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गोमती की करवट और फैजुल्लागंज की चिन्ता

(डॉ. एस.के. गोपाल)

गोमती की बाढ़ जब उफनती है तो नदी का पानी शहर की स्मृतियों में भी उतर जाता है। लखनऊ के घैला और फैजुल्लागंज क्षेत्र की ऐसी ही एक स्मृति 1971 की बाढ़ से जुड़ी है। उस समय डी.पी. बोरा लखनऊ पश्चिम से विधायक थे। स्थानीय स्मृतियों के अनुसार, बाढ़ में फंसे लोगों की मदद के लिए वे प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे और डूब रहे बच्चों को बचाने के लिए पानी में कूद पड़े थे। आज लगभग पांच दशक बाद भी फैजुल्लागंज गोमती की बाढ़ और जलभराव की चुनौती से जूझ रहा है।

फैजुल्लागंज का वर्तमान संकट केवल नदी की बाढ़ का परिणाम नहीं है। लखनऊ के विस्तार के साथ आवास की मांग बढ़ी तो अपेक्षाकृत सस्ती जमीन ने इस इलाके को तेजी से बसने वाले क्षेत्र में बदल दिया। निजी प्लॉटिंग और बस्तियों के विस्तार के बीच पर्याप्त नियोजन, जलनिकासी और बाढ़ सुरक्षा की व्यवस्था उस गति से विकसित नहीं हो सकी। बारिश और गोमती का जलस्तर बढ़ने पर कई मोहल्ले बार-बार जलभराव की चपेट में आते रहे। इसलिए समस्या केवल जल निकासी की नहीं, अनियोजित शहरी विस्तार और नदी के बीच संतुलन की भी है।

पुरानी जलनिकासी व्यवस्था में आईआईएम रोड से गोमती तक लगभग नौ किलोमीटर का प्राकृतिक अथवा कच्चा नाला महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। आबादी बढ़ी तो यह व्यवस्था अपर्याप्त होती गई। पिछले करीब एक दशक में क्षेत्रीय विधायक डा. नीरज बोरा की पहल से सड़क, नाली, बिजली और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े कई काम आगे बढ़े। करीब 45 करोड़ रुपये की लागत से नौ किलोमीटर लंबे आरसीसी नाले का निर्माण इसी दिशा में एक प्रमुख प्रयास रहा। नाला बारिश का पानी निकाल सकता है लेकिन गोमती का जलस्तर बढ़ने पर नदी के पानी को बस्तियों में प्रवेश करने से रोकने के लिए अलग संरचना चाहिए।

इसी जरूरत को देखते हुए आईआईएम रोड से हार्डिंग ब्रिज यानी पक्के पुल तक गोमती के बाएं तट पर बंधा बनाने का प्रस्ताव सामने आया है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने करीब 182 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली परियोजना का प्रस्ताव शासन को भेजा है और डा. नीरज बोरा ने मुख्यमंत्री से इस पर शीघ्र कार्रवाई का आग्रह किया है। परियोजना धरातल पर आती है तो आसपास के क्षेत्रों को बाढ़ से दीर्घकालिक सुरक्षा की दिशा में आधार मिल सकता है।

फैजुल्लागंज में बीते वर्षों में हुए बदलाव को केवल बाढ़ के संदर्भ में देखना अधूरा होगा। सड़क और जलनिकासी के साथ बिजली उपकेंद्र, विद्युत विस्तार, कल्याण मंडप, पचास बेड का अस्पताल, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज और पक्के पुल जैसी परियोजनाएं क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी हैं। पीपा पुल के स्थान पर स्थायी पुल की दिशा में बढ़ता काम भी आवागमन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। तेजी से बढ़ती आबादी वाले क्षेत्र में इन सभी बुनियादी सुविधाओं को साथ लेकर चलना जरूरी है।

इसी क्रम में प्रबंध नगर योजना भविष्य की एक बड़ी संभावना है। आईआईएम रोड के आसपास करीब दो हजार एकड़ में प्रस्तावित यह आवासीय योजना लंबे समय से प्रतीक्षित थी और अब इसके आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई है। नियोजित आवासीय विकास का महत्व इसलिए अधिक है कि लखनऊ की बढ़ती आबादी को ऐसे क्षेत्रों की जरूरत होगी जहां सड़क, जलनिकासी, आवास और सार्वजनिक सुविधाएं पहले से नियोजन का हिस्सा हों। फैजुल्लागंज का अनुभव बताता है कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप आधारभूत ढांचा तैयार करना भी आवश्यक है।

आज की बाढ़ ने इस पूरी तस्वीर को फिर सामने ला दिया है। गोमती का जलस्तर बढ़ने पर दाऊदनगर और मामा कॉलोनी सहित कई हिस्सों में लोग प्रभावित हुए। डा. नीरज बोरा प्रभावित इलाकों में पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों की निगरानी कर रहे हैं और हाल के दिनों में नाव से घर-घर पहुंचकर बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री भी उपलब्ध करा रहे हैं। डा. बोरा की पत्नी एवं समाजसेविका बिन्दू बोरा भी प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर सहयोग कर रही हैं। यह दृश्य डी.पी. बोरा की सार्वजनिक भूमिका की स्मृति को वर्तमान से जोड़ता है।

फैजुल्लागंज के सामने अब सवाल केवल इस बार का पानी उतारने का नहीं है। असली सवाल है कि अगली बाढ़ से पहले क्या स्थायी सुरक्षा तैयार होगी। मौजूदा बस्तियों के लिए तटबंध, जलनिकासी और अन्य आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना होगा तथा प्रबंध नगर जैसी योजनाओं को नियोजित शहरी विकास के रूप में आगे बढ़ाना होगा। 1971 की बाढ़ की स्मृति से 2026 की बाढ़ तक फैजुल्लागंज ने लंबा सफर तय किया है। अब समय है कि इस सफर का अगला पड़ाव ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें गोमती के किनारे बसे लोगों को हर वर्ष बाढ़ के खतरे के साथ जीवन न बिताना पड़े।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)