मुंबई (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर, एचडीएफसी बैंक ने अपने सीएसआर कार्यक्रम ‘परिवर्तन’ के ज़रिए, सीआईआई फाउंडेशन के साथ मिलकर, अपनी ‘फसल अवशेष प्रबंधन’ (सीआरएम) पहल में एक बड़ी उपलब्धि की घोषणा की। 2025 के सीज़न में, पंजाब और हरियाणा के कुल 3,78,425 एकड़ खेतों में से 88 फ़ीसदी खेतों को पराली जलाने से बचाया गया। पंजाब के लुधियाना और संगरूर ज़िलों और हरियाणा के फतेहाबाद ज़िले के 380 से ज़्यादा गांवों के 86,000 किसानों तक पहुँचने वाला यह कार्यक्रम, उत्तर भारत में खेती से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की एक व्यापक और असरदार कोशिश है।
धान की कटाई के बाद पराली जलाना, उस गंभीर वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में से एक है जो हर सर्दियों में पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेता है। इससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और दिल व फेफड़ों की पुरानी बीमारियाँ और भी बढ़ जाती हैं। लगभग 1/3 एकड़ खेत में पैदा होने वाली एक टन धान की पराली को जलाने से वातावरण में तीन किलोग्राम ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (बारीक कण) घुल जाते हैं, साथ ही ज़मीन से ज़रूरी पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। 2025 में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53 फीसदी की कमी आने के बावजूद, छोटे और सीमांत किसानों को आज भी मशीनें हासिल करने और दो फसलों के बीच के कम समय में फसल के अवशेषों का प्रबंधन करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
अक्टूबर 2023 में लुधियाना में शुरू हुआ और 2024 में संगरूर और फतेहाबाद तक फैला, यह तीन साल का कार्यक्रम सीआईआई फाउंडेशन द्वारा 380 गांवों में लागू किया जा रहा है। अब तक, 8 गांवों ने पराली जलाने की प्रथा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है, और 174 गांवों ने 90 फीसदी से अधिक ‘बिना जलाए’ ( नॉन बर्निंग) नियमों का पालन किया है।
एचडीएफसी बैंक की सीएसआर प्रमुख नुसरत पठान ने इस उपलब्धि के बारे में बात करते हुए कहा, “पराली जलाना सिर्फ़ एक कृषि आदत नहीं है, यह एक व्यवस्थागत चुनौती है जिसकी जड़ें अर्थव्यवस्था, पहुंच और जागरूकता में हैं। एचडीएफसी बैंक परिवर्तन की सीआईइई फाउंडेशन के साथ साझेदारी ने इन तीनों पहलुओं को एक साथ संबोधित किया है। सहकारी टूल बैंकों के माध्यम से किसानों तक मशीनरी की पहुंच बनाकर, लगातार सामुदायिक जुड़ाव के ज़रिए व्यवहार में बदलाव लाकर, और बायोगैस व कम्पोस्टिंग जैसे ‘एक्स-सीटू’ (खेत के बाहर) समाधान पेश करके, हमने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जो किसानों के लिए वास्तविक बचत के साथ-साथ पर्यावरणीय परिणाम भी देता है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर, हम इस प्रभाव को और आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं।”
इस कार्यक्रम की सफलता का आधार ‘सामुदायिक टूल बैंक’ का दृष्टिकोण 450 से अधिक कृषि मशीनें है जिनमें खरीदी गईं बेलर, सुपर सीडर, स्मार्ट सीडर और मित्र सीडर शामिल हैं और 140 से अधिक किसान सहकारी समितियों तथा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओज़) को दान की गईं, जिससे ये मशीनें किसानों को किफायती किराए पर उपलब्ध हो सकीं। पराली जलाने के सबसे ज़्यादा समय के दौरान, छोटे और सीमांत किसानों के लिए किराए पर 800 ट्रैक्टर उपलब्ध कराए गए।
