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मीरा के बहाने लोकसंस्कृति का उत्सव

मीराबाई जयंती (शरद पूर्णिमा) पर विशेष

(डॉ. एस.के. गोपाल) 

शरद पूर्णिमा की चाँदनी और कृष्णभक्ति के स्वरों के बीच मीराबाई की स्मृति सहज ही जीवंत हो उठती है। मीरा भारतीय भक्ति परंपरा की ऐसी विलक्षण कवयित्री हैं, जिनके जीवन में प्रेम, साधना और प्रतिरोध का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने राजमहल के वैभव और सामाजिक अपेक्षाओं की तुलना में अपने आराध्य के प्रति समर्पण को अधिक महत्त्व दिया। उनका जीवन कृष्णभक्ति के साथ आत्मसम्मान, स्वतंत्र चेतना और रूढ़ियों के सामने अडिग रहने के साहस का भी आख्यान है।

सुधाकर अदीब का उपन्यास रंग राची मीराबाई के इसी बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने का महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आधार है। इसमें मीरा की संघर्ष-यात्रा, कृष्ण के प्रति अनन्य निष्ठा और सामंती व्यवस्था से उनके टकराव को प्रमुखता मिली है। उनका विद्रोह सत्ता पाने की आकांक्षा से नहीं, अपने विश्वास और आत्मसम्मान की रक्षा से जन्म लेता है। मीरा उस व्यवस्था के सामने झुकने से इनकार करती हैं, जो स्त्री की आस्था, इच्छा और अभिव्यक्ति को सीमित करना चाहती है। इसीलिए उनका व्यक्तित्व भक्ति के साथ स्वतंत्र चेतना का भी प्रतीक बन जाता है।

साँवरे के रंग में रंग जाना मीरा के लिए अपने समूचे अस्तित्व को कृष्णमय बना देना है। उनकी कृष्णभक्ति में विरह की पीड़ा, मिलन की उत्कंठा और समर्पण का आनंद समाहित है। कृष्ण उनके लिए दूरस्थ देवता नहीं, जीवन की आत्मीय उपस्थिति हैं। यही आत्मीयता उनके पदों को भावनात्मक गहराई देती है। लोकलाज की परवाह किए बिना अपने आराध्य के प्रति अनुराग व्यक्त करना उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में साहसपूर्ण निर्णय था। मीरा ने अपने जीवन से दिखाया कि सच्ची आस्था बाहरी दबाव से संचालित नहीं होती।

मीरा के पदों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता और लोकग्राह्यता है। राजस्थानी और ब्रजभाषा सहित लोकभाषाओं की मिठास से समृद्ध उनके गीत पुस्तकों तक सीमित नहीं रहे। लोकगायकों, भजन मंडलियों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली गायन परंपराओं ने उन्हें जीवित रखा। विभिन्न क्षेत्रों की संगीत शैलियों ने मीरा के पदों को अपने स्वर दिए और उनका काव्य लोकजीवन की सामूहिक स्मृति बन गया। यही कारण है कि मीरा साहित्य की सीमा पार कर जनमानस की चेतना में आज भी उपस्थित हैं।

मीरा की प्रासंगिकता धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। उनका जीवन सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंध पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। परंपरा का सम्मान करने का अर्थ प्रत्येक पुरानी मान्यता को स्वीकार करना नहीं है। मनुष्य की गरिमा को सीमित करने वाली मान्यताओं पर प्रश्न उठाना भी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। मीरा ने अपने समय में यह साहस दिखाया। उनकी कविता आज भी प्रेम, आत्मसम्मान और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मूल्यों को समझने की प्रेरणा देती है।

शरद पूर्णिमा को मीराबाई जयंती मनाने की प्रचलित परंपरा कृष्णभक्ति और लोकस्मृति को जोड़ती है। इस अवसर पर उनके पदों का गायन सांस्कृतिक विरासत को वर्तमान से जोड़ने का माध्यम बनता है। ऐसे आयोजन तभी सार्थक हैं, जब वे औपचारिक समारोह तक सीमित न रहकर मीरा के साहित्य, उनके संघर्ष और लोकसंगीत की परंपरा पर गंभीर संवाद का अवसर बनें।

लखनऊ का लोक संस्कृति शोध संस्थान वर्ष 2020 से मीराबाई लोक संगीत सम्मान प्रदान कर रहा है। प्रारंभ में पाँच विभूतियों को सम्मानित करने से शुरू हुई यह परंपरा आगे चलकर प्रतिवर्ष सात विभूतियों तक विस्तृत हुई। इस पहल का उद्देश्य लोकसंगीत और भक्ति संगीत के साधकों को पहचान देना तथा मीरा की सांस्कृतिक विरासत को जनमानस तक पहुँचाना है।

वर्ष 2020 में डॉ. सुधाकर अदीब, डॉ. रामबहादुर मिश्र, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. भारती सिंह, परमानन्द पांडेय, ज्योति किरण सिन्हा और आदर्श मौर्य सम्मानित हुए। वर्ष 2021 में हाशिम रजा जलालपुरी, शशिलेखा सिंह, विमल पंत, पद्मा गिडवानी और दया चतुर्वेदी तथा वर्ष 2022 में मुक्ता चटर्जी, विनीत सिन्हा, शारदा पांडेय, अरुणा उपाध्याय और शशांक शर्मा को सम्मानित किया गया।

वर्ष 2023 में इन्दु सारस्वत, डॉ. सरोजिनी सक्सेना, रश्मि उपाध्याय, रेखा अग्रवाल, आभा शुक्ला, सरिता अग्रवाल और अंतरा भट्टाचार्य को सम्मान मिला। वर्ष 2024 में भवतारिणी सुंदरम अय्यर, नीता गुप्ता, सौम्या गोयल, अंजलि सिंह, मधु श्रीवास्तव, प्रो. उषा वाजपेयी और भावना गरवाल सम्मानित हुईं। वर्ष 2025 में डॉ. मुक्ता वार्ष्णेय, आशा श्रीवास्तव, मनु राय, अपर्णा सिंह, सुषमा प्रकाश, शिखा श्रीवास्तव और दीपाली शर्मा को सम्मान दिया गया। वर्ष 2026 के लिए रेखा मिश्रा, अनुज श्रीवास्तव, अलका चतुर्वेदी, डॉ. कुसुम वर्मा, रूपाली श्रीवास्तव, देवेश्वरी पंवार और बबिता सिंह के नाम घोषित किए गए हैं।

सम्मानित विभूतियों में हाशिम रजा जलालपुरी का कार्य विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने मीराबाई के पदों का उर्दू शायरी में रूपांतरण कर भक्ति साहित्य को भाषायी सीमाओं से आगे पहुँचाने का प्रयास किया। उन्होंने कबीर की वाणी को भी उर्दू शायरