मतभेदों के बाद व्यापारी नेताओं ने रखी नए संगठन की नींव
लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। राजधानी लखनऊ का गोमती पार क्षेत्र एक बार फिर व्यापारिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, एक प्रमुख व्यापारी संगठन में लंबे समय से चल रहे मतभेद और गुटबाजी के बाद उससे अलग हुए कुछ व्यापारी नेताओं ने नए संगठन की नींव रख दी है। हालांकि अभी इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही सार्वजनिक रूप से नए संगठन का ऐलान किया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ माह पहले एक व्यापारी संगठन में आंतरिक विवाद और वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आई थी। संगठन से जुड़े प्रदेश स्तर के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाराज होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और संगठन से दूरी बना ली थी। बाद में संगठन के शीर्ष नेतृत्व के प्रयासों से उनकी वापसी हुई और राष्ट्रीय इकाई का गठन कर उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसी क्रम में प्रदेश इकाई को भंग कर नई प्रदेश कार्यकारिणी का गठन किया गया।
हालांकि नई इकाई के गठन के दौरान संगठन के शुरुआती दौर से जुड़े कई प्रमुख पदाधिकारियों को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। प्रदेश अध्यक्ष के पद पर यथावत व्यवस्था बनाए रखी गई, लेकिन अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की अनदेखी से संगठन के भीतर असंतोष बढ़ गया। व्यापारिक गलियारों में यह चर्चा भी रही कि कुछ नेताओं को संगठन से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए ही पहले इस्तीफे, फिर राष्ट्रीय इकाई के गठन और उसके बाद प्रदेश इकाई को भंग कर नई कार्यकारिणी बनाने की पूरी कवायद की गई।
बताया जाता है कि संगठन के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों को नई कार्यकारिणी में स्थान न मिलने से प्रदेश अध्यक्ष भी असहज थे। अंततः उन्होंने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद संगठन के भीतर वर्चस्व की लड़ाई और तेज हो गई। लंबे समय से चल रही रणनीतिक बैठकों और विचार-विमर्श के बाद असंतुष्ट नेताओं ने अलग मंच बनाने का निर्णय लिया और नए संगठन की नींव रख दी। फिलहाल संगठन का नाम और संरचना सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसके जल्द सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
बढ़ रहा संगठनों का बिखराव
व्यापारिक संगठनों की पहचान कभी एकजुटता, संघर्ष और व्यापारी हितों की मजबूती के लिए होती थी। सीमित संख्या में संगठन होने के कारण व्यापारी एक मंच पर आकर अपनी समस्याओं और मांगों को प्रभावी ढंग से उठाते थे। लेकिन समय के साथ व्यापारिक संगठनों में भी राजनीति का प्रभाव बढ़ा और नेतृत्व के बीच वर्चस्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
राजधानी लखनऊ में बीते एक दशक के दौरान व्यापारिक संगठनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एक के बाद एक नए संगठन अस्तित्व में आ रहे हैं। स्थिति यह है कि कई बाजारों में एक ही वर्ग के व्यापारियों के बीच अलग-अलग संगठन अपनी इकाइयां गठित करने में जुटे हुए हैं। इससे व्यापारियों की सामूहिक ताकत कमजोर पड़ने लगी है और संगठनात्मक एकता प्रभावित हो रही है।
असमंजस में व्यापारी
राजनीतिक दलों की तर्ज पर तेजी से बढ़ते व्यापारिक संगठनों के बीच आम व्यापारी खुद को असमंजस की स्थिति में पा रहे हैं। कई व्यापारियों का कहना है कि संगठन लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन व्यापारी हितों की लड़ाई कमजोर होती दिखाई दे रही है। ऐसे में यह तय करना कठिन हो गया है कि किस संगठन से जुड़ना वास्तव में उनके हित में होगा। वर्चस्व की इस प्रतिस्पर्धा से परेशान कई व्यापारी फिलहाल सभी संगठनों से दूरी बनाए रखने को ही बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
व्यापारिक जानकारों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो संगठनों की संख्या बढ़ने के बावजूद उनकी प्रभावशीलता और व्यापारी समाज की सामूहिक आवाज कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में व्यापारिक एकजुटता को बनाए रखना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
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