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हीमोफीलिया : विशेषज्ञों ने प्रोफिलैक्सिस व बहु-विषयक देखभाल पर किया मंथन


लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। उत्तर प्रदेश हेमेटोलॉजी ग्रुप (यूपीएचजी) के तत्वावधान में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के सहयोग से यूपी-हीमोफीलिया कॉन्क्लेव 2026 आयोजित किया गया। इस कॉन्क्लेव में उत्तर प्रदेश भर के हीमोफीलिया उपचार केंद्रों से जुड़े जाने-माने हेमेटोलॉजिस्ट, चिकित्सक, शोधकर्ता, पैथोलॉजिस्ट और स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञ पहुंचे। साथ ही नीति-निर्माता और मरीज समूह भी सम्मलित हुए। राज्य में अपनी तरह की यह पहली पहल किसी हीमोफीलिया सर्वसम्मति बैठक जैसी रही, जिसका केंद्रीय विषय था ‘यूनाइटिंग केयर, इम्प्रूविंग लाइव्स।’

कॉन्क्लेव का उद्घाटन प्रोफेसर ए.के. त्रिपाठी, डॉ. विनीता गुप्ता, डॉ. ओम शंकर चौरसिया, डॉ. एस.पी. वर्मा और डॉ. जीबा जका उर रब ने किया। सत्रों में नैदानिक अभ्यास की नई दिशा, बहु-विषयक देखभाल, रियल-वर्ल्ड एविडेंस और बदलते उपचार दृष्टिकोणों पर विस्तार से चर्चा हुई।

हीमोफीलिया एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार है। इसमें क्लॉटिंग फैक्टर, यानी रक्त का थक्का जमाने वाले तत्वों, के कम या बहुत कम स्तर के चलते व्यक्ति को अपने आप भी रक्तस्राव हो सकता है और चोट लगने पर भी। कुछ मामलों में यह लंबे समय में मांसपेशियों और हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है, जिसका असर मरीज के जीवन की गुणवत्ता पर गहरा पड़ता है।

विशेषज्ञों ने उत्तर प्रदेश में हीमोफीलिया की मौजूदा स्थिति पर गौर किया। 2026 तक वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ हीमोफीलिया (डब्ल्यूएफएच) के मुताबिक भारत में करीब 28,000 हीमोफीलिया ग्रस्त व्यक्तियों, यानी पीडब्ल्यूएच, का निदान और पंजीकरण हो चुका है, जिनमें से 24,000 से ज्यादा को हीमोफीलिया ए यानी एचए है। अनुमानित प्रसार दर 1,36,000 मरीजों तक पहुंच सकती है, यानी बड़ी संख्या में मामले शायद अब भी बिना निदान के हों या उनका गलत निदान हुआ हो। उत्तर प्रदेश में निदान किए गए पीडब्ल्यूएच की अनुमानित संख्या करीब 7,700 है, जिनमें से लगभग 5,500 एचए के साथ जी रहे हैं।

अपने उद्घाटन भाषण में प्रोफेसर ए.के. त्रिपाठी (नैदानिक हेमेटोलॉजिस्ट, पूर्व निदेशक आरएमएलआईएमएस, लखनऊ) ने भारत की प्रगति के बावजूद हीमोफीलिया से जुड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर ध्यान खींचा। उन्होंने कहा, “हीमोफीलिया के मरीजों को सामान्य जीवन जीना चाहिए। आज ज्यादातर मरीज रिएक्टिव उपचार पर निर्भर हैं, यानी रक्तस्राव होने के बाद ही थेरेपी दी जाती है। यह तरीका न तो सही है और न ही असरदार। कई मरीज इलाज तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करते हैं और संसाधन, जनशक्ति व फैक्टर में निवेश के बावजूद हमें वो नतीजे नहीं मिल रहे जो चाहिए। उन्हें सिर्फ रक्तस्राव होने पर इलाज नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा उपचार चाहिए जो रक्तस्राव को शुरुआत में ही रोक दे। आगे बढ़ने का बस एक ही रास्ता है, प्रोफिलैक्सिस शुरू करना। 

