है। इसमें क्रिटिकल मिनरल्स, ई-वेस्ट और बैटरी रीसाइक्लिंग, सस्टेनेबल खेती और ग्रीन जॉब्स जैसे विषय शामिल हैं।
यमुना मर चुकी है : सुनीता नारायण
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की डायरेक्टर जनरल और पद्म श्री से सम्मानित सुनीता नारायण ने जलवायु संकट को लेकर बेहद गंभीर चिंता जताई। उन्होंने नेपाल की आपदा को दशकों से चली आ रही उस इंजीनियरिंग सोच से जोड़ा, जिसमें माना जाता रहा कि नदियों और पहाड़ों को अपनी जरूरत के हिसाब से बदला जा सकता है।
उन्होंने IMD के आंकड़ों के अपनी संस्था द्वारा किए गए विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा कि भारत में लगभग हर दिन कोई न कोई गंभीर मौसम की घटना हो रही है। यमुना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रवेश के समय नदी में घुली ऑक्सीजन का स्तर करीब 6 रहता है, लेकिन ISBT पहुंचते-पहुंचते यह शून्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ भावना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों से पता चलता है कि यमुना मर चुकी है।
उन्होंने कहा कि आज के अस्तित्व के संकट को दूर करने के लिए हमें और रिपोर्ट या छोटे-छोटे कदमों की जरूरत नहीं है। दिल्ली के वायु प्रदूषण पर उन्होंने कहा कि सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना होगा, ताकि लोगों को निजी वाहनों से सफर करने की जरूरत ही न पड़े।
पर्यावरण शिक्षा को जमीन से जोड़ने की जरूरत : कार्तिकेय साराभाई
CEE के फाउंडर डायरेक्टर और पद्म श्री अवार्डी कार्तिकेय साराभाई ने कॉन्फ्रेंस को पर्यावरण शिक्षा के लंबे सफर से जोड़ते हुए कहा कि यह आयोजन 1977 की त्बिलिसी कॉन्फ्रेंस की 50वीं सालगिरह के करीब हो रहा है, जहां पहली बार एनवायरनमेंटल एजुकेशन की दिशा और परिभाषा तय की गई थी।
उन्होंने कहा कि 1972 के स्टॉकहोम कॉन्फ्रेंस में भारत ने गरीबी और पर्यावरण को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया था। उन्होंने मिशन LiFE के तहत ईको क्लबों का जिक्र करते हुए कहा कि 2030 तक हर भारतीय स्कूल में एक ईको क्लब बनाने का लक्ष्य है। उन्होंने यह भी बताया कि NCF 2023 की नई टेक्स्टबुक में पहली बार 10वीं कक्षा में एनवायरनमेंटल एजुकेशन को अनिवार्य किया गया है।
साराभाई ने सुझाव दिया कि हर स्कूल और संस्थान को एक वर्ग किलोमीटर जमीन गोद लेकर वहां करीब 30 SDGs को सीधे लागू करने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में एनवायरनमेंटल एजुकेशन पर होने वाला कुल खर्च अभी भी किसी एक साबुन ब्रांड के विज्ञापन बजट से कम है।
युवा पीढ़ी को संसाधनों की कीमत चुकानी पड़ रही : डॉ. विभा धवन
TERI की डायरेक्टर जनरल डॉ. विभा धवन ने छात्रों से सीधे संवाद करते हुए अपनी पीढ़ी की ओर से माफी मांगी। उन्होंने कहा कि दशकों तक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया गया और अब उसकी कीमत युवा पीढ़ी को चुकानी पड़ रही है।
उन्होंने रोजमर्रा की बदलती आदतों का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले ट्रेन में सफर के दौरान लोग नल के पानी से सुराही भर लेते थे, जबकि आज बोतलबंद पानी खरीदना आम बात हो गई है। दिल्ली के वायु प्रदूषण का जिक्र करते हुए उन्होंने इसकी तुलना रोजाना 30 सिगरेट पीने से की।
उन्होंने स्कूल ट्रांसपोर्ट की समस्या पर भी ध्यान दिलाया और कहा कि स्कूल बसों की ज्यादा फीस के कारण कई परिवार बच्चों को निजी कार से स्कूल भेजते हैं। इससे वही ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ता है, जिसे स्कूल बसें कम करने में मदद कर सकती हैं।
