नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्जीवन के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अब तक 524 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनकी लागत 43,030 करोड़ रुपये है। इनमें से 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए जलशक्ति राज्यमंत्री राज भूषण चौधरी ने बताया कि 2014-15 में शुरू हुआ यह कार्यक्रम मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया है। इसके अंतर्गत सीवरेज ट्रीटमेंट, नदी तट प्रबंधन, ग्रामीण स्वच्छता, वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण और जनभागीदारी जैसे विविध उपाय किए जा रहे हैं।राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के तहत 218 सीवरेज परियोजनाएं 35,794 करोड़ रुपये की लागत से शुरू की गईं, जिनसे 6,610 एमएलडी क्षमता विकसित होगी। इनमें से 138 एसटीपी परियोजनाएं पूरी होकर चालू हो चुकी हैं। ‘प्रयाग’ नामक ऑनलाइन डैशबोर्ड से गंगा और यमुना की जल गुणवत्ता और एसटीपी की निगरानी की जा रही है।जैव विविधता संरक्षण के तहत उत्तर प्रदेश में सात जैव विविधता पार्क और पांच आर्द्रभूमि विकसित की गई हैं। 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया गया है। गंगा में 203 लाख मछली के बीज छोड़े गए हैं ताकि डॉल्फिन और मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रहे। भारत की पहली ‘डॉल्फिन रेस्क्यू एम्बुलेंस’ भी विकसित की गई है।कछुआ और घड़ियाल संरक्षण के लिए विशेष परियोजनाएं लागू की गईं। चंबल में 8,257 अंडों वाले 387 घोंसलों की सुरक्षा की गई, जिनसे 7,979 बच्चे सुरक्षित नदी में छोड़े गए।औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के लिए कानपुर, बंथरा और मथुरा में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए। इन प्रयासों से बीओडी लोड 2017 के 26 टन प्रतिदिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रतिदिन हो गया है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया कि गंगा की जल गुणवत्ता अधिकांश स्थानों पर स्नान मानकों के अनुरूप है। उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़कर गंगा का पानी जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग मानकों पर खरा उतर रहा है।
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