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वीर सावरकर और राष्ट्र चेतना का स्वर

विनायक दामोदर वीर सावरकर जयंती (28 मई) पर विशेष

(डॉ. एस.के. गोपाल)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल उन लोगों की कहानी नहीं है जिन्होंने सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया अपितु उन व्यक्तित्वों का भी इतिहास है जिन्होंने अपने विचारों, लेखनी और साहस से एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। ऐसे ही व्यक्तित्वों में एक नाम विनायक दामोदर वीर सावरकर का है। सावरकर भारतीय इतिहास के उन चर्चित और विवादास्पद व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं, जिनके बारे में मत अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्वीकार करना कठिन नहीं कि उन्होंने अपने समय के राष्ट्रीय विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। आज जब हम उनके जीवन और योगदान को देखते हैं, तो कुछ ऐसे पक्ष सामने आते हैं जिन्हें स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान को समझना भी है।

वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें असाधारण प्रतिभा और तेजस्विता दिखाई देती थी। उस समय देश अंग्रेजी शासन के अधीन था और स्वतंत्रता की भावना धीरे-धीरे समाज में आकार ले रही थी। सावरकर ने किशोरावस्था में ही यह निश्चय कर लिया था कि उनका जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहेगा। यही कारण था कि उन्होंने युवाओं को संगठित करने के उद्देश्य से मित्र मेला और बाद में अभिनव भारत जैसे संगठनों की स्थापना की।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं थे, बल्कि इतिहास, राजनीति और समाज को वैचारिक रूप से भी समझते थे। उन्होंने 1857 के विद्रोह पर एक पुस्तक लिखी — द इण्डियन वार आफ इण्डिपेण्डेंस 1857। उस दौर में अंग्रेज इतिहासकार 1857 की घटना को केवल सिपाही विद्रोह कहते थे, लेकिन सावरकर ने इसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं था, राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा देने वाला विचार था। उनकी पुस्तक पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, क्योंकि उन्हें भय था कि यह पुस्तक युवाओं में विद्रोह की भावना को और प्रबल करेगी। आज भी इतिहास की चर्चा में 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहे जाने के पीछे सावरकर के विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

सावरकर के जीवन का सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक अध्याय अंडमान की सेल्युलर जेल से जुड़ा हुआ है। अंग्रेज सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर काला पानी भेज दिया। वहां की यातनाएं इतनी कठोर थीं कि सामान्य मनुष्य टूट जाए। कैदियों से बैलों की तरह तेल पेरवाया जाता था, उन्हें एकांत कोठरियों में रखा जाता था और अमानवीय व्यवहार सहना पड़ता था। लेकिन इन परिस्थितियों में भी सावरकर ने हार नहीं मानी। कहा जाता है कि जब लिखने के साधन नहीं मिलते थे, तब वे जेल की दीवारों पर कील या पत्थर से पंक्तियां लिखते और उन्हें याद कर लेते थे। यह केवल साहित्य प्रेम नहीं था, विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक शक्ति को बनाए रखने का उदाहरण था। आज के समय में जब छोटी-छोटी असफलताएं लोगों को निराश कर देती हैं, तब सावरकर का यह धैर्य और आत्मबल अत्यंत प्रासंगिक लगता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी कठिन क्यों न हों, मनुष्य का संकल्प उसे टूटने नहीं देता।

वीर सावरकर को प्रायः एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनका सामाजिक सुधारक रूप भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। उन्होंने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव का विरोध किया। उस समय समाज में छुआछूत की गहरी जड़ें थीं। सावरकर का मानना था कि यदि समाज भीतर से विभाजित रहेगा तो राष्ट्र कभी मजबूत नहीं बन सकेगा। उन्होंने मंदिर प्रवेश आंदोलनों का समर्थन किया और समाज के वंचित वर्गों को बराबरी का अधिकार देने की बात कही। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में उन्होंने ऐसे सामाजिक प्रयास किए जिनका उद्देश्य जातीय भेदभाव को कम करना था। आज जब समाज में समानता और सामाजिक न्याय की चर्चा होती है, तब सावरकर के इन प्रयासों को भी याद करना चाहिए। अक्सर राजनीतिक बहसों में उनके व्यक्तित्व का केवल एक पक्ष ही सामने आता है, जबकि उनका सामाजिक चिंतन भी अध्ययन का विषय है।

गोवा मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में भी सावरकर का नाम उल्लेखनीय है। भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिल गई थी, लेकिन गोवा पर पुर्तगाल का शासन बना रहा। सावरकर का स्पष्ट मत था कि भारत की भूमि पर विदेशी सत्ता का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने गोवा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय चेतना को प्रेरित किया और यह कहा कि राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक घोषणा से पूरी नहीं होती अपितु प्रत्येक भूभाग की मुक्ति से पूर्ण होती है। उनके विचारों ने अनेक राष्ट्रवादी युवाओं को प्रभावित किया। बाद में 1961 में गोवा भारत में शामिल हुआ।

सावरकर का एक और महत्वपूर्ण पक्ष उनकी दूरदृष्टि थी। वे राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य शक्ति के महत्व पर जोर देते थे। उनका मानना था कि केवल नैतिक आदर्शों से राष्ट्र सुरक्षित नहीं रह सकता; उसके पास आत्मरक्षा की क्षमता भी होनी चाहिए। आज जब दुनिया में सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और राष्ट्र अपनी सामरिक शक्ति को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं, तब सावरकर के ये विचार नए संदर्भों में चर्चा का विषय बन जाते हैं।

यह भी सच है कि सावरकर का जीवन और विचार विवादों से अछूते नहीं रहे। विशेषकर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनका नाम चर्चा में आया, हालांकि न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया था। इसके अतिरिक्त, उनकी विचारधारा और हिंदुत्व की अवधारणा को लेकर भी लंबे समय से बहस होती रही है। कुछ लोग उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रबल प्रवक्ता मानते हैं, जबकि कुछ आलोचक उनके विचारों से असहमति रखते हैं। लेकिन किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को समझने के लिए आवश्यक है कि उसे केवल समर्थन या विरोध के दायरे में न देखा जाए, बल्कि उसके समय, परिस्थितियों और संपूर्ण योगदान के आधार पर परखा जाए।

वर्तमान समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, युवाओं के सामने अनेक चुनौतियां हैं और राष्ट्रवाद की परिभाषाएं भी नए संदर्भों में गढ़ी जा रही हैं, तब सावरकर का जीवन कई प्रश्न खड़े करता है। क्या राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा का नाम है या साझा सांस्कृतिक चेतना का भी? क्या सामाजिक एकता के बिना राष्ट्रीय शक्ति संभव है? क्या इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता होती है? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते समय सावरकर का व्यक्तित्व चर्चा में आता है। उनकी जयंती केवल एक औपचारिक तिथि नहीं होनी चाहिए। यह अवसर इस बात पर विचार करने का भी होना चाहिए कि हम अपने इतिहास को कितनी गंभीरता से समझते हैं। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके अतीत की समझ से जुड़ा होता है। यदि हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखेंगे, तो शायद उनके योगदान के अनेक आयामों को खो देंगे।

वीर सावरकर का जीवन साहस, वैचारिक स्पष्टता, संगठन क्षमता और संघर्षशीलता का उदाहरण है। उनसे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना संभव नहीं। यही किसी बड़े ऐतिहासिक व्यक्तित्व की पहचान भी होती है कि वह अपने समय के बाद भी बहस, प्रेरणा और विचार का विषय बना रहे। आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस युग की बेचैनी, संघर्ष और राष्ट्र निर्माण की आकांक्षा को भी स्मरण करते हैं, जिसने आधुनिक भारत को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल समाजशास्त्री, विचारक, स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)