कहानियों के जरिए सस्टेनेबिलिटी समझाने पर जोर
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो-वाइस चांसलर और पॉलिटिकल इकोनॉमी के प्रोफेसर प्रो. भास्कर वीरा ने ‘Embers of Hope’ नाम की 10 हिस्सों वाली डॉक्यूमेंट्री सीरीज का जिक्र किया। इसे उन्होंने मोबियस फाउंडेशन, फिल्ममेकर रॉबिन रॉय और नैरेटर जीनत अमान के साथ मिलकर तैयार किया है और इसका प्रसारण Warner Bros. Discovery Network के जरिए किया गया।

उन्होंने कहा कि इस प्रोजेक्ट में सबसे असरदार शैक्षणिक अनुभव विज्ञान को सिर्फ समझाने से नहीं, बल्कि उसे इंसानी कहानियों से जोड़ने से मिला। उन्होंने चेतावनी दी कि सिर्फ तकनीक के भरोसे पर्यावरण संकट के समाधान की उम्मीद करना “false hope” है। साथ ही उन्होंने निराशा से बचने की जरूरत पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, “सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन का उद्देश्य सिर्फ छात्रों को पर्यावरण से जुड़ी जानकारी देना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें ऐसे नागरिक के रूप में तैयार करना भी होना चाहिए, जो इन बदलावों को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभा सकें।”
55% बच्चे जलवायु के कई जोखिमों से प्रभावित : UNICEF
UNICEF के रिसोर्स मोबिलाइजेशन एंड पार्टनरशिप्स के चीफ बो बेस्कजेर ने भारत के बच्चों पर जलवायु संकट के बढ़ते असर को सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारत में 47 करोड़ से ज्यादा बच्चे हैं और यह दुनिया में बच्चों की सबसे बड़ी आबादी है। UNICEF के अनुमान के मुताबिक, इनमें से 55% बच्चे हीट वेव, पानी की कमी और बाढ़ जैसे कई जलवायु जोखिमों का एक साथ सामना कर रहे हैं।
उन्होंने इस स्थिति को समझाने के लिए इस साल पैदा होने वाली एक काल्पनिक लड़की ‘प्रीति’ का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट का असर 2030 तक उसकी पढ़ाई और 2047 तक उसके वयस्क जीवन पर पड़ सकता है। उन्होंने क्लाइमेट रेजिलिएंट वॉटर सिस्टम में निवेश बढ़ाने की अपील की और कहा कि भारत में अभी भी करीब 6 करोड़ परिवारों को नियमित रूप से सुरक्षित पीने का पानी उपलब्ध नहीं है।
पर्यावरण शिक्षा का सफर लंबा, लेकिन बदलाव जारी : WWF India
WWF India के सेक्रेटरी जनरल और CEO रवि सिंह ने बताया कि WWF India का एनवायरनमेंटल एजुकेशन कार्यक्रम 1970 में दिल्ली के म्युनिसिपल स्कूलों से शुरू हुआ था और बाद में महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों तक पहुंचा।
उन्होंने कहा कि शुरुआती कार्यक्रमों से जुड़े कई छात्र आज सरकार, कॉरपोरेट जगत और एनफोर्समेंट एजेंसियों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में सस्टेनेबिलिटी का मुद्दा हाशिए से निकलकर मुख्यधारा में आया है और अब CII जैसी इंडस्ट्री बॉडीज की कोर स्ट्रेटेजी का हिस्सा बन चुका है।उन्होंने कहा कि पिछले 15 सालों में बातचीत बदली है, पिछले 10 सालों में भी बदली है और फिर पिछले पांच सालों में एक बार फिर इसमें बदलाव आया है।
दो दिवसीय ICSE 2026 में आगे भी क्लाइमेट एक्शन, ग्रीन स्किल्स, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, बायोडायवर्सिटी, सस्टेनेबल आजीविका और युवाओं की भूमिका जैसे मुद्दों पर चर्चा जारी रहेगी।
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