(डॉ. एस.के. गोपाल)
मनोरंजन के साधन बदलते हैं तो केवल तकनीक नहीं बदलती। इसके साथ समाज की जीवनशैली और उसकी यादें भी बदलती हैं। कभी गांव की गलियों में बायोस्कोप वाला आया करता था। बच्चे मुट्ठी भर अनाज देकर दुनिया की तस्वीरें देखते थे। फिर सिनेमा आया। कहानी देखने का आनंद एक सामूहिक अनुभव बन गया। आज मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर दुनिया भर की फिल्में, धारावाहिक और वेब सीरीज मौजूद हैं। बायोस्कोप से ओटीटी तक का सफर तकनीक के साथ हमारी सामाजिक यात्रा की कहानी भी है।
बचपन की एक स्मृति आज भी मन में ताजा है। गांव में बायोस्कोप लेकर लोग आया करते थे। रंग-बिरंगे डिब्बे में तस्वीरें लगी होती थीं। उन्हें छोटे-छोटे लेंसों से देखा जाता था। बायोस्कोप वाला हैंडल घुमाता और तस्वीरें बदलती जातीं। साथ में उसकी आवाज भी सुनाई देती, देखो-देखो, दिल्ली का कुतुब मीनार देखो। इसके लिए कई बार पैसे नहीं देने पड़ते थे। घर से लाई गई मुट्ठी भर गेहूं या चावल ही काफी थे। बच्चों के लिए वह डिब्बा किसी चलतेफिरते सिनेमाघर से कम नहीं था।
इसके बाद बड़े पर्दे का दौर आया। लखनऊ में सिनेमा घर फिल्म देखने की जगह तो थे ही, शहर के सामाजिक जीवन का हिस्सा भी थे। अलंकार, ओडियन, शिल्पी, निशात, जय भारत, तुलसी, बसंत, मेफेयर, कैपिटल, लीला, मेहरा, नाज और अशोक जैसे सिनेमाघर कभी दर्शकों से गुलजार रहते थे। आज ये सभी बंद हो चुके हैं। चारबाग का सुदर्शन भी पुराने सिनेमा संसार के सिकुड़ने की कहानी कहने जा रहा है। यह सूची पूरी नहीं है। लखनऊ में ऐसे कई और सिनेमा घर रहे हैं जिनकी पहचान अब पुरानी पीढ़ी की यादों और पुराने दस्तावेजों में ही बची है।
कुछ वर्ष पहले वाह नवाब वाह धारावाहिक की शूटिंग के सिलसिले में चौक जाना हुआ। बान वाली गली के निवासी डॉ. अनिल गुप्ता ने गोल दरवाजे से भीतर जाते समय बाईं ओर एक पुराने सिनेमा हॉल की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि यहां कभी मूक फिल्में दिखाई जाती थीं। तबला, हारमोनियम लेकर कलाकार भी तब हॉल में बैठते थे।
पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि सिनेमा के शुरुआती दौर में आज जैसी टिकट व्यवस्था नहीं थी। प्रवेश के लिए हाथ पर मोहर लगा दिया जाता था। बाद में टिकट का चलन बढ़ा। लोकप्रिय फिल्मों के लिए लंबी कतारें लगने लगीं। कई बार टिकटों की ब्लैक भी होती थी। आज ऑनलाइन टिकट बुक करने वाली पीढ़ी के लिए यह किसी पुराने किस्से जैसा लगता है। लेकिन कभी फिल्म देखना भी एक आयोजन हुआ करता था।
सिनेमा के सामाजिक असर की एक दिलचस्प कहानी हैदरगढ़ के पूर्व विधायक स्वर्गीय सुंदरलाल दीक्षित से जुड़ी है। 1977 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद उन्हें दारुलसफा स्थित विधायक निवास में कमरा मिला। दीक्षित जी बताते थे कि उन दिनों हैदरगढ़ और आसपास के बहुत से लोग फिल्म देखने लखनऊ आते थे। रात में वे उनके यहां रुकते थे। उनके भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी। विधायक के रूप में मिलने वाली आय का बड़ा हिस्सा इसी में खर्च हो जाता था। परेशान होकर उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री से हैदरगढ़ में सिनेमा हॉल खुलवाने का आग्रह किया। बाद में वहां सिनेमा हॉल खुला। यह प्रसंग बताता है कि कभी सिनेमा छोटे कस्बों और गांवों के लिए शहर से जुड़ने का एक माध्यम भी था।
सिनेमा के विस्तार में सरकार की भी भूमिका रही। उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1975 में हुई थी। इसका उद्देश्य नए छविगृहों का निर्माण करना, सस्ते दरों पर मनोरंजन उपलब्ध कराना और रचनात्मक फिल्मों के निर्माण को प्रोत्साहित करना था। आज यह निगम सक्रिय नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार के सार्वजनिक उद्यम विभाग की सूची में इसे गैर कार्यशील या बंद उद्यमों में रखा गया है।
समय के साथ मनोरंजन के दूसरे साधन भी बदलते गए। टेलीविजन ने सिनेमा को घर तक पहुंचाया। फिर वीडियो आया। उसके बाद केबल और इंटरनेट ने विकल्प बढ़ा दिए। आज लखनऊ में कई मल्टीप्लेक्स हैं लेकिन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या लगातार घट रही है। पुरानी फिल्में यूट्यूब पर आसानी से मिल जाती हैं। ओटीटी मंचों पर नई फिल्मों, धारावाहिकों और वेब सीरीज की लंबी दुनिया मौजूद है। फिर भी किसी सिनेमा हॉल का बंद होना केवल एक कारोबार का बंद होना नहीं है। उसके साथ एक सामाजिक अनुभव भी खत्म होता है। टिकट की कतार, फिल्म के पोस्टर देखने का उत्साह, इंटरवल की चहल-पहल और फिल्म देखकर बाहर निकलते लोगों की चर्चा। लोकप्रिय अभिनेता के संवाद की नकल। ये सब एक पूरी पीढ़ी की सामूहिक स्मृतियां हैं।
बायोस्कोप ने गांव के बच्चे को दुनिया की तस्वीर दिखाई। सिनेमा ने उसे बड़े पर्दे पर कहानी के बीच बैठाया। टेलीविजन ने मनोरंजन को घर तक पहुंचाया। इंटरनेट और ओटीटी ने उसे जेब में समेट दिया। माध्यम लगातार बदलते रहे लेकिन कहानी देखने और सुनने की मनुष्य की इच्छा नहीं बदली। पुराने सिनेमाघरों की इमारतें भले बंद हो जाएं लेकिन वहां देखी गई कहानियां और उनसे जुड़ी यादें इतनी आसानी से बंद नहीं होतीं।

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