बशीर बद्र की शायरी का उजाला और हमारी स्मृतियों का संसार

स्मृति शेष

सदी की धरोहर है बशीर बद्र की शायरी

(डॉ. एस.के. गोपाल)

कुछ लोग अपने जीवनकाल में ही ऐसे मुकाम पर पहुंच जाते हैं जहाँ उनका नाम केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह जाता बल्कि एक एहसास, एक विचार और एक सांस्कृतिक विरासत बन जाता है। बशीर बद्र ऐसे ही शायर थे। उन्होंने अपनी शायरी से न केवल उर्दू अदब को समृद्ध किया अपितु आम लोगों के जीवन, उनकी भावनाओं, रिश्तों, संघर्षों और सपनों को भी शब्द दिए। यही कारण है कि उनके शेर मुशायरों और साहित्यिक गोष्ठियों तक ही सीमित नहीं रहे, घर-परिवार की बातचीत, जनसभाओं, सामाजिक आंदोलनों, कला आयोजनों और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने। उनकी पंक्तियाँ लोगों की जुबान पर इस तरह चढ़ीं कि अनेक शेर लोकस्मृति का हिस्सा बन गए। आज जब बशीर बद्र हमारे बीच नहीं हैं तो ऐसा लगता है जैसे भाषा का एक आत्मीय स्वर, इंसानी रिश्तों की गर्माहट को बचाए रखने वाला एक संवेदनशील हृदय और जीवन को गहराई से देखने वाली एक दृष्टि हमसे विदा हो गई है।

अयोध्या में 15 फ़रवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र की शिक्षा-दीक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ से उन्होंने एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और मेरठ कॉलेज में उर्दू के अध्यापक रहे। कहा जाता है कि वर्ष 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में उनका घर और वर्षों की साहित्यिक साधना का बड़ा हिस्सा आग की भेंट चढ़ गया। इस त्रासदी के बाद उन्होंने भोपाल को अपना स्थायी निवास बनाया और जीवन के अंतिम वर्षों तक वहीं रहे। 28 मई 2026 को 91 वर्ष की आयु में भोपाल स्थित अपने निवास पर उनका निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और डिमेंशिया नामक भूलने की बीमारी से पीड़ित थे। उनके पुत्र नुसरत बद्र के अनुसार बीमारी के कारण उनकी स्मरण-शक्ति काफी कमजोर हो गई थी और अंतिम वर्षों में वे अपने जीवन की अनेक स्मृतियों तथा अपनी रचनाओं तक को पहचानने में कठिनाई महसूस करते थे।

यह नियति का एक विचित्र संयोग है कि जिसने पूरी उम्र लोगों की स्मृतियों को शब्द दिए, जिसने यादों, रिश्तों और मानवीय भावनाओं को अपनी शायरी का विषय बनाया, उसी शायर की स्मृतियों पर जीवन के अंतिम वर्षों में डिमेंशिया का धुंधलका छा गया। लेकिन बीमारी उनकी याददाश्त को भले ही कमजोर कर सकी हो, पाठकों और श्रोताओं की स्मृतियों से उन्हें कभी विस्मृत नहीं कर पाएगी। बशीर बद्र स्वयं बहुत कुछ भूल गए थे, पर उनकी शायरी को देश और दुनिया का अदबी समाज कभी नहीं भूल सकेगा।

बशीर बद्र की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सीधे दिल तक पहुँचती थीं। उन्होंने कठिन और दार्शनिक बातों को भी इतने सहज शब्दों में कहा कि सामान्य पाठक भी उनमें अपने जीवन का प्रतिबिंब देख सकता था। उनकी शायरी में प्रेम था, पीड़ा थी, रिश्तों की ऊष्मा थी, समय की विडंबनाएँ थीं और समाज के प्रति गहरी चिंता भी थी।

उनका एक अत्यंत चर्चित शेर है- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। यह शेर केवल दो पंक्तियाँ नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा एक सशक्त वक्तव्य है। एक घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनता, उसमें वर्षों की मेहनत, उम्मीदें, स्मृतियाँ और सपने जुड़े होते हैं। ऐसे में जब कोई व्यक्ति या व्यवस्था विनाश को अपना साधन बना लेती है, तब यह शेर एक प्रश्न बनकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है। शायद यही कारण है कि अन्याय और हिंसा के विरुद्ध उठने वाली आवाजों में यह शेर बार-बार सुनाई देता है।

बशीर बद्र की शायरी की ताकत यह थी कि वह केवल भावुकता पैदा नहीं करती थी, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करती थी। उन्होंने मनुष्य के अहंकार और सफलता के मद को भी बहुत सहज ढंग से पहचान लिया था। उनका मशहूर शेर- शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है/जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। जीवन का बहुत बड़ा सत्य कह देता है। यह शेर हमें याद दिलाता है कि पद, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि स्थायी नहीं हैं। परिस्थितियाँ बदलते देर नहीं लगतीं। इसलिए सफलता के क्षणों में भी विनम्र बने रहना ही बुद्धिमानी है।

