नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से हवाई सफर बुरी तरह से प्रभावित होने की आशंका बन गई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण पिछले एक महीने की अवधि में जेट फ्यूल यानी एयर टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) की कीमत में वैश्विक स्तर पर 100 प्रतिशत से अधिक की तेजी आ गई है। ऐसी स्थिति में विमानन कंपनियों के सामने हवाई यात्रा को महंगा करने की मजबूरी बन गई है।जेट फ्यूल की बढ़ी कीमत के कारण दबाव का सामना कर रही विमानन कंपनियों ने इस संबंध में केंद्र सरकार से एयरपोर्ट चार्ज में कटौती करने की मांग की है। इन कंपनियों का कहना है कि अगर एयरपोर्ट चार्ज में कटौती नहीं की गई, तो हवाई किराए में उन्हें लगभग दोगुनी बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।फरवरी से लेकर अभी तक की अवधि में जेट फ्यूल की कीमत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 20 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में जेट फ्यूल 95.90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बिक रहा था, जो अब बढ़ कर 197 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है। इस तरह जेट फ्यूल की कीमत में एक महीने की अवधि में दोगुनी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो गई है।अंतरराष्ट्रीय बाजार में जेट फ्यूल की कीमत में आई तेजी का असर भारतीय बाजार में भी साफ-साफ नजर आ रहा है। दावा किया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से सामंजस्य बैठाने और बड़े नुकसान से बचने के लिए भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (ओएमसी) अप्रैल के महीने में एटीएफ की कीमत में एक बार फिर बड़ी बढ़ोतरी करने का ऐलान कर सकती हैं। ऐसा होने पर पहले ही बढ़े हुए ऑपरेटिंग कॉस्ट का सामना कर रही विमानन कंपनियों के ऑपरेटिंग कॉस्ट और अधिक बढ़ोतरी हो सकती है। ऑपरेटिंग कॉस्ट में बढ़ोतरी होने का असर हवाई टिकट के मूल्य पर भी नजर आ सकता है।ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ने की आशंका से चिंतित विमानन कंपनियों ने केंद्र सरकार से हवाई अड्डों पर लैंडिंग और पार्किंग चार्ज को कम करने की मांग की है। इसके साथ ही इन कंपनियों ने टैक्स के मोर्चे पर भी केंद्र सरकार से राहत देने का अनुरोध किया है, ताकि जेट फ्यूल की कीमत में बढ़ोतरी होने की वजह से बढ़ी हुई लागत की कुछ हद तक भरपाई की जा सके। हालांकि मौजूदा व्यवस्था के तहत हवाई अड्डों पर लैंडिंग और पार्किंग चार्ज में कटौती होने की संभावना काफी कम मानी जा रही है। जानकारों का कहना है कि देश के ज्यादातर प्रमुख हवाई अड्डों को निजी कंपनियां संचालित कर रही हैं। ऐसी स्थिति में वे किसी भी तरह की छूट देने का विरोध कर सकती हैं।जानकारों का कहना है कि किसी भी एयरलाइन के कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट में जेट फ्यूल पर होने वाला खर्च लगभग 40 प्रतिशत होता है। जेट फ्यूल की कीमत बढ़ने पर स्वाभाविक रूप से कंपनियों के मुनाफे में भी कमी आ जाती है। कहा जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जारी जंग के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ान संचालित करने वाली विमानन कंपनियां को कई रूट पर लंबी उड़ान भी भरनी पड़ रही है।खाड़ी क्षेत्र में कई देशों के एयर स्पेस बंद होने की वजह से विमानों को लंबा रूट अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिससे जेट फ्यूल की खपत भी बढ़ गई है और उड़ानों के संचालन पर होने वाला खर्च भी बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में अगर विमानन कंपनियों को एयरपोर्ट चार्ज और टैक्स में रहता नहीं मिला, तो उनके सामने हवाई किराए में बढ़ोतरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा।
Telescope Today | टेलीस्कोप टुडे Latest News & Information Portal