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कोशला लिटरेचर फेस्टिवल : लॉन्चिंग संग अदब, विरासत और अयोध्या पर चला चर्चाओं का दौर

रील और रियल की दुनिया में डूबे-उतराये लखनऊवासी

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। ला-मार्टीनियर ब्वायज़ कॉलेज में चल रहे ‘कोशल लिटरेचर फेस्टिवल’ के दूसरे दिन शनिवार को कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित हुए। जिनमें बुक लॉन्चिंग और उन पर बातचीत, अदब, विरासत और अयोध्या जैसे विषयों पर चर्चाओं का दौर चला। ‘एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड’ के नए संस्करण की लॉन्चिंग भी हुई। तीन दिवसीय ‘कोशल लिटरेचर फेस्टिवल’ का यह दूसरा संस्करण 11 फरवरी तक आयोजित होगा।

फेस्टिवल के पहले सत्र में सुबह 11:20 बजे आर्किटेक्ट विपुल वार्ष्णेय की कॉफी टेबल बुक ‘अयोध्या’ की लॉन्चिंग के साथ ही लेखिका की चंद्रशेखर वर्मा से बातचीत हुई। इस दौरान विपुल वार्ष्णेय ने बताया कि अयोध्या सिर्फ श्रीराम के लिए ही नहीं जानी जाती, अयोध्या की एक गौरवमयी वास्तु विरासत भी है। आर्किटेक्चर के तौर पर अयोध्या एक वंडरफुल शहर है। वाल्मीकि रामायण में अयोध्या को लैंड ऑफ रोड, फ्रूटिंग ट्री, अमरावती ऑफ लॉर्ड इंद्रा आदि कहा गया है। अयोध्या को देवशिल्पी विश्वकर्मा ने बनाया है। अयोध्या के वास्तु के बारे में हजारों रोचक कहानियाँ हैं। चंद्रशेखर वर्मा ने कहा कि अयोध्या के लोगों में कल्चर और हेरिटेज आज भी दिखता है, हजारों साल पुरानी धरोहर को स्थानीय जनता आज भी सँजोये हुए है।

विपुल ने अपने वक्तव्य में अयोध्या के महाभारत कनेक्शन की भी चर्चा की। उन्होंने अयोध्या के 500 मंदिरों में से करीब 30-31 मंदिरों का अपनी किताब में जिक्र किया है, जो सरयू के किनारे और मध्य में स्थित हैं और जिनको देखने लोग जाते हैं। बताते चलें कि अयोध्या का एयरपोर्ट विपुल वार्ष्णेय ने ही डिजाइन किया है।

दूसरे सत्र में ‘एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड’ के नए संस्करण की लॉन्चिंग हुई, जिसमें बीएफ़सी पब्लिकेशंस को इससे विभूषित किया गया। बीएफ़सी ग्रुप के सीईओ सुनील गुप्ता और सीओओ शरद बिंदल ने इस अवार्ड को ग्रहण किया। बता दें कि बीएफ़सी पब्लिकेशंस ने एक साथ 63 ई-बुक एक दिन में लॉन्च करके रिकॉर्ड कायम किया है। 2020 में और शुरू हुए इस पब्लिकेशंस ने कई माइल स्टोन स्थापित किए हैं। आज इस पब्लिकेशंस के पास 2 हजार से भी ज्यादा ओरिजिनल टाइटल हैं।

अगले सत्र में लेखक शरद बिंदल से उनकी दूसरी किताब ‘डॉन ऑफ डुअलिटी’ पर इशिता सिंह ने चर्चा की। बातचीत की शुरुआत शरद बिंदल द्वारा एक उद्यमी से पौराणिक कथाकार बनने के अपने विकास के बारे में साझा करने के साथ हुई। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे उनके बचपन और परिवार ने धर्मग्रंथों और पौराणिक कथाओं में उनकी रुचि विकसित करने में प्रमुख भूमिका निभाई, जिसने अंततः उन्हें एक लेखक बनने के लिए प्रेरित किया। बिंदल ने लेखन के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के लिए अपनी पत्नी दीप्ति बिंदल के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने ज्ञान के प्रति अपने प्रेम और अपने ज्ञान को अपने पाठकों के साथ साझा करने की अपनी दृष्टि पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि “मैंने कोशिश की कि अपने पाठकों को ज्यादा से ज्यादा बता सकूँ।” बिंदल ने यह भी बताया कि कैसे उनकी किताबों में वर्णित आकर्षक और रहस्यमय स्थान बिल्कुल वास्तविक हैं। उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के लिए विकृतियों के बिना धर्मग्रंथों और पौराणिक कथाओं को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने के महत्व पर जोर दिया। बिंदल ने कहा, “मेरी किताबें पौराणिक कथाओं का पुनर्कथन हैं न कि उनका विरूपण।”