उन्होंने कहा कि हीमोफीलिया को मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी दीर्घकालिक बीमारियों की तरह संभालना चाहिए, जिसमें जटिलताओं को रोकने के लिए नियमित रिप्लेसमेंट उपचार दिया जाए। आज इसे मुमकिन बनाने के लिए नए उपचार और नए एजेंट मौजूद हैं। हमें उपलब्ध बजट का बेहतर उपयोग भी करना होगा, ताकि पात्र मरीजों की, खासकर जिन्हें इलाज सबसे ज्यादा चाहिए, पहचान हो और उन्हें सहारा मिल सके।

अगले सत्रों की अगुवाई वरिष्ठ चिकित्सकों और नीति-निर्माताओं ने की। उन्होंने हीमोफीलिया में जीवन की गुणवत्ता, लागत-प्रभावशीलता, उत्तर प्रदेश के लिए मानक उपचार दिशानिर्देशों (एसटीजी) की भूमिका और आगे की राह, रियल-वर्ल्ड एविडेंस और थेरेपी चयन जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।

‘उत्तर प्रदेश के लिए मानक उपचार दिशानिर्देशों की भूमिका और आगे की राह’ पर हुई बातचीत में डॉ. एस.पी. वर्मा (प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, नैदानिक हेमेटोलॉजी विभाग, केजीएमयू) ने कहा, “हीमोफीलिया एक आनुवंशिक विकार है, जिसमें जीवन भर रक्तस्राव का खतरा बना रहता है। जोड़ों में बार-बार रक्तस्राव से जोड़ खराब हो जाते हैं, चलना मुश्किल हो जाता है और आखिरकार मरीज व्हीलचेयर या बिस्तर तक सिमट कर रह जाता है। नियमित रिप्लेसमेंट उपचार, यानी प्रोफिलैक्सिस, जोड़ों और मांसपेशियों की रक्षा करता है और मरीज के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है। उत्तर प्रदेश में हमें हीमोफीलिया के इलाज का तरीका बदलना होगा। फिलहाल ज्यादातर उपचार ऑन-डिमांड, यानी रक्तस्राव हो चुकने के बाद दिया जाता है। हमें ऐसे उपचार की ओर बढ़ना है जो रक्तस्राव को शुरुआत में ही रोक दे। इसके लिए और फंडिंग चाहिए, फैक्टर की उपलब्धता चाहिए और नए उपचार विकल्प अपनाने होंगे। सादे शब्दों में कहूं तो प्रोफिलैक्सिस का असर गहरा है, यह परिवार पर निर्भरता घटाता है, मरीजों को स्वस्थ जिंदगी जीने में मदद करता है और उन्हें अपने सपने पूरे करने का हौसला देता है।”

इलाज के बदलते स्वरूप पर रोशनी डालते हुए, ‘हीमोफीलिया ए ग्रस्त व्यक्ति (पीडब्ल्यूएचए): प्रोफिलैक्सिस का बदलता परिदृश्य’ विषय पर सत्र की अगुवाई डॉ. नीता राधाकृष्णन (प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, बाल हेमेटोलॉजी एवं ऑन्कोलॉजी, पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ, नोएडा) ने की। उन्होंने हीमोफीलिया ए में प्रोफिलैक्सिस के बड़े बदलाव पर चर्चा की और उन नई प्रगतियों को रखा, जिनसे रक्तस्राव की रोकथाम अब ज्यादा असरदार और टिकाऊ हो रही है। 

उन्होंने कहा, “नियमित रिप्लेसमेंट थेरेपी, यानी प्रोफिलैक्सिस, के जरिए निवारक उपचार अब विश्व स्तर पर मानक देखभाल बन चुका है। उपचार का यह बदलता परिदृश्य निवारक देखभाल को मजबूत करने और मरीजों के दीर्घकालिक नतीजों को बेहतर बनाने का मौका देता है। उत्तर प्रदेश में हीमोफीलिया का बोझ बढ़ रहा है, इसलिए राज्य को प्रोफिलैक्सिस का महत्व पहचानना चाहिए और मरीजों के लिए बेहतर दीर्घकालिक स्वास्थ्य नतीजों को सुनिश्चित करने के लिए इसे व्यापक रूप से अपनाने पर विचार करना चाहिए।”

