Sunday , August 9 2026

लुप्त होती पौशाला संस्कृति : लखनऊ की स्मृतियों में बहती शीतलता

(श्रीधर अग्निहोत्री)


एक समय था, जब गर्मियों की तपती दोपहरें केवल धूप की तीव्रता का ही नहीं, बल्कि मानवीय करुणा और सेवा की शीतल छांव का भी अनुभव कराती थीं। कानपुर की गलियों, सड़कों और चौराहों पर सरकंडी से बनी छोटी-छोटी झोपड़ियाँ दिखाई देती थीं—जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक पौशाला कहते थे। यह केवल जल वितरण का स्थान नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की वह जीवंत धारा थी, जिसमें अपनत्व, परोपकार और सह-अस्तित्व का अमृत प्रवाहित होता था।
भरी दुपहरी में, जब सूर्य की किरणें मानो पृथ्वी को तपाकर थका देती थीं, तब ये पौशालाएं राहगीरों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती थीं। शहर के विविध हिस्सों—ऐशबाग डालीगंज, हुसैनगंज, अमीनाबाद विकास नगर, इंद्रानगर, अलीगंज, आलमबाग और राजाजी पुरम आदि क्षेत्रों में ये झोपड़ियाँ मानो करुणा के छोटे-छोटे मंदिर बनकर खड़ी रहती थीं।
सरकंडी की उस सादी-सी झोपड़ी में बैठा एक सरल, निष्कपट व्यक्ति, मटके में भरे शीतल जल से हर आने-जाने वाले की प्यास बुझाने को तत्पर रहता था। मिट्टी के मटके से उठती सोंधी सुगंध, टीन की पनारी से छलकता पानी, और उस सेवा भाव से भरा मुस्कुराता चेहरा—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते थे, जो केवल शरीर ही नहीं, आत्मा को भी तृप्त कर देता था।
इन पौशालाओं के इर्द-गिर्द एक अलग ही संसार बसता था। बच्चे उत्सुकता से झोपड़ी के भीतर झांकते, मानो वहाँ कोई रहस्य छिपा हो। कभी-कभी इस सेवा में मिठास भी घुल जाती—कहीं शक्कर के बताशे, तो कहीं पेठे के कोमल टुकड़े राहगीरों को दिए जाते। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि स्नेह और अपनत्व का प्रसाद था, जो अनायास ही हृदय को छू जाता था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन पौशालाओं में कोई भेदभाव नहीं होता था। यहाँ न कोई जाति थी, न कोई वर्ग, न कोई ऊँच-नीच—हर व्यक्ति केवल एक प्यासा इंसान था, और हर सेवक एक करुणामय हृदय। यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस मूल भाव को जीवित रखती थी, जहाँ ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ की भावना सहज रूप में दिखाई देती थी।
किन्तु समय की धारा के साथ यह संस्कृति धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती चली गई। आधुनिक जीवनशैली, बोतलबंद पानी की सहज उपलब्धता और व्यस्त दिनचर्या ने इस परंपरा की जड़ों को कमजोर कर दिया। अब वे सरकंडी की झोपड़ियाँ, वे मटकों की सोंधी महक और वह निस्वार्थ सेवा भाव कहीं-कहीं ही देखने को मिलता है।
आज जब हम अतीत की ओर दृष्टि डालते हैं, तो महसूस होता है कि पौशाला केवल एक व्यवस्था नहीं थी—वह समाज की आत्मा का प्रतिबिंब थी। यह हमें सिखाती थी कि सच्चा धर्म दिखावे में नहीं, बल्कि किसी अनजान की प्यास बुझाने में है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम इस विलुप्त होती परंपरा को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उसके मूल भाव—मानवता, सेवा और सहृदयता—को अपने जीवन में पुनः स्थान दें। शायद तब, किसी तपती दोपहर में, फिर से कहीं सरकंडी की एक झोपड़ी खड़ी हो—और उसमें बैठा कोई व्यक्ति, बिना किसी अपेक्षा के, किसी प्यासे को जीवन का अमृत पिला रहा हो।

(लेखक श्रीधर अग्निहोत्री वरिष्ठ पत्रकार एवं उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के मीडिया सलाहकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)