बंगीय जनमत में माछ-भात और झालमुड़ी का स्वाद

(डॉ. एस.के. गोपाल)

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल का मतदाता केवल राजनीतिक नारों से प्रभावित नहीं होता। वह इतिहास, पहचान और वर्तमान परिस्थितियों के समन्वय के आधार पर अपना निर्णय देता है। इस दृष्टि से यह चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु वैचारिक और सांस्कृतिक विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर उभरा है।

इस वर्ष एक विशेष सांस्कृतिक संदर्भ भी जुड़ता है वन्दे मातरम रचना के 150 वर्ष पूर्ण होना। यह गीत केवल राष्ट्रगीत नहीं अपितु बंगाल की उस आत्मा का प्रतीक है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी। वंदे मातरम् में निहित मातृभूमि के प्रति समर्पण और गौरव की भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। ऐसे समय में जब चुनावी बहसें अपने चरम पर थीं, यह स्वाभाविक प्रश्न उभरता है कि क्या वर्तमान राजनीतिक विमर्श उस मूल भावना से जुड़ पा रहा है जिसने कभी समाज को एक सूत्र में बांधा था।

बंगाल का राजनीतिक इतिहास लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में रहा है। लगभग तीन दशकों तक चले वाम शासन ने भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार और सामाजिक समानता को केंद्र में रखा। इससे समाज के कई वर्गों को सशक्तिकरण मिला किंतु समय के साथ यह व्यवस्था जड़ता और प्रशासनिक कठोरता का शिकार भी हुई। फलत: जनता के भीतर परिवर्तन की आकांक्षा ने जन्म लिया और एक नए राजनीतिक विकल्प के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।

इसी पृष्ठभूमि में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में ममता बनर्जी का उदय हुआ। तृणमूल कांग्रेस ने स्वयं को वामपंथ के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया किंतु उसकी कई नीतियों और दृष्टिकोणों में वामपंथी प्रभाव भी परिलक्षित होता रहा। जनसंपर्क, लोकलुभावन योजनाओं और क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर इस दल ने अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई और लंबे समय से स्थापित सत्ता संरचना को बदल दिया। हालांकि, समय के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक परिवर्तन ने नए विमर्शों को जन्म दिया। हालिया चुनावों में यह विशेष रूप से देखने को मिला कि सांस्कृतिक प्रतीकों और दैनिक जीवन से जुड़े प्रसंगों को भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाया गया। प्रधानमंत्री वाला झाल मुड़ी प्रकरण इसका एक उदाहरण है जहां एक साधारण खाद्य पदार्थ को आम जनजीवन की सादगी और जमीनी जुड़ाव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी क्रम में माछ-भात प्रकरण ने भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया। चुनावी प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो बंगाल की खान-पान की परंपराओं विशेषकर मछली-भात पर प्रभाव पड़ सकता है। इस बयान ने माछ-भात को एक सांस्कृतिक प्रतीक से आगे बढ़ाकर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। इसके प्रत्युत्तर में अनुराग ठाकुर सहित अन्य नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से माछ-भात का सेवन किया गया जिसमें मंगलवार का दिन विशेष रूप से चर्चा का विषय बना।

यह पूरा प्रसंग केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा। इसने स्थानीय बनाम बाहरी, संस्कृति बनाम राजनीति और परंपरा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे व्यापक विमर्शों को जन्म दिया। एक ओर इसे सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं दूसरी ओर इसे चुनावी रणनीति और प्रतीकात्मक राजनीति के रूप में भी देखा गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीक अब केवल पहचान के माध्यम नहीं, प्रभावी राजनीतिक उपकरण भी बन चुके हैं।

इन घटनाओं का समग्र विश्लेषण यह दर्शाता है कि बंगाल की राजनीति में एक नया रुझान उभर रहा है जहां संस्कृति और राजनीति का घनिष्ठ संबंध स्थापित हो रहा है। यह प्रवृत्ति सकारात्मक हो सकती है क्योंकि इससे जनता के साथ भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है, किंतु इसके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि कहीं वास्तविक मुद्दे जैसे रोजगार, औद्योगिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि इन प्रतीकों के पीछे छिप न जाएं।

चुनाव परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया है कि बंगाल का मतदाता अत्यंत सजग और विवेकशील है। वह अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करता है लेकिन साथ ही वह विकास और सुशासन की अपेक्षा भी करता है। यही कारण है कि वह समय-समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश देता है और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।

विजयी दल के लिए यह जनादेश केवल समर्थन नहीं, एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। जनता ने जो विश्वास व्यक्त किया है, उसे बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निरंतर संवाद आवश्यक है। वहीं, विपक्ष के लिए यह समय आत्ममंथन का है ताकि वे अपनी नीतियों और रणनीतियों को अधिक प्रभावी बना सकें।

इन सभी प्रक्रियाओं को निष्पक्ष और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने में भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला होते हैं और भारत की चुनावी प्रणाली इस दृष्टि से विश्व के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल एक राजनीतिक घटना नहीं अपितु एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव है। वंदे मातरम् के 150वें वर्ष के इस कालखंड में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि राजनीति उस मूल भावना से जुड़े जो इस गीत में निहित है, मातृभूमि के प्रति सम्मान, एकता और समर्पण। यदि राजनीतिक दल इस जनादेश को जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें और जनहित को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करें तो यह निश्चित ही राज्य और देश दोनों के लिए एक सकारात्मक दिशा निर्धारित करेगा। बंगाल की जनता ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया ही नहीं अपितु एक सतत जागरूकता और सहभागिता की प्रक्रिया है। यही जागरूकता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला भी।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल समाजशास्त्री एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)