(डॉ. एस. के. गोपाल)
इन दिनों लखनऊ की सांस्कृतिक चेतना श्रीराममय है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य की रामकथा में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु जुट रहे हैं। कथा का यह आयोजन धर्म, संस्कृति, इतिहास और लोकस्मृतियों के अनेक सूत्रों को एक साथ जोड़ता दिखाई देता है। गत एक जून को कथा के दौरान रामभद्राचार्य ने एक ऐसा कथन किया जिसने श्रोताओं को भावलोक में पहुंचा दिया। उन्होंने कहा कि आधी रात को यदि कोई शांत चित्त होकर गोमती तट पर बैठे तो उसे लक्ष्मण जी के दर्शन हो सकते हैं।
यह कथन आध्यात्मिक अनुभूति का विषय है। इसके भीतर लखनऊ की ऐतिहासिक स्मृति का भी एक गहरा संकेत निहित है। रामभद्राचार्य ने कथा मंच पर तत्काल एक गीत की रचना करते हुए गुनगुनाया- “लखनऊ को देख मुझे लगता अभी भी, यहीं कहीं लक्ष्मण मेरा जगता अभी भी।” इस एक पंक्ति में लखनऊ की सांस्कृतिक आत्मा की झलक मिलती है।
लोकमान्यता है कि लखनऊ का प्राचीन नाम लक्ष्मणपुर अथवा लखनपुर था। माना जाता है कि भगवान राम ने यह क्षेत्र अपने अनुज लक्ष्मण को प्रदान किया था। इतिहासकार इस विषय पर भिन्न मत रख सकते हैं किंतु जनस्मृति में लक्ष्मण और लखनऊ का संबंध आज भी जीवित है। नगरों की पहचान केवल अभिलेखों से निर्मित नहीं होती। लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराएं भी उनके व्यक्तित्व को आकार देती हैं।
रामभद्राचार्य ने कथा में लक्ष्मण टीला का उल्लेख किया और वहां भगवान लक्ष्मण का भव्य मंदिर बनाने की बात कही। लक्ष्मण टीला स्वयं में इतिहास, आस्था और विवाद का संगम है। वर्तमान में वहां टीले वाली मस्जिद स्थित है। इस स्थल को लेकर न्यायालय में वाद विचाराधीन है। जनश्रुतियों में यहां मंदिर होने तथा नागपंचमी के अवसर पर मेले लगने की चर्चा मिलती है। अतीत में यह स्थान साम्प्रदायिक तनाव का कारण भी बन चुका है। समय-समय पर विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों ने इस विषय को उठाया है, किंतु न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से आगे बढ़ रही है।
कुछ वर्ष पूर्व सुनने में आया था कि लक्ष्मण टीला क्षेत्र के निकट भगवान लक्ष्मण की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की योजना भी बनी थी। विरोध के कारण वह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। प्रश्न यह है कि क्या किसी नगर की सांस्कृतिक स्मृतियों को केवल विवादों के कारण उपेक्षित कर दिया जाना चाहिए? विरासत का संरक्षण किसी एक समुदाय का नहीं पूरे समाज का दायित्व होता है।
लखनऊ की पहचान केवल नवाबी इमारतों, इमामबाड़ों और तहजीब से नहीं बनती। इसकी जड़ें उससे कहीं अधिक गहरी हैं। गोमती नदी उन जड़ों की सबसे महत्वपूर्ण वाहक है। यही नदी इस नगर की जीवनरेखा है। इसी के किनारे बसावट विकसित हुई। इसी के तट पर संस्कृति ने आकार लिया। इसी ने लोकजीवन, भाषा और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया।
दुर्भाग्य से जिस गोमती तट को रामभद्राचार्य लक्ष्मण के जागरण का स्थल मानते हैं, उसकी वर्तमान दशा संतोषजनक नहीं कही जा सकती। गोमती को ‘आदि गंगा’ का सम्मान प्राप्त है। वर्षों से उसकी सफाई और पुनर्जीवन के प्रयास चल रहे हैं। भारी धनराशि भी व्यय हुई है फिर भी उसकी निर्मलता आज एक चुनौती बनी हुई है।
समाजवादी शासनकाल में आरंभ हुई रिवर फ्रंट परियोजना राजनीतिक विवादों का विषय बनी। जांच की प्रक्रिया वर्षों से चल रही है। बाद के वर्षों में ग्रीन कॉरिडोर जैसी योजनाओं ने यातायात की दृष्टि से सुविधाएं बढ़ाई हैं। विकास का मूल्यांकन केवल सड़कों और पुलों से नहीं किया जा सकता। किसी नदी का वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब उसका जल स्वच्छ हो, उसका प्रवाह अविरल हो और उसके तट सांस्कृतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र बनें।
प्रख्यात इतिहासविद् योगेश प्रवीन कहा करते थे कि संसार की महान सभ्यताएं नदियों के किनारे विकसित हुई हैं। गोमती के बिना लखनऊ की कल्पना अधूरी है। इसी नदी ने नगर को जीवन दिया, पहचान दी और सांस्कृतिक व्यक्तित्व भी प्रदान किया। नवाबी दौर से बहुत पहले से यह धारा इस भूभाग की साक्षी रही है।
लोकमान्यता है कि वनगमन के समय माता सीता ने मनकामेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। ऐसी मान्यताएं केवल धार्मिक आख्यान नहीं हैं। वे किसी नगर की सामूहिक स्मृति का हिस्सा होती हैं। नगर अपनी स्मृतियों से ही जीवित रहते हैं।
रामभद्राचार्य का कथन कि “यहीं कहीं लक्ष्मण मेरा जगता अभी भी” वस्तुतः लखनऊ की सांस्कृतिक चेतना का स्मरण है। लक्ष्मण त्याग, सेवा, अनुशासन और जागरण के प्रतीक हैं। यदि ये मूल्य समाज में विद्यमान हैं तो लक्ष्मण भी यहीं हैं।
आज आवश्यकता किसी नए विवाद को जन्म देने की नहीं अपितु गोमती और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की है। नदी स्वच्छ हो, तट जीवंत हों और इतिहास सम्मान के साथ स्मरण किया जाए। तब शायद आधी रात के सन्नाटे में गोमती की लहरों के साथ हमें उन पदचापों की आहट भी सुनाई दे जिन्होंने कभी लक्ष्मणपुर को लखनऊ बनाया था।

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