इसके बाद ‘विरसा-ए-अदब: मुंशी नवल किशोर’ विषय पर हिमांशु बाजपेयी और अभिषेक शुक्ला की बातचीत का सत्र चला, जिसमें दोनों वक्ताओं ने मुंशी जी की ज़िंदगी का एक मुख्तसर जायजा लिया। हिमांशु ने बताया कि मुंशी नवल किशोर मेरे बहुत अज़ीज़ किरदार हैं, वो हिंदुस्तान के एक मशहूर क़ातिब थे, प्रकाशक थे। उन्होंने 1858 में लखनऊ में मुंशी नवल किशोर प्रेस की स्थापना की थी। मुंशी ने मिर्ज़ा ग़ालिब के दीवान सहित उर्दू के कई नामचीन शायरों की किताबें छापी थीं। इस प्रेस की अदब में, सहाफ़त में बहुत खिदमात है। बक़ौल हिमांशु, 1857 की क्रान्ति के बाद देश के दमनकारी पसमंजर में मुंशी जी ने इस प्रेस को शुरू किया था। वे किताबत के फन में माहिर होते थे और बड़ी पाकीज़गी से किताबत करते थे। लखनऊ का तसव्वुर जिन चंद लोगों से बनता है उनमें मुंशी जी प्रमुख थे। मुंशी जी ने किताबों को मक़बूल बनाने के लिए बैलगाड़ियों से उन्हें गाँव-गाँव पहुंचाया था। दुनिया में लखनऊ जैसा कोई शहर नहीं जिसने इस तरह किताबत की। उन्होंने उस जमाने में ‘अवध अखबार’ की भी शुरुआत की थी जो काफी चर्चित हुआ था। वहीं अभिषेक ने इस प्रेस के हवाले से ज़िक्र किया कि उर्दू अदब वालों, खासकर लखनऊ वालों पर मुंशी जी का बहुत बड़ा अहसान है। उन्होंने 5 हजार से ज्यादा किताबें छापीं और लोगों में किताब पढ़ने की आदत डाली। अपनी किताबत से उन्होंने लखनऊ में एक तिलिस्म पैदा कर रखा था।

अगले सत्र के दौरान, सफ़ीर आनंद, गौरव प्रकाश और मारूफ़ कलमेन ने आनंद की पुस्तक “इंडिया अनबॉक्स्ड” पर चर्चा की। आनंद ने अपनी पुस्तक में भारतीयों की 75 अनोखी और विचित्र आदतों के बारे में बात की, जिन्हें उन्होंने “भारतीयता” कहा। उनका लक्ष्य एक ऐसी किताब बनाना था, जिसे बच्चों से लेकर वयस्कों तक सभी उम्र के लोग पढ़ सकें और उससे जुड़ सकें। आनंद ने भारत की विविधता पर भी जोर दिया और बताया कि कैसे कई चीजें हैं जो देश को एक साथ लाती हैं। प्रकाश ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से लखनऊ में कम खोजे गए स्थानों को प्रदर्शित करने में कुलमेन के योगदान पर प्रकाश डालते हुए सत्र को जारी रखा, जिससे शहर पर एक नया और ताज़ा दृष्टिकोण प्रस्तुत हुआ।

आगे सफ़ीना ख़ान के परिचय वक्तव्य साथ लेखक गुरचरन दास ने अपनी जीवनी “अनदर सार्ट आफ फ्रीडम” पर बात की। बताया कि उनका बचपन लाहौर में उनकी माँ के साये में गुजरा। उन्होंने अपनी माँ की डायरे के हवाले से अपने जीवन के डिफरेंट स्टेज का जिक्र किया। खुशी पाने के सीक्रेट तरीकों के बरअक्स दिलचस्प किस्से सुनाये। गुरचरन दास ने अपने बिजनेस करियर, राइटिंग करियर और लिटरेचर करियर पर विस्तार से चर्चा की, जिसे उन्होंने अपनी किताब का हिस्सा बनाया है।  