मशीनरी के उपयोग से ‘इन-सीटू’ (खेत में ही) अवशेष प्रबंधन, मल्चिंग और धान की पराली को मिट्टी में मिलाने का काम संभव हो पाता है। साथ ही, मिट्टी तैयार करने, गेहूं के बीज बोने और खाद डालने का काम भी एक ही बार में पूरा हो जाता है। इससे पराली प्रबंधन और बुवाई की लागत 2,000–2,500 रुपए प्रति एकड़ से घटकर लगभग 800–1,200 रुपए प्रति एकड़ रह जाती है। साथ ही लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।
जो किसान ‘इन-सीटू’ (खेत में ही) पराली प्रबंधन के तरीके नहीं अपना पाते, वे बेलर मशीनों का उपयोग करके पराली को मशीनी तरीके से जल्दी से इकट्ठा कर सकते हैं, उसकी गठरियां बना सकते हैं और उसका निपटान कर सकते हैं। 30 से अधिक ग्रामीण युवाओं को मार्गदर्शन दिया गया और बेलर मशीनें उपलब्ध कराकर उनका सहयोग किया गया, ताकि वे धान की पराली इकट्ठा करने, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और ‘मूल्य संवर्धन’ (वैल्यू एडिशन) के क्षेत्र में अपने छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें। इस कार्यक्रम के तहत, खेत के बाहर (एक्स- सीटू) पराली प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए धान की पराली पर आधारित 18 छोटे बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए हैं और दो बायो-पेलेटाइजेशन संयंत्र तथा एक जैव-उर्वरक संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं।
हज़ारों गाँव-स्तर की बैठकों, किसानों के लिए जागरूकता सत्रों और कृषि विभाग के साथ साझेदारी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिए किसानों की भागीदारी और उनके व्यवहार में स्थायी बदलाव लाया गया है।
सीआईआई फाउंडेशन में क्लाइमेट रेज़िलिएंस के लीड, चंद्रकांत प्रधान ने कहा, “इस कार्यक्रम को जो बात असाधारण बनाती है, वह है इसमें पैदा हुई सामुदायिक स्वामित्व की गहरी भावना है। जो किसान कभी पराली जलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं देखते थे, अब वे ‘इन-सीटू’ (खेत में ही) प्रबंधन के पैरोकार बन गए हैं और अपने पड़ोसियों को भी इसके लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करते हैं। लुधियाना, संगरूर और फतेहाबाद के गाँवों में, बड़ी संख्या में किसानों ने वर्षों से चली आ रही धान की पराली को खुले खेत में जलाने की प्रथा को छोड़कर, महज़ दो से तीन साल के भीतर ही ‘ज़ीरो बर्निंग’ (पराली न जलाने) आंदोलन के अग्रदूत के रूप में अपनी पहचान बनाई है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब समुदायों को सशक्त बनाया जाता है, उन्हें शिक्षित किया जाता है और बदलाव की अगुवाई करने के लिए उन पर भरोसा किया जाता है, तो क्या कुछ संभव हो सकता है।”
इस कार्यक्रम का मानवीय पहलू इसकी व्यापक पहुँच को दर्शाता है। लुधियाना के चीमा गाँव के गुरमीत सिंह ने 2023 में अपने पूरे खेत में सीआरएम (फसल अवशेष प्रबंधन) पद्धतियों को अपनाया और तब से उन्होंने प्रति एकड़ फसल अवशेष प्रबंधन की अपनी लागत को आधा कर दिया है। फतेहाबाद के लांबा गाँव के एक छोटे ज़मीन मालिक परमजीत सिंह ने पाया कि सहकारी समिति के स्वामित्व वाले ‘सुपर सीडर’ तक पहुँच होने से उन्हें महँगी निजी मशीनों को किराए पर लेने के वित्तीय दबाव से मुक्ति मिल गई। इससे, सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए भी टिकाऊ खेती करना संभव हो गया है।
जैसे-जैसे यह कार्यक्रम 2026–27 तक जारी रहेगा, एचडीएफसी बैंक परिवर्तन और सीआईआई फाउंडेशन नए गाँवों में इन पद्धतियों को और अधिक गहराई से अपनाने, ‘एक्स-सीटू’ (खेत के बाहर) पराली प्रबंधन के बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने और पूरे क्षेत्र में दीर्घकालिक कृषि लचीलापन विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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