लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। एस्या (Esya) सेंटर ने अपनी एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसका शीर्षक है: ‘बैलेंसिंग एफिशिएंसी एंड इक्विटी: एविडेंस फ्रॉम इंडियाज़ टेक्नोलॉजी-इंटरमीडिएटेड ट्रांसपोर्ट सर्विसेज अंडर द जीएसटी(GST) रिजीम’। रिपोर्ट के मुताबिक, जीएसटी (GST) कानून की धारा 9(5) के तहत सब्सक्रिप्शन वाले राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म पर जीएसटी(GST) थोपना कानूनी रूप से उलझा हुआ और ज़मीनी स्तर पर लागू करना नामुमकिन है, जबकि इससे ड्राइवरों और आम जनता पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
यह स्टडी 13 भारतीय शहरों के 1,044 ड्राइवरों और 1,059 यात्रियों से बातचीत पर आधारित है। यह आजकल तेजी से बढ़ रहे सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (SAAS) मॉडल की पड़ताल करती है, जो सिर्फ एक ‘सिर्फ सवारी ढूंढ कर देने वाले माध्यम के रूप में काम करता है। इसमें ड्राइवर प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के लिए एक तय सब्सक्रिप्शन फीस देते हैं, लेकिन वे खुद किराया तय करते हैं, सीधे सवारी से पैसे लेते हैं और पूरी कमाई खुद रखते हैं। पुराने कमीशन-आधारित मॉडल के उलट, ये SAAS प्लेटफॉर्म न तो सफर का किराया तय करते हैं और न ही पैसों का लेनदेन संभालते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे सब्सक्रिप्शन मॉडल वाले प्लेटफॉर्म के किराए पर धारा 9(5) के तहत जीएसटी लगाना व्यावहारिक रूप से एक बड़ी चुनौती है; खासकर इसलिए क्योंकि यह सर्विस ड्राइवर स्वतंत्र रूप से दे रहे हैं और उनमें से ज्यादातर की सालाना कमाई GST रजिस्ट्रेशन की तय सीमा से कम है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अलग-अलग राज्यों में टैक्स अथॉरिटी (Advance Ruling Authority) के विरोधाभासी फैसलों से बड़ी असमंजस की स्थिति बन गई है। जिससे एक जैसे बिजनेस मॉडल पर भी अलग-अलग टैक्स लगाया जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस भ्रम से टैक्स की निष्पक्षता खत्म होती है और डिजिटल मोबिलिटी सेक्टर में कंपनियों के बीच बराबरी का मुकाबला नहीं रह जाता।

इस मुद्दे पर बात करते हुए एस्या (Esya) सेंटर की डायरेक्टर, मेघना बाल ने कहा, “भारत का मोबिलिटी सेक्टर बहुत तेजी से बदल रहा है। नए प्लेटफॉर्म मॉडल ड्राइवरों और ग्राहकों दोनों को ज्यादा सहूलियत और विकल्प दे रहे हैं। हमारी रिसर्च बताती है कि सब्सक्रिप्शन मॉडल को इसलिए पसंद किया जा रहा है क्योंकि इससे ड्राइवरों को अपनी कमाई का पहले से अंदाज़ा रहता है और पारदर्शिता मिलती है, जबकि आम जनता को भी किफायती सफर की सुविधा मिलती है। जैसे-जैसे ये मॉडल बढ़ रहे हैं, यह जरूरी है कि हमारा टैक्स और कानूनी ढांचा भी इस नई तकनीक के साथ कदम मिलाकर चले।”
इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ईवाई (EY) की टैक्स पार्टनर, जयश्री पार्थसारथी ने कहा, “डिजिटल मोबिलिटी प्लेटफॉर्म्स के विकास ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि नए जमाने के इन बिजनेस मॉडलों पर इनडायरेक्ट टैक्स (अप्रत्यक्ष कर) के नियमों को कैसे लागू किया जाए। जैसे-जैसे प्लेटफॉर्म्स का ढांचा सब्सक्रिप्शन की तरफ बढ़ रहा है, वैसे-वैसे टैक्स के नियमों को भी इसी के मुताबिक ढालने की जरूरत है। टेक्नोलॉजी, ट्रांसपोर्ट और टैक्स का यह मेल अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए नीतियों को इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाना होगा।”
ड्राइवरों को सता रहा है कमाई घटने और काम ठप होने का डर