इसके बाद आस्ट्रेलियाई लेखक जान ज़ुब्र्स्की से केएलएफ के डायरेक्टर अमिताभ सिंह बघेल ने उनकी नई किताब ‘डीथ्रोंड’ पर बात की। जॉन का कहना था कि इंडिया में कहने के लिए बहुत सी दिलचस्प कहानियाँ हैं, जिन्हें लोगों के सामने लाना चाहिए। लखनऊ की तहजीब से होते हुए ‘नवाब ऑफ जूनागढ़’ तक की चर्चा की। ब्रिटिश इंडिया, मूवमेंट्स और पार्टिशन पर बात करते हुए उन्होंने जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, मेनन और माउण्टबेटन को ‘आर्किटेक्ट्स ऑफ फ्री इंडिया’ बताया।

अंतिम सत्र में वरिष्ठ पत्रकार और ‘द लल्लनटॉप शो’ के संस्थापक-संपादक सौरभ द्विवेदी ने ‘रीडिंग इन द एज ऑफ रील्स’ विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने लखनऊ को प्रणाम करते हुए अपने अलहदा अंदाज में रील से लेकर रीडिंग की बात की। बक़ौल सौरभ, मैं इस विषय पर कोई भाषण तैयार करके नहीं आया। इस विषय पर बोलने का जब आमंत्रण आया तो मैं रील देख रहा था। (यह सुनकर वहाँ तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।) आगे सौरभ ने कहा कि रीलें तो मैं देखता ही हूँ, कोशिश करता हूँ कि कम देखूँ। ब्रेक ले-लेकर देखूँ और फिर उसे रियल में खोजूँ। रील में बड़ी लय होती है भले लोगों में भी और छपरी लोगों में भी।

जब मैं छोटा था तो लक्ष्य तय कर रखा था कि बड़ा होऊंगा तो यह बनूँगा, यह करूँगा। लॉलीपॉप खाऊँगा, जेब में एलपेनलीबे रखूँगा। बड़े होते हो तो तुम्हारे कंधे पर जुआ रख दिया जाता है नौकरी और रोजगार का। हम सुनहरे ख्वाब भी देखने लगते हैं। रील की दुनिया हमें ऐसे ही ख्वाब दिखाती है। मैंने एक अमेरिकी दोस्त से पूछा कि रील देखकर क्या फील होता है? उन्होंने बताया कि उत्तेजना होती है। बहरहाल किसी सुख की तलाश में हम तुरत-फुरत रीलें देखते हैं और देखते जाते हैं। फिर अचानक से कोई बाधा आती है और फिर हमें एक खालीपन महसूस होता है। रील की दुनिया से निकलते हैं तो एक वीतरागी सा लगता है। कितना सुंदर सा दिखता है रील का यह संसार। रियल में एक सन्नाटा दिखता है, अधूरे ख्वाब सी दुनिया नजर आती है। वो दुनिया जिसे हम रीडिंग की दुनिया, रील की दुनिया कहते हैं, उसका जादू अलग ही होता है। रीडिंग की दुनिया में दाखिल होने के बाद हमारे पंख उग आते हैं और हम उड़ चलते हैं। तो जब, जहाँ, जो मिले…पढ़िये। बिना किसी हिचक के। ट्रेन में, बस में, गाड़ी में, होटल में जाएं तो पढ़ें और उसकी अर्थवत्ता को समझें। आखिर में उन्होंने कहा कि “रील जब तक देखते रहिए तब तक खयाल रखिए कि अंततः मुक्ति रीडिंग में ही है।”

फेस्टिवल की शाम ‘दिल की क़लम से’ गुलज़ार रही, जिसमें शायर चन्द्रशेखर वर्मा और गायिका प्रभा श्रीवास्तव दर्शकों के सामने थे। वर्मा के शायराना अन्दाज़ और मोहब्बत से लबरेज लफ्जों के साथ कार्यक्रम की शुरुआत के बाद प्रभा ने “वैलेंटाइन वीक, रोमानी मौसम, शाम का समां” में हिन्दी फिल्मों के मधुर गीतों को अपने ही अंदाज में गाये, जैसे- फिल्म ‘कोहरा’ का गाना ‘ये नयन डरे-डरे…..’, फिल्म ‘गाइड’ का गाना ‘दिन ढाल जाये हाय, रात ना जाये….’, ‘बालिका वधू’ का गाना ‘बड़े अच्छे लगते हैं..।’

वहीं ‘टेक द स्टेज’ के तहत आज भी कविताओं, गजलों, म्यूजिकल बैंड परफ़ोर्मेंस और नुक्कड़ नाटकों दौर चलता रहा, जिसमें युवाओं ने जोश के साथ हिस्सा लिया।