लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। वैश्विक घटनाओं का असर एक बार फिर भारत के रियल एस्टेट बाजार पर दिखने लगा है। हालांकि, इस बार इसका प्रभाव लोगों की भावनाओं के बजाय निर्माण की लागत पर ज्यादा पड़ रहा है। भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जो हालिया बढ़ोत्तरी हुई है, उसकी वजह से लॉजिस्टिक्स और स्टील व सीमेंट जैसे जरूरी सामान महंगे होने लगे हैं। कुछ बाजारों में तो ईंधन, निर्माण सामग्री और ट्रांसपोर्टेशन के खर्चों में बढ़ोत्तरी के कारण कुल लागत 12% से भी ज्यादा बढ़ गई है।
ऊर्जा और रियल एस्टेट के बीच का यह संबंध कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार जो अलग है, वह है इस दबाव को झेलने का तरीका। पहले, ऐसे समय में कीमतों और प्रोजेक्ट्स की डिलीवरी को लेकर तुरंत अनिश्चितता का माहौल बन जाता था। मगर अब वैसी घबराहट नहीं दिख रही है। ज्यादातर डेवलपर्स इस दबाव में घबराने के बजाय, शांति से इसका समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
राम रतन ग्रुप के चेयरमैन विजय राम रतन ने अपने विचार साझा करते हुए कहा, “वैश्विक कारकों का असर अब रियल एस्टेट पर दिखने लगा है, खासकर ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण। इसकी वजह से लॉजिस्टिक्स और स्टील जैसे निर्माण के जरूरी सामान महंगे हो गए हैं। आज की आपस में जुड़ी दुनिया में यह कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन इस बार अलग बात यह है कि इंडस्ट्री में इन चुनौतियों को संभालने की बेहतर क्षमता है। पिछले दौर की तुलना में, अब डेवलपर्स लागत पर कड़ा नियंत्रण रख रहे हैं, सामान की खरीदारी अधिक व्यवस्थित तरीके से कर रहे हैं और काम को समय पर पूरा करने पर जोर दे रहे हैं। इसी वजह से प्रोजेक्ट की समय-सीमा प्रभावित हुए बिना इन दबावों को झेलना आसान हो गया है।”
उन्होंने कहा, “वहीं दूसरी ओर, घरों और प्रॉपर्टी की मांग लगातार बनी हुई है। इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, बेहतर कनेक्टिविटी और निवेश के बजाय खुद के रहने के लिए घर खरीदने (end-use) के बढ़ते रुझान से बाजार को मजबूती मिल रही है। यह इस बात से भी साफ है कि जितनी सप्लाई आ रही है, लगभग उतनी ही बिक्री भी हो रही है, जो एक संतुलित और परिपक्व बाजार का संकेत है। इसके साथ ही, निवेश का माहौल भी काफी बदला है। भारतीय रियल एस्टेट में विदेशी और घरेलू पूंजी का निवेश लगातार मजबूत बना हुआ है। अब यह सेक्टर केवल उतार-चढ़ाव वाला बाजार नहीं रहा, बल्कि एक संस्थागत और प्रदर्शन-आधारित क्षेत्र बन गया है। डेवलपर्स के लिए अब सारा ध्यान काम को समय पर पूरा करने, वित्तीय अनुशासन और डिलीवरी पर है, क्योंकि आने वाले समय में निवेश और वैल्यू बनाने के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण कारक होंगे।”
निवेश के मामले में भी इसी तरह का बदलाव साफ़ नज़र आ रहा है। निवेश की इच्छा अब भी बरकरार है, लेकिन उसे करने का तरीका बदल गया है। अब निवेशक केवल ज़मीन के दाम बढ़ने के भरोसे बैठने के बजाय, उन संपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो बनकर तैयार हो चुकी हैं या फिर उन ऑर्गेनाइज्ड प्लेटफॉर्म्स को चुन रहे हैं रिटर्न को ट्रैक करना हो। यह बदलाव बाज़ार की परिपक्वता को उतनी ही बखूबी दर्शाता है, जितना कि निवेश का कुल वॉल्यूम।