विनीत मंचंदा (सचिव, हीमोफीलिया सोसाइटी, लखनऊ) और मनोज (हीमोफीलिया फेडरेशन ऑफ इंडिया, उत्तर एवं आगरा चैप्टर) ने मिलकर कहा, “फैक्टर आठ, जो हीमोफीलिया मरीजों में रक्तस्राव रोक सकने वाला क्लॉटिंग फैक्टर है, बहुत महंगा है। सरकारी अस्पतालों में इसकी आपूर्ति भी अनियमित रहती है, जिससे इसकी उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन जाती है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में हीमोफीलिया के लिए 80 करोड़ रुपये का बजट था, जिसमें से 52 करोड़ रुपये राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) से और 28 करोड़ रुपये राज्य से आए और यह 5,000 से ज्यादा मरीजों के लिए था। इस साल का बजट अभी तक न तो एनएचएम ने जारी किया है और न ही राज्य सरकार ने, जिससे फैक्टर आठ की आपूर्ति बेहद मुश्किल हो गई है।

उन्होंने कहा कि हीमोफीलिया मरीजों को नुकसान से बचाने के लिए फिजियोथेरेपी की भूमिका को कम नहीं आंकना चाहिए, साथ ही प्रोफिलैक्सिस जैसी नई थेरेपी तक पहुंच भी मजबूत करनी होगी। रिएक्टिव थेरेपी से बार-बार रक्तस्राव होता है, जोड़ों को नुकसान पहुंचता है और विकृति भी आ सकती है। आज बच्चों को भी प्रोफिलैक्सिस दिया जा रहा है और उत्तर प्रदेश में 5,000 से ज्यादा मरीज अभी ऑन-डिमांड उपचार पर हैं। 

उन्होंने बताया कि प्रोफिलैक्सिस की उपलब्धता एक गंभीर मुद्दा बनी हुई है, खासकर तब जब कुछ मरीजों को घुटने या कूल्हे की महंगी प्रत्यारोपण सर्जरी की जरूरत पड़ जाती है। इसी वजह से उन्होंने उच्च न्यायालय में एक लिखित जनहित याचिका भी दायर की है और उत्तर प्रदेश की आवश्यक दवा सूची, यानी ईडीएल, में हीमोफीलिया की थेरेपी शामिल करने का मामला उठाया है। ये थेरेपी राष्ट्रीय ईडीएल और 15 प्रमुख राज्यों की ईडीएल में शामिल हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में फिलहाल शामिल नहीं हैं।

यूपी-हीमोफीलिया कॉन्क्लेव 2026 में हुई चर्चाओं ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि हीमोफीलिया की देखभाल के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण जरूरी है। जिसमें चिकित्सक, संबद्ध स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और अन्य हितधारक साथ आकर निदान और उपचार में हुई प्रगति को मरीजों के लिए असली फायदे में बदल सकें। कॉन्क्लेव ने पूरे उत्तर प्रदेश में प्रोफिलैक्सिस, बहु-विषयक उपचार, नए उपचार विकल्पों और टिकाऊ देखभाल के रास्तों तक पहुंच मजबूत करने पर जोर दिया। 

रिएक्टिव देखभाल से निवारक देखभाल की ओर बढ़ने के साझा संकल्प के साथ कॉन्क्लेव का समापन हुआ। सभी ने व्यापक, मरीज-केंद्रित हीमोफीलिया देखभाल को आगे बढ़ाने और राज्य भर के हीमोफीलिया मरीजों को अधिक स्वस्थ, अधिक आत्मनिर्भर जिंदगी देने का सामूहिक संकल्प लिया। कॉन्क्लेव में मौजूद नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि हीमोफीलिया मरीजों के निदान और उपचार के लिए देखभाल के हर स्तर पर, यानी तृतीयक, द्वितीयक और प्राथमिक स्तर पर, मानक उपचार दिशानिर्देश होने चाहिए।