अध्ययन से पता चलता है कि ड्राइवर इस सब्सक्रिप्शन वाले मॉडल को बेहद पसंद करते हैं। लेकिन, अगर धारा 9(5) के तहत किराए पर जीएसटी(GST) लगाया गया तो:
● तीन-चौथाई से ज्यादा ड्राइवरों का मानना है कि इससे उनकी रोजी-रोटी पर बुरा असर पड़ेगा।
● हर 5 में से 4 ड्राइवरों को डर है कि उनके घर ले जाने वाली कुल कमाई कम हो जाएगी।
● करीब 60 प्रतिशत ड्राइवरों को लगता है कि उनकी बुकिंग कम हो जाएंगी।
● लगभग 45 प्रतिशत ड्राइवरों को आशंका है कि दाम बढ़ने की वजह से ग्राहक टूट जाएंगे।
● करीब 40 प्रतिशत ड्राइवरों ने संकेत दिया कि वे ऐप से हटकर बिना बिल (ऑफ-प्लेटफॉर्म) के सवारियां बैठाना शुरू कर देंगे।
● आधे से ज्यादा ड्राइवरों का कहना है कि वे या तो गैर-प्लेटफॉर्म राइड्स बढ़ा देंगे या फिर इन ऐप्स का इस्तेमाल करना ही कम कर देंगे।
आम जनता पर बढ़ेगा खर्च का बोझ और सफर होगा मुश्किल
रिसर्च से यह भी साफ हुआ है कि किराया बढ़ने पर ग्राहकों का बजट बिगड़ जाता है। इसका सबसे बुरा असर महिलाओं, कम आय वर्ग के लोगों और उन लोगों पर पड़ेगा जो देर रात के सफर, इमरजेंसी या नौकरी पर आने-जाने के लिए इन ऐप-आधारित सेवाओं का सहारा लेते हैं।
करीब 68 प्रतिशत यात्रियों का कहना है कि अगर किराया सिर्फ 5 प्रतिशत भी बढ़ा, तो वे ऐप से ऑटो-कैब बुक करना काफी कम कर देंगे। सर्वे में शामिल आधे यात्रियों का कहना है कि खर्चा बढ़ने पर वे दोबारा पुराने पारंपरिक टैक्सी/ऑटो का रुख कर सकते हैं। लगभग 10 में से 9 यात्रियों के लिए इन ऐप्स में मिलने वाले सेफ्टी फ़ीचर्स बेहद जरूरी हैं।
धारा 9(5) के नियमों को स्पष्ट करने की मांग
ये बातें ऐसे समय में सामने आई हैं जब सरकार और इस उद्योग (ट्रांसपोर्ट सेक्टर) से जुड़े लोग ड्राइवरों की कमाई बढ़ाने और आम लोगों के सफर को आसान बनाने के नए-नए तरीके खोज रहे हैं। ‘भारत टैक्सी’ जैसी नई शुरुआत इसी बदलते दौर को दिखाती है, जो पूरी तरह से ‘ड्राइवर-केंद्रित’ मॉडल पर काम करती है। इसका मकसद सिर्फ यह है कि ड्राइवरों की कमाई में पूरी पारदर्शिता (साफ-सफाई) हो और उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके।
इन तमाम चिंताओं को देखते हुए, एस्या (Esya) सेंटर ने सरकार को सिफारिश की है कि धारा 9(5) के तहत जीएसटी(GST) वसूलने का नियम केवल वहीं लागू होना चाहिए, जहाँ ऐप/प्लेटफ़ॉर्म का किराए की रकम तय करने या सवारी से पैसा वसूलने पर सीधा और पूरा कंट्रोल हो। इसके साथ ही, रिपोर्ट में यह बात बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में तय करने को कही गई है कि सरकारी नियमों के तहत सवारियों की सुरक्षा, सफर की निगरानी और ड्राइवरों के वेरिफिकेशन के लिए जो भी कदम प्लेटफॉर्म उठाते हैं, उन्हें टैक्स अधिकारियों द्वारा ‘बिजनेस या पैसों पर कंट्रोल’ का सबूत नहीं माना जाना चाहिए । सुरक्षा देना एक कानूनी जिम्मेदारी है, इसे टैक्स थोपने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
इस्माइल खान (अध्यक्ष, परिवहन चालक कामगार ऑटो यूनियन) का कहना है कि ये प्लेटफॉर्म केवल डिजिटल माध्यम हैं जो ड्राइवरों को यात्रियों से सीधे जोड़ने में मदद करते हैं। ये किराया नियंत्रित नहीं करते, सवारी आवंटित नहीं करते और न ही भुगतान संग्रहीत करते हैं। ड्राइवर स्वतंत्र रूप से सेवा प्रदान करते हैं, कीमतें स्वयं निर्धारित करते हैं और सीधे भुगतान प्राप्त करते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्मों को GST के तहत पारंपरिक एग्रीगेटरों की तरह मानना अनुचित है और जमीनी हकीकत से परे है।
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