सेंट्रल पार्क के प्रेसिडेंट (सेल्स, मार्केटिंग और CRM) अंकुश कौल ने कहा, “माना जा रहा है कि 2025 में भारत के रियल एस्टेट में 14 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश हुआ, जो कुल निवेश का करीब 20% है। इससे पता चलता है कि एनआरआई के लिए भारत आज भी निवेश करने की एक पसंदीदा जगह है। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था और भविष्य में बढ़ने की उम्मीद ही इस बढ़ते निवेश की वजह है। माना जा रहा है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद यह रफ्तार आगे भी बनी रहेगी। आजकल ऐसे प्रोजेक्ट्स ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं, जहां एक ही जगह पर रहने की सभी सुविधाएं मिलती हैं। यह सेंट्रल पार्क की लग्जरी और हॉस्पिटैलिटी आधारित दृष्टिकोण के अनुरूप है। गुरुग्राम जैसे इलाकों में स्थानीय और एनआरआई निवेशकों, दोनों की ओर से आगे भी अच्छी मांग बनी रहने की उम्मीद है।”
धरातल पर देखें तो मांग उम्मीद से बेहतर बनी हुई है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद ऑफिस लीजिंग (ऑफिस स्पेस किराए पर लेना) जारी है, और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर व कनेक्टिविटी के चलते आवासीय संपत्तियों की मांग को भी मजबूती मिल रही है। जैसे-जैसे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के आसपास के इलाके विकसित हो रहे हैं, वहां निवेशकों और खुद रहने के लिए घर खरीदने वालों, दोनों की रुचि और बढ़ने की उम्मीद है।
खरीदारों के व्यवहार में भी धीरे-धीरे बड़ा बदलाव आ रहा है। आज प्रॉपर्टी की खरीदारी का एक बड़ा हिस्सा निवेश के बजाय खुद रहने के लिए किया जा रहा है। इसकी वजह से बाजार में मांग का अनुमान लगाना पहले से आसान हो गया है। साथ ही, अब सप्लाई और बिक्री के बीच बेहतर संतुलन देखने को मिल रहा है, जिससे बाजार अधिक स्थिर और संतुलित बन रहा है।
एम3एम इंडिया के कॉर्पोरेट फाइनेंस हेड, प्रतीक टिबरेवाला ने इस विषय पर बात करते हुये कहा, “दुनिया में हो रहे उतार-चढ़ाव का असर थोड़े समय के लिए बाजार पर पड़ सकता है, लेकिन अब भारत का रियल एस्टेट सेक्टर अपने दम पर आगे बढ़ रहा है। मांग बनी हुई है, इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ रहा है और लोग अब बेहतर और प्रीमियम प्रोजेक्ट्स को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। साथ ही, एनआरआई निवेशकों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है, जो भारत को एक सुरक्षित और लंबे समय के निवेश के रूप में देख रहे हैं।
निवेश के मामले में भी बदलाव दिख रहा है। बड़े निवेशक अब ज्यादा पैसा लगा रहे हैं और रियल एस्टेट इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) व अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) जैसे माध्यमों से देश के अंदर का निवेश भी बढ़ रहा है। शेयर बाजार में थोड़ी नरमी और विदेश में निवेश कम होने की वजह से कुछ पैसा अब रियल एस्टेट में आ रहा है। डेवलपर्स भी बढ़ती लागत को समझदारी से संभाल रहे हैं। अब बेहतर तरीके से निर्माण, तकनीक का इस्तेमाल और समझदारी से खरीद पर ध्यान दिया जा रहा है। इससे यह सेक्टर पहले से ज्यादा साफ, व्यवस्थित और मजबूत बन रहा है, जो छोटे झटकों को झेलते हुए लंबे समय में बेहतर परिणाम दे सकता है।”
ये संकेत बताते हैं कि भारतीय बाजार अब बाहरी झटकों को संभालना और उनके साथ तालमेल बिठाना सीख रहा है। कच्चे तेल की कीमतें और सप्लाई से जुड़ी रुकावटें अभी भी असर डालती हैं, लेकिन अब केवल इन्हीं के आधार पर बाजार की दिशा तय नहीं हो रही है।
अब पूंजी, मांग और काम को पूरा करने के बीच बेहतर और स्थिर तालमेल बनता दिख रहा है। इससे निवेशकों को अपने मुनाफे को लेकर पहले से ज्यादा स्पष्टता मिल रही है। वहीं, डेवलपर्स के लिए प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करने और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
अगला चरण भले ही बहुत नाटकीय न लगे, लेकिन यह ज्यादा स्थायी और मजबूत हो सकता है। रियल एस्टेट सेक्टर अब एक अधिक व्यवस्थित और निवेश-आधारित चक्र की ओर बढ़ रहा है, जिससे आगे चलकर बड़े उतार-चढ़ाव कम होंगे और विकास की रफ्तार अधिक स्थिर बनी रहेगी।
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