बशीर बद्र जीवन के गहरे अध्येता थे। उन्होंने रिश्तों और सामाजिक व्यवहार को बहुत करीब से देखा और समझा था। यही कारण है कि उनके अनेक शेर जीवन-दर्शन की तरह प्रतीत होते हैं। उन्होंने लिखा- बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना/जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता। पहली दृष्टि में यह एक सामान्य सलाह लग सकती है, लेकिन इसके भीतर आत्मसम्मान और व्यक्तित्व की रक्षा का बड़ा संदेश छिपा हुआ है। व्यक्ति को अपने अस्तित्व और स्वतंत्र सोच को बचाकर रखना चाहिए। प्रभाव और शक्ति के आकर्षण में अपनी पहचान खो देना अंततः नुकसानदेह होता है।

उनकी शायरी में मनुष्यता और संवाद के लिए हमेशा जगह बनी रहती है। वैचारिक कटुता, सामाजिक विभाजन और रिश्तों में बढ़ती दूरियों के दौर में उनका यह शेर विशेष रूप से याद आता है- दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे/जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों। यह शेर केवल संबंधों की मर्यादा नहीं सिखाता, बल्कि लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की आधारशिला भी प्रस्तुत करता है। असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को स्थायी घृणा में बदल देना समाज के लिए घातक है। बशीर बद्र हमें यही सिखाते हैं कि मतभेदों के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए।

उनकी संवेदनशील दृष्टि केवल सामाजिक प्रश्नों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार की सूक्ष्म परतों को भी गहराई से समझा था। आधुनिक जीवन में बढ़ते दिखावे और कृत्रिमता पर उन्होंने बड़ी सादगी से चोट की। उनका शेर- अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है/मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे। आज के समय की एक बड़ी सच्चाई को सामने लाता है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ लोग अपनी वास्तविक भावनाओं को व्यक्त करने से कतराने लगे हैं। दुख, क्रोध और असहमति भी अक्सर मुस्कान के पीछे छिपा दी जाती है। बशीर बद्र का यह शेर इस बनावटीपन के विरुद्ध एक सहज प्रतिरोध है।

बशीर बद्र की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी था कि उन्होंने प्रेम को केवल रोमानी भाव तक सीमित नहीं रखा। उनके यहाँ प्रेम मनुष्य के प्रति विश्वास, अपनत्व और करुणा का नाम है। उनकी शायरी में रिश्तों की नमी और इंसानी जुड़ाव की गर्माहट हमेशा बनी रहती है। यही वजह है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते समय पाठक को लगता है कि कोई अपना व्यक्ति उससे संवाद कर रहा है।

उनकी रचनाओं में दर्द भी है, लेकिन वह निराशा का नहीं, संवेदना का दर्द है। वह दर्द जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाता है। उनका प्रसिद्ध शेर- अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ/मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे। एक रचनाकार के अंतर्मन की गहरी अभिव्यक्ति है। इन पंक्तियों में निरंतर संघर्ष, समर्पण और थकान का ऐसा सम्मिश्रण दिखाई देता है जो सीधे पाठक के मन को छू लेता है। यह शेर पढ़ते हुए लगता है जैसे एक संवेदनशील रचनाकार अपने जीवन की पूरी यात्रा का सार हमारे सामने रख रहा हो।

बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को केवल साहित्यिक अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे आम जनजीवन से जोड़ा। यही कारण है कि उनके शेर पढ़े कम और याद अधिक किए जाते हैं। उनकी पंक्तियाँ लोगों की बातचीत, भाषणों, लेखों और सामाजिक संवादों का हिस्सा बन गईं। बहुत कम रचनाकारों को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि उनकी रचनाएँ पुस्तकालयों से निकलकर जनता की स्मृति में स्थायी स्थान बना लें।

आज जब हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं तब हम केवल एक महान शायर को याद नहीं कर रहे हैं। हम उस मानवीय परंपरा को नमन कर रहे हैं जिसके केंद्र में प्रेम, संवेदना, संवाद और करुणा जैसे मूल्य हैं। बशीर बद्र ने अपनी शायरी के माध्यम से हमें सिखाया कि शब्द केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, वे समाज को बेहतर बनाने का माध्यम भी बन सकते हैं। उन्होंने हमें यह भी बताया कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रसिद्धि नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जगह बना लेना है।

बशीर बद्र आज भले ही हमारे बीच न हों लेकिन उनकी आवाज़ उनके शेरों में हमेशा जीवित रहेगी। जब भी कोई व्यक्ति रिश्तों को बचाने की बात करेगा जब भी कोई अन्याय के विरुद्ध खड़ा होगा, जब भी कोई सफलता के बीच विनम्र बने रहने की सीख देगा और जब भी कोई मनुष्यता को सबसे बड़ा मूल्य मानेगा तब बशीर बद्र के शब्द हमारे साथ होंगे।

(लेखक समाजशास्त्री, विचारक, स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)