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यूपी चुनाव से पहले BJP का बड़ा दांव, बटुक पूजा के जरिए रूठे ब्राह्मणों को मनाने की महामुहिम

Lucknow : उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों (UP Assembly Elections) की सरगर्मियां तेज होते ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सूबे की राजनीति में सबसे निर्णायक माने जाने वाले ब्राह्मण वोट बैंक को अपने पाले में बनाए रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बड़ा और बेहद दिलचस्प दांव चल दिया है। हाल ही में समाजवादी पार्टी (सपा) से बगावत कर भाजपा में शामिल हुए और कैबिनेट मंत्री बने मनोज पांडेय के नेतृत्व में हुई ‘बटुक पूजा’ ने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के बाद अब मनोज पांडेय के जरिए भाजपा अपने से छिटक रहे और रूठे हुए ब्राह्मणों को साधने की पुरजोर कोशिश कर रही है।मनोज पांडेय की ‘बटुक पूजा’ के क्या हैं सियासी मायने?कैबिनेट मंत्री का पद संभालने के चंद दिनों बाद ही मनोज पांडेय द्वारा आयोजित की गई इस भव्य बटुक पूजा को लेकर यूपी की सियासत में नई चर्चाएं छिड़ गई हैं। राजनीतिक पंडित इसे दो नजरियों से देख रहे हैं। पहला यह कि क्या मनोज पांडेय इसके जरिए भाजपा सरकार से ब्राह्मण समाज की कथित नाराजगी को दूर करने का जरिया बन रहे हैं? और दूसरा यह कि क्या वह खुद को पार्टी और सरकार के भीतर उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित करने का जतन कर रहे हैं? पिछले कुछ महीनों से विपक्ष लगातार सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगा रहा है, ऐसे में मनोज पांडेय की यह नई पहल ब्राह्मणों की लामबंदी को भगवा खेमे की ओर पुख्ता करने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है।क्यों चर्चा में आई ब्राह्मणों की नाराजगी?बीते कई महीनों से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज के भीतर एक दबी हुई नाराजगी की बातें सामने आती रही हैं। यहां तक कि भाजपा के ही कुछ ब्राह्मण विधायकों ने अपने बयानों से इस चर्चा को हवा दी थी। हाल के दिनों में यूजीसी (UGC) के कुछ नियमों, फिल्मों में दिखाए गए ‘घूसखोर पंडित’ जैसे विवादित टाइटल्स, एनसीईआरटी (NCERT) और पुलिस भर्ती परीक्षा के साथ-साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की परीक्षाओं में पूछे गए कुछ विवादित प्रश्नों ने इस आग में घी डालने का काम किया। विपक्ष ने इन मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार में ब्राह्मणों की उपेक्षा और अपमान का नैरेटिव सेट करने की कोशिश की, जिसने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी चिंता में डाल दिया था।यूपी की सियासत का टर्निंग पॉइंट है 12 से 15% ब्राह्मण वोट बैंकउत्तर प्रदेश की कुल आबादी में करीब 12 से 15 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला ब्राह्मण समाज हमेशा से सूबे की राजनीति के केंद्र में रहा है। इनका वोट बैंक जिस भी दल की तरफ झुकता है, लखनऊ के सिंहासन का रास्ता उसके लिए बेहद आसान हो जाता है। हिंदुत्व की राजनीति को अपनी मुख्य धुरी मानने वाली भाजपा किसी भी कीमत पर यह जोखिम नहीं उठा सकती कि उसका यह कोर वोटर उससे छिटक कर कांग्रेस या सपा की तरफ चला जाए। यही वजह है कि डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी ने अपने दो बड़े चेहरों—ब्रजेश पाठक और मनोज पांडेय को आगे कर दिया है।भाजपा के लिए क्यों आसान नहीं है यह डगर?एक तरफ जहां कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अति-पिछड़ी और अति-दलित जातियों के हितों की उपेक्षा का आरोप लगाकर उनकी लामबंदी में जुटे हैं, वहीं भाजपा के लिए सीधे तौर पर केवल ब्राह्मण राजनीति पर खुलकर फोकस करना एक बड़ी चुनौती है। भाजपा को अपनी सोशल इंजीनियरिंग का संतुलन बनाए रखना है। यही कारण है कि पार्टी सीधे तौर पर कोई राजनीतिक मंच सजाने के बजाय ब्रजेश पाठक और मनोज पांडेय जैसे कद्दावर ब्राह्मण चेहरों के जरिए ‘बटुक पूजा’ जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का सहारा ले रही है। अब देखना यह होगा कि धार्मिक अनुष्ठानों से शुरू हुआ यह सियासी सफर आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की झोली में कितने ब्राह्मण वोट डाल पाता है।