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समय से संवाद करता फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्य

पुण्यतिथि (11 अप्रैल) पर स्मरण

(डॉ. एस.के. गोपाल)

हिंदी साहित्य में फणीश्वर नाथ रेणु का स्मरण केवल एक लेखक को याद करना भर नहीं है बल्कि उस जीवंत संवेदना को पुनः जागृत करना है जो साहित्य को समाज से जोड़ती है। क्या हम अपने समय को उतनी ही ईमानदारी और गहराई से देख पा रहे हैं जितनी दृष्टि रेणु ने अपने दौर में दिखाई थी? उन्हें आंचलिक कथाकार कहकर सीमित कर देना उनके साहित्य की व्यापकता को कम करके आंकना है। वस्तुत: रेणु का साहित्य किसी भौगोलिक अंचल की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं अपितु वह भारतीय समाज के व्यापक जीवनानुभवों का सशक्त और संवेदनशील दस्तावेज़ है। उन्होंने जीवन को उसके समस्त विरोधाभासों, संघर्षों और संभावनाओं के साथ चित्रित किया जिससे उनका साहित्य केवल कथा नहीं बल्कि समाज का दर्पण बन गया। आज जब हम तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में खड़े हैं तब रेणु का साहित्य हमें अपने समय को समझने की दृष्टि प्रदान करता है।

रेणु के साहित्य में गांव की मिट्टी की सोंधी महक है किंतु वह केवल ग्रामीण जीवन का रोमानी चित्रण नहीं है। उनके यहाँ गांव जीवन का यथार्थ है, जहाँ अभाव भी है, संघर्ष भी है, और जीवन के प्रति अदम्य जिजीविषा भी। किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, वंचित, निम्नवर्ग, मध्यवर्ग, समाज का कोई भी वर्ग उनकी दृष्टि से अछूता नहीं रहता। उनका जन्म बिहार के औराही हिंगना गाँव में हुआ लेकिन उनकी दृष्टि पूरे भारतीय समाज पर केंद्रित रही। मैला आंचल इसका सबसे सशक्त उदाहरण है जिसमें एक अंचल विशेष की कथा के माध्यम से स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जटिलताओं को उद्घाटित किया गया है। इस उपन्यास में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली, सत्ता के हस्तक्षेप, सामाजिक विषमताओं और आमजन के संघर्षों का जो चित्रण मिलता है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यही कारण है कि रेणु का साहित्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता, बल्कि हर दौर में नई अर्थवत्ता के साथ सामने आता है।

रेणु की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी प्रामाणिकता और जीवन्तता है। उन्होंने लोकभाषा, बोलियों, कहावतों और मुहावरों को जिस सहजता से अपनी रचनाओं में स्थान दिया, वह उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके यहाँ भाषा कोई सजावटी माध्यम नहीं बल्कि जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। पाठक जब उनकी रचनाएँ पढ़ता है तो वह केवल कहानी नहीं पढ़ता बल्कि उस जीवन को जीने लगता है, जो उन पंक्तियों में धड़क रहा होता है। उनके पात्र किसी आदर्श या प्रतीक मात्र नहीं, बल्कि हमारे आसपास के जीवित मनुष्य हैं। उनकी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं का गहरा स्पर्श मिलता है जिसका सशक्त उदाहरण उनकी कहानी पर आधारित फिल्म तीसरी कसम है। इस कथा में प्रेम, विश्वास, सरलता और विडंबना के माध्यम से लोकजीवन की गहराइयों को जिस मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है, वह आज भी दर्शकों और पाठकों को भावुक कर देता है और उन्हें भीतर तक प्रभावित करता है।

रेणु का साहित्य केवल संवेदनाओं का संसार नहीं, अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक हलचलों का सशक्त दस्तावेज़ भी है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव, उसके बाद की राजनीति, सत्ता संघर्ष, ग्रामीण सत्ता संरचनाओं और प्रशासनिक विसंगतियों को बहुत बारीकी से देखा और उसे अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाओं में राजनीतिक उठा-पटक केवल पृष्ठभूमि नहीं बल्कि कथा का सक्रिय हिस्सा बनकर सामने आती है जिससे पाठक को उस समय की वास्तविकताओं का सजीव अनुभव होता है। आज के संदर्भ में देखें तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि राजनीति और जनजीवन के बीच बढ़ती दूरी को समझने के लिए रेणु का साहित्य हमें एक संवेदनशील दृष्टि प्रदान करता है। उनकी जन्मशती पर लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा एक बृहद सांस्कृतिक आयोजन की परिकल्पना की गई थी जिसका शुभारंभ लखनऊ के विद्यांत कॉलेज में हुआ, जहाँ उनके साहित्य पर चर्चा और तीसरी कसम का प्रदर्शन भी किया गया, किंतु कोरोना महामारी के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी और कार्यक्रमों की श्रृंखला अधूरी रह गई।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए यह आवश्यक है कि हम उनके साहित्य की मूल भावना को समझें और उसे अपने समय के संदर्भ में परखें। आज का समाज उपभोक्तावाद, तकनीकी तेज़ी और तात्कालिकता के दबाव में लगातार बदल रहा है। ऐसे समय में रेणु का साहित्य हमें ठहरकर सोचने की प्रेरणा देता है। वह हमें यह सिखाता है कि विकास केवल भौतिक उपलब्धियों का नाम नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक संतुलन का भी प्रश्न है। रेणु को याद करना दरअसल अपने समय से सवाल करना है। क्या हम उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी कल्पना साहित्य ने की थी? क्या हमारे विकास में मनुष्य और उसकी संवेदनाएँ केंद्र में हैं? उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके साहित्य को केवल पाठ्य सामग्री के रूप में न देखें बल्कि उसे अपने जीवन और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाएं। रेणु का साहित्य हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि सच्चा साहित्य वही है जो जीवन के निकट हो, जो समाज को समझे और जो मनुष्य को बेहतर बनने की प्रेरणा दे।

(लेखक डा. एस. के. गोपाल कला समीक्षक, साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)