(डॉ. एस.के. गोपाल)
उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। यह चुनाव केवल प्रदेश में भाजपा की सरकार के भविष्य का फैसला नहीं करेगा। इसका असर योगी आदित्यनाथ की आगे की राजनीतिक भूमिका पर भी पड़ेगा। 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने 2022 में लगातार दूसरी बार भाजपा सरकार का नेतृत्व किया। अब उनके सामने तीसरी बार जनता के बीच जाने की चुनौती है।
भाजपा ने 2027 की तैयारी तेज कर दी है। सितंबर 2026 में लखनऊ में भाजपा की कोर ग्रुप बैठक हुई। इसमें राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष, प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्री शामिल हुए। बैठक में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी और संगठनात्मक कार्यक्रमों पर चर्चा हुई। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच भी समन्वय बैठकों का दौर चला है। इनमें संगठन की स्थिति, जमीनी फीडबैक और चुनावी तैयारी पर चर्चा हुई। इन बैठकों को योगी के पक्ष में संघ का कोई औपचारिक राजनीतिक निर्णय कहना उचित नहीं होगा।
योगी के सामने करीब दस वर्ष के शासन का हिसाब जनता के सामने रखने का अवसर होगा। कानून-व्यवस्था, सड़क और एक्सप्रेसवे, बिजली, निवेश, धार्मिक पर्यटन, सरकारी योजनाओं का विस्तार और बुनियादी ढांचा चुनावी विमर्श में रहेंगे। रोजगार, महंगाई, किसानों की समस्याएं, युवाओं की अपेक्षाएं और स्थानीय स्तर की शिकायतें विपक्ष के प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं। इसलिए 2027 का चुनाव सरकार के कामकाज और जनता की अपेक्षाओं दोनों पर केंद्रित रहेगा।
2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण संकेत छोड़ गया था। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में समाजवादी पार्टी को 37, भाजपा को 33, कांग्रेस को 6, राष्ट्रीय लोकदल को 2, अपना दल (सोनेलाल) को 1 और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) को 1 सीट मिली। बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2019 में भाजपा को 62 सीटें मिली थीं। 2024 में उसकी संख्या 33 रह गई। समाजवादी पार्टी 5 से बढ़कर 37 सीटों पर पहुंची। कांग्रेस भी 1 से बढ़कर 6 सीटों पर पहुंची। ये आंकड़े 2027 की चुनौती को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
योगी के लिए 2027 की परीक्षा केवल सरकार के कामकाज तक सीमित नहीं होगी। यह उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता की परीक्षा भी होगी। गोरखनाथ मठ से उनका संबंध है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका पुराना जनाधार रहा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी राजनीतिक पहचान पूरे प्रदेश में बनी है। 2027 की तैयारियों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। भाजपा के संगठनात्मक कार्यक्रमों में सरकार के काम और योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।
यहीं से योगी के राष्ट्रीय राजनीतिक भविष्य का प्रश्न भी जुड़ता है। उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री पद के संभावित नेताओं में देखा जाता है। यह कोई घोषित निर्णय नहीं है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी के बाद नेतृत्व को लेकर कोई आधिकारिक उत्तराधिकार योजना घोषित नहीं की है। फिर भी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में लंबे प्रशासनिक अनुभव और राष्ट्रीय पहचान के कारण योगी का नाम इस चर्चा में बना हुआ है।
भाजपा में नेतृत्व की भूमिका समय के साथ बदलती रही है। मध्य प्रदेश में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को बाद में केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। राजस्थान में वसुंधरा राजे के बाद भाजपा ने नया नेतृत्व आगे किया। इससे इतना स्पष्ट है कि किसी नेता का वर्तमान पद उसके भविष्य की भूमिका तय नहीं करता। योगी के साथ भी भविष्य में परिस्थितियां बदल सकती हैं। वे उत्तर प्रदेश में बने रह सकते हैं। उन्हें केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। भाजपा में उनका राष्ट्रीय कद और बढ़ सकता है।
इसलिए 2027 का चुनाव योगी के लिए सामान्य विधानसभा चुनाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मजबूत जनादेश की स्थिति में उनका राजनीतिक कद बढ़ सकता है। राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो सकती है। प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार के रूप में उनका नाम भी अधिक गंभीरता से लिया जा सकता है। दूसरी ओर अपेक्षा से कमजोर परिणाम की स्थिति में भाजपा के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर नए प्रश्न उठ सकते हैं।
वर्ष 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के करीब दस वर्ष के शासन का जनमूल्यांकन होगा। यह भाजपा के संगठन की भी परीक्षा होगी। सबसे बढ़कर यह योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य की अग्नि परीक्षा होगी। चुनाव का जनादेश यह संकेत देगा कि उनकी राजनीतिक यात्रा उत्तर प्रदेश की सत्ता में एक और चरण की ओर बढ़ती है या राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका का नया अध्याय खुलता है।

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