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भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन और सत्ता का यथार्थ


डॉ. एस.के. गोपाल

लोकायुक्त कानून को प्रभावी रूप से लागू कराने की मांग को लेकर 30 जनवरी से आमरण अनशन की घोषणा करते हुए अन्ना हजारे ने एक बार फिर देश को उस प्रश्न की याद दिलाई है जिसने कभी पूरे भारत को सड़कों पर ला खड़ा किया था। यह अनशन केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि उस अधूरे वादे की पुनः स्मृति है, जिसे लोकपाल आंदोलन के समय जनता ने अपनी आंखों में साकार होते देखा था।

लोकपाल आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का ऐसा अध्याय रहा है, जब लगा कि जनता की संगठित चेतना व्यवस्था को बदल सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध वर्षों से दबा असंतोष अचानक व्यापक जनांदोलन में बदल गया। छात्र, कर्मचारी, मध्यमवर्ग और युवा वर्ग, सब इस विश्वास के साथ सड़कों पर उतरे कि अब यदि आवाज़ नहीं उठी, तो आगे कुछ शेष नहीं बचेगा।

इस आंदोलन के केंद्र में अन्ना हजारे की नैतिक छवि थी, जिनकी सादगी और दृढ़ता ने उन्हें जनमानस में ‘जन गांधी’ बना दिया। उनके साथ योग गुरु बाबा रामदेव भी जुड़े, जिन्होंने काले धन और विदेशी बैंकों में जमा पूंजी का प्रश्न उठाकर आंदोलन को और व्यापक सामाजिक आधार दिया। भ्रष्टाचार उस समय केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि आम नागरिक के दैनिक जीवन से जुड़ा प्रश्न बन गया।

इसी दौर में इंडिया अगेंस्ट करप्शन मंच सामने आया। इसी मंच से अरविंद केजरीवाल आंदोलन के रणनीतिक चेहरे के रूप में उभरे, जबकि कुमार विश्वास की कविताओं और वक्तव्यों ने जनभावनाओं को स्वर दिया। मीडिया की निरंतर मौजूदगी ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया और सत्ता को जवाब देना पड़ा। उस समय केंद्र में सत्ता संभाल रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार ने अंततः लोकपाल कानून पारित किया। इसे जनदबाव की जीत माना गया। वहीं विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने आंदोलन को नैतिक समर्थन देते हुए भ्रष्टाचार को सत्ता-विरोध का मुख्य आधार बनाया। जनता को विश्वास हुआ कि अब चाहे सरकार किसी की भी बने, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।

2014 के बाद सत्ता बदली और उम्मीदें और गहरी हो गईं। काले धन की वापसी, पारदर्शी शासन, भयमुक्त जांच और प्रभावी लोकपाल, ये केवल चुनावी वादे नहीं थे, बल्कि उस आंदोलन से उपजी अपेक्षाएँ थीं, जिसमें जनता स्वयं सहभागी रही थी। लेकिन समय बीतने के साथ यह भरोसा कमजोर पड़ता गया। लोकपाल संस्था बनी, पर उसकी सक्रियता आम नागरिक को दिखाई नहीं दी। कई राज्यों में लोकायुक्त कानून या तो लागू नहीं हुआ या उसे इतने सीमित अधिकार दिए गए कि वह प्रभावी संस्था नहीं बन सका।

भ्रष्टाचार का प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह कहना कठिन है कि वह कम हुआ या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि वह समाप्त नहीं हुआ। उसका स्वरूप अवश्य बदल गया है। जो भ्रष्टाचार पहले खुले रूप में दिखता था, वह अब नियमों, प्रक्रियाओं, निविदाओं और कानूनी तकनीकों में छिप गया है। बड़े पदों पर बैठे लोग अक्सर इन्हीं प्रक्रियाओं के सहारे जांच के दायरे से बाहर होते दिखाई देते हैं।

जांच एजेंसियों की भूमिका भी विवादों से मुक्त नहीं रही है। प्रवर्तन निदेशालय जैसी संस्थाओं पर कार्रवाई की चयनात्मकता के आरोप लगते रहे हैं। जब कानून के समान प्रयोग पर संदेह उत्पन्न होता है, तब लोकतांत्रिक संवाद स्वतः संकुचित हो जाता है। भय का वातावरण केवल अपराधियों को नहीं, बल्कि सवाल पूछने और असहमति व्यक्त करने की संस्कृति को भी प्रभावित करता है।

लोकपाल आंदोलन के प्रमुख चेहरे आज अलग-अलग राहों पर हैं। अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन के माध्यम से उसी मुद्दे को उठाने को विवश हैं। बाबा रामदेव योग और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। अरविंद केजरीवाल आंदोलन से निकलकर सत्ता की राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। कुमार विश्वास, जो आंदोलन की भावनात्मक आवाज़ थे, अब राजनीति से दूर हैं। यह विडंबना ही है कि आंदोलन पीछे छूट गया, पर भ्रष्टाचार का प्रश्न वहीं खड़ा है।

अब यह सवाल टाला नहीं जा सकता कि क्या लोकपाल आंदोलन वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन का प्रयास था या वह सत्ता परिवर्तन की राजनीति का एक चरण भी था। जनभावनाओं को उभारना, नैतिक अपील के माध्यम से व्यापक समर्थन जुटाना और लक्ष्य पूरा होते ही मुद्दे को हाशिये पर डाल देना, लोकतांत्रिक इतिहास में यह नई प्रक्रिया नहीं है।

आम आदमी को अक्सर यह कहकर दोषी ठहराया जाता है कि वह जल्दी भूल जाता है। पर सच्चाई यह भी है कि उसे बार-बार नए मुद्दों में उलझा दिया जाता है। मुद्दों की इस भीड़ में भ्रष्टाचार जैसा बुनियादी प्रश्न पीछे छूट जाता है।

30 जनवरी से शुरू होने वाला आमरण अनशन इसी अधूरे सवाल की याद दिलाता है। जब तक लोकपाल और लोकायुक्त वास्तविक रूप से स्वतंत्र और प्रभावी नहीं होंगे, जब तक जांच एजेंसियाँ राजनीतिक संदेह से मुक्त नहीं होंगी, और जब तक नागरिक चेतना को बार-बार जाग्रत नहीं किया जाएगा, तब तक आंदोलन आते-जाते रहेंगे। और तब इतिहास यही पूछेगा कि क्या हमने सचमुच व्यवस्था बदली या केवल चेहरे?

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)