Tuesday , March 10 2026

द मिसिंग हाफ : विकसित भारत के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा महिलाओं को पेड वर्क में लाना होगा

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारत में बच्चों के जन्म लेने की दर (फर्टिलिटी) कम हो रही है, जिसका मतलब है कि देश की आबादी तेजी से बुढ़ापे की ओर बढ़ रही है। ऐक्सिस बैंक की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास अमीर बनने के लिए अब बहुत कम समय बचा है। अगर हमें देश को बूढ़ा होने से पहले आर्थिक रूप से मज़बूत बनाना है, तो ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं का अच्छी नौकरियों और प्रोफेशनल काम से जुड़ना बहुत ज़रूरी है।

“द मिसिंग हाफ: वुमेन एंड इंडिया’ज़ ग्रोथ चैलेंज” नामक इस रिपोर्ट में वैश्विक प्रमाणों, भारतीय डेटा के गहन विश्लेषण और 42 भारतीय शहरों में लगभग 11,000 कॉलेज-शिक्षित महिलाओं के प्रॉपरायटरी सर्वे पर आधारित है।

रिपोर्ट का तर्क है कि 2050 तक ‘विकसित भारत’ का सपना हासिल करने के लिए आवश्यक लगभग 7% की विकास दर को 25 वर्षों तक बनाए रखने के लिए, कुल श्रमिक भागीदारी (वेतनभोगी कार्य में) को वर्तमान लगभग 47% से बढ़ाकर करीब 60% करना होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने में महिलाओं की वेतनभोगी कार्य (पेड़ वर्क) में भागीदारी बेहद निर्णायक होगी।

एक महत्‍वपूर्ण चुनौती

हालांकि, वर्तमान में भारत में G20 अर्थव्यवस्थाओं में वेतनभोगी कार्य में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर सबसे कम में से एक है। इसके अलावा, रोजगार प्राप्त महिलाएं ज्यादातर कृषि, स्व-रोजगार या अवैतनिक कार्य में लगी हुई हैं।

· वेतनभोगी कार्य में लगी महिलाओं में से लगभग 60% अनौपचारिक व्यवस्थाओं में हैं, जहां कोई अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं है। महिलाओं के 61% श्रमिक कृषि में संलग्न हैं।

· 125 मिलियन शिक्षित महिलाएं कार्यबल से बाहर हैं, और स्नातक स्तर की 60% महिलाएं वेतनभोगी कार्य से बाहर रहना चुनती हैं।

· अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में शादी के बाद महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में लगभग 20% की कमी आती है।

· प्रसव के बाद भागीदारी और भी गिर जाती है। यह वैश्विक चुनौती है: उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में भी प्रसव के बाद माताओं की रोजगार दर लगभग 25% गिर जाती है, और उनकी कमाई 33% तक कम हो जाती है।

· सर्वेक्षण में शामिल 61% महिलाओं ने कार्यबल में प्रवेश की सबसे बड़ी बाधा के रूप में सुरक्षा और मोबिलिटी को बताया।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब उस स्थिति से बाहर निकल रहा है जहाँ कम आय के कारण महिलाओं का कामकाजी होना मुश्किल था, लेकिन देश के बड़े लक्ष्यों को देखते हुए यह सुधार अभी भी काफी धीमा है। अच्छी बात यह है कि घरों में बिजली, साफ पानी और गैस जैसी सुविधाओं के आने से महिलाओं के घरेलू कामों का बोझ कम हुआ है। साथ ही, अब ज़्यादा लड़कियाँ उच्च शिक्षा ले रही हैं, जिससे शादी के बाद करियर छूट जाने या “मैरिज पेनल्टी” (शादी का नुकसान) का असर भी धीरे-धीरे कम हो रहा है।

मुख्य मांग-पक्ष की बाधाएं बनी हुई हैं

हालांकि, महिलाओं के लिए घर के पास खेती के अलावा अन्य काम मिलना अब भी काफी मुश्किल है। भारत में अच्छी नौकरियों की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिसे पुरुषों में कम गुणवत्ता वाले ‘सेल्फ-रोजगार’ और अस्थायी कामों के रूप में देखा जा सकता है। सामाजिक नियमों के कारण महिलाओं पर इस तरह के दिखावे वाले रोजगार में लगे रहने का दबाव नहीं होता, जिससे काम में उनकी भागीदारी बढ़ाने वाले बदलावों की रफ्तार धीमी हो जाती है। इसके साथ ही, सुरक्षा, आने-जाने की सुविधा, बच्चों की देखभाल और लचीले कामकाजी घंटों की कमी उन्हें पीछे खींचती है। साथ ही, भारत में उन क्षेत्रों (जैसे गारमेंट या इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली) की भी कमी है, जहाँ दुनिया भर में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार मिलता है।

वैश्विक सबक और आज के समय में महत्‍व

रिपोर्ट में बताया गया है कि अन्य देशों ने इन चुनौतियों को कैसे दूर किया, इसके लिए अमेरिका के पिछले सौ सालों के बदलावों का अध्ययन किया गया है। वहाँ महिलाएं घर की चारदीवारी से निकलकर अर्थव्यवस्था के मुख्य केंद्र में आ गईं। यह बड़ा बदलाव बेहतर शिक्षा, अर्थव्यवस्था के नए स्वरूप, नई तकनीक, कानूनी सुधारों और परिवार नियोजन की आज़ादी जैसे कारणों से मुमकिन हो पाया। इसके साथ ही, सामाजिक सोच में भी बदलाव आया और महिलाओं ने खुद भी काम को केवल एक ‘नौकरी’ की बजाय अपने ‘करियर’ और पहचान के रूप में देखना शुरू किया।

आजकल शुरुआती स्तर पर महिलाओं और पुरुषों की तनख्वाह में शादी या भेदभाव के कारण होने वाला अंतर लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन ‘मदरहुड पेनल्टी’ (माँ बनने का नुकसान) अब भी एक बड़ी चुनौती है। करियर की शुरुआत में तो समानता रहती है, लेकिन बच्चा होने के बाद महिलाओं के लिए मुश्किलें और असमानता बढ़ जाती है। ऐसी नौकरियां जहाँ बहुत ज़्यादा और कड़े घंटों तक काम करना पड़ता है, वहाँ छोटे से ब्रेक के बाद वापसी करना काफी नुकसानदेह साबित होता है। यही वजह है कि जब महिलाओं पर करियर या बच्चों में से किसी एक को चुनने का दबाव बढ़ता है, तो वे बच्चों की संख्या कम रखने का फैसला करती हैं, जिससे देश की प्रजनन दर में गिरावट आ रही है।