सूरदास जयंती (21 अप्रैल) पर विशेष
(डॉ.एस.के. गोपाल)
भारतीय भक्ति साहित्य में सूरदास का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। उन्हें प्रायः कृष्ण-भक्ति का कवि कहा जाता है किन्तु केवल इतना कहना उनके महत्व को पूरा नहीं बताता। अगर उनके पदों को ध्यान से पढ़ें तो पता चलता है कि वे बच्चों के मन को बहुत अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने बालक कृष्ण के माध्यम से बचपन की जो दुनिया दिखाई है, वह बहुत सजीव और सच्ची लगती है। उनके यहाँ भगवान कोई दूर की चीज नहीं, घर में खेलने वाला एक बच्चा है, जो हँसता है, रोता है, जिद करता है और सवाल पूछता है। यही बात उनके पदों को खास बनाती है और उन्हें हर वर्ग के लोगों से जोड़ती है। उनके पद पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे हम किसी कहानी को देख रहे हों, जिसमें हर दृश्य हमारे अपने घर जैसा ही है।
सूरदास के पदों में बच्चों की जिज्ञासा बहुत साफ दिखाई देती है। मैया, कबहिं बढ़ेगी चोटी? जैसे पद में बालक कृष्ण अपनी माँ से पूछते हैं कि उनकी चोटी कब बड़ी होगी। वे कहते हैं कि इतना दूध पीने के बाद भी चोटी छोटी ही है। यह सुनने में साधारण बात लगती है लेकिन इसमें बच्चे की सोच छिपी है। बच्चा अपने छोटे अनुभव के आधार पर दुनिया को समझता है और उसी तरह सवाल करता है। सूरदास ने इस बात को बहुत सहज तरीके से लिखा है। पढ़ते समय लगता है जैसे हमारे सामने कोई छोटा बच्चा सच में यह सवाल कर रहा हो। यह सरलता ही उनके पदों की सबसे बड़ी ताकत है और यही कारण है कि हर उम्र का व्यक्ति उन्हें समझ सकता है।
इसी तरह मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो जैसे पदों में बच्चे की शरारत और उसकी मासूम चालाकी दिखाई देती है। कृष्ण माखन खाने से मना करते हैं और तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। यह दृश्य हर घर का लगता है जहाँ बच्चा अपनी गलती छिपाने की कोशिश करता है। सूरदास इस बात पर नाराज़ नहीं होते अपितु इसे बच्चे की स्वाभाविक हरकत के रूप में दिखाते हैं। वे हमें यह सिखाते हैं कि बच्चे को समझना चाहिए केवल डाँटना नहीं चाहिए। आज भी यह बात उतनी ही सही है क्योंकि हर बच्चा अपने तरीके से दुनिया को समझता है और अपनी भाषा में अपनी बात कहता है।
इसी क्रम में मैया मैं तो चंद खिलौना लैहों, जैहौं लोट धरनी पर अबहिं… जैसे पदों में बच्चे का हठ बहुत सुंदर ढंग से दिखाया गया है। यहाँ बालक कृष्ण चाँद को खिलौना बनाकर माँग रहे हैं और कहते हैं कि अगर नहीं मिला तो वे जमीन पर लोट जाएँगे। यह किसी भी छोटे बच्चे की जिद जैसी ही बात है। बच्चा कभी-कभी ऐसी चीज माँगता है जो मिल ही नहीं सकती लेकिन उसे लगता है कि वह जरूर मिलेगी। सूरदास इस जिद को गलत नहीं बताते, बच्चे की भावना और कल्पना का हिस्सा मानते हैं। इससे यह भी समझ में आता है कि बच्चों की दुनिया तर्क से ज्यादा भाव पर चलती है। वे जो चाहते हैं उसे सच मान लेते हैं और उसी के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।
माँ और बच्चे के रिश्ते को भी सूरदास ने बहुत सुंदर ढंग से दिखाया है। जसोदा हरि पालने झुलावै जैसे पदों में माँ का प्यार, उसकी ममता और उसका स्नेह साफ दिखाई देता है। यशोदा अपने बच्चे को झुलाती हैं, उसे सुलाती हैं और उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती हैं। यह दृश्य हर माँ के दिल के करीब लगता है। सूरदास ने माँ के मन को भी उतनी ही अच्छी तरह समझा है जितना बच्चे के मन को। उनके पद हमें सिखाते हैं कि बच्चे के लिए सबसे जरूरी चीज है- माँ का प्यार, अपनापन और सुरक्षा का भाव। यही चीज बच्चे को अंदर से मजबूत बनाती है और उसके व्यक्तित्व को सही दिशा देती है।
आज के समय में सूरदास के पद और भी ज्यादा जरूरी लगते हैं। आज बच्चों का जीवन पहले जैसा सरल नहीं रहा। मोबाइल, पढ़ाई का दबाव और प्रतियोगिता ने उनके बचपन को बदल दिया है। वे पहले की तरह खुलकर खेल नहीं पाते, न ही उतनी सहजता से अपनी बात कह पाते हैं। ऐसे में सूरदास के पद हमें उस खुले और खुशहाल बचपन की याद दिलाते हैं जहाँ बच्चा बिना डर के हँसता, खेलता और सवाल करता था। वे हमें यह भी सिखाते हैं कि बच्चों के साथ समय बिताना, उनकी बातें सुनना और उन्हें समझना बहुत जरूरी है। जब बच्चा खुद को समझा हुआ महसूस करता है, तभी वह सही ढंग से आगे बढ़ पाता है।
सूरदास के पदों की एक और बड़ी खासियत उनकी भाषा है। उन्होंने बहुत सरल और मीठी ब्रजभाषा का प्रयोग किया है जो सीधे दिल तक पहुँचती है। उनकी भाषा में न कोई कठिन शब्द हैं और न ही कोई बनावट। यही कारण है कि उनके पद पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे कोई अपने घर की बात कह रहा हो। यह सरलता ही उनके पदों को अमर बनाती है और हर पीढ़ी तक पहुँचाती है। आज भी उनके पद उतने ही लोकप्रिय हैं क्योंकि वे सीधे मन को छू लेते हैं। यह कहा जा सकता है कि सूरदास केवल एक बड़े साहित्यकार ही नहीं, बच्चों के मन को समझने वाले एक गहरे और संवेदनशील मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने अपने पदों के माध्यम से बचपन की सच्ची तस्वीर हमारे सामने रखी है। उनके पद हमें सिखाते हैं कि बच्चे को समझना, उसे प्यार देना और उसकी भावनाओं का सम्मान करना बहुत जरूरी है। सच कहें तो सूरदास ने भगवान को बच्चा बनाकर हमें यह सिखाया कि बचपन ही जीवन का सबसे सच्चा, सरल और सुंदर रूप है।

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