भोपाल : मध्य प्रदेश के सीहोर जिला स्थित श्री सत्य साईं विश्वविद्यालय (विवि)एक बड़े फर्जी डिग्री घोटाले के रूप में सामने आयाहै। राजस्थान एसओजी की टीम ने तीन दिन की जांच में विवि से कई सारे सुबूत एक एकत्र किए हैं, जो इसकी हकीकत का खुलासा करते हैं।राजस्थान की सहायक शिक्षक (पीटीआई) भर्ती प्रक्रिया के दौरान संदेह के आधार पर कुछ अभ्यर्थियों की डिग्रियों की जांच कराई गई थी , जिसमें मप्र कं सीहोर जिला के पुराने इंदौर-भोपाल हाइवे पर स्थित इस विवि से जारी हुईं कई अभ्यर्थियों की बीपीएड डिग्रियां फर्जी पाई गईं हैं। यहां पुरानी तारीख में करीब 67 बीपीएड (बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन) की फर्जी डिग्रियां तैयार की गईं, जिनका इस्तेमाल राजस्थान में वर्ष 2020 की शारीरिक शिक्षक (पीटीआई) भर्ती परीक्षा में सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए किया गया।इस मामले में बीते बुधवार शाम राजस्थान एसओजी की टीम ने इस विवि परिसर में दबिश दी थी, जो गुरुवार और शुक्रवार देर रात तक जारी रही। टीम ने देर रात तक दस्तावेजों की गहन जांच की और कई अहम सबूत जुटाए। इस कार्रवाई के दौरान हार्ड डिस्क, मार्कशीट, डिग्री से जुड़े रिकॉर्ड और डिजिटल डेटा जब्त किए गए। तीन दिन की पड़ताल में टीम कई सारे अहम सुराग जुटाने में कामयाब रही।राजस्थान पुलिस के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और मामले की जांच कर रहे अधिकारी राजेश मेश्राम ने बताया, “जांच के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज मिले हैं। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और हमारे पास उपलब्ध दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। हम कड़ी से कड़ी जोड़कर पूरे नेटवर्क की जांच कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्थान में इस फर्जी डिग्री रैकेट को लेकर अब तक पांच एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं।जांच में सामने आया है कि फर्जीवाड़े का यह खेल कोई नया नहीं है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2013 से लेकर 2022 के बीच सुनियोजित तरीके से यह घोटाला किया गया। विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और जांच में मिले दस्तावेजों के बीच भारी अंतर पाया गया है। आशंका है कि इसी अवधि में मार्कशीट और डिग्रियां जारी करने के लिए एक पूरा सिस्टम विकसित किया गया था। राजस्थान एसओजी के अनुसार, विश्वविद्यालय द्वारा बीपीएड की मार्कशीट और डिग्रियां बैक डेट में तैयार की गईं, ताकि अभ्यर्थी भर्ती की पात्रता शर्तों को पूरा कर सकें।सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिन 67 अभ्यर्थियों के नाम पर बीपीएड की डिग्रियां जारी की गईं, जिन्होंने कभी भोपाल या सीहोर आकर पढ़ाई ही नहीं की। इसके बावजूद उनके पास पूर्ण डिग्री और मार्कशीट मौजूद थी। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि इन फर्जी डिग्रियों को दो से तीन लाख रुपये में बेचा गया। यानी शिक्षा को खुलेआम सौदेबाजी का जरिया बनाया गया।उल्लेखनीय है कि ये पूरा मामला राजस्थान में वर्ष 2020 की सहायक शिक्षक (पीटीआई) भर्ती से जुड़ा है। भर्ती प्रक्रिया के दौरान संदेह के आधार पर कुछ अभ्यर्थियों की डिग्रियों की जांच कराई गई, जिसमें कई अभ्यर्थियों की बीपीएड डिग्रियां फर्जी पाई गईं। राजस्थान सरकार ने कई बार सत्य साईं विश्वविद्यालय से रिकॉर्ड मांगें, लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा समय पर या पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। यही नहीं, जो दस्तावेज दिए गए, वे भी आपस में मेल नहीं खा रहे थे।इससे पहले भी भोपाल से जुड़े आरकेडीएफ ग्रुप पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस रैकेट में विश्वविद्यालय प्रबंधन, कर्मचारियों और बिचौलियों की क्या भूमिका रही है और कितने लोग इस साजिश का हिस्सा थे। फिलहाल, राजस्थान एसओजी द्वारा जब्त किए गए दस्तावेजों और डिजिटल सबूतों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है। आने वाले दिनों में और बड़े खुलासों की संभावना जताई जा रही है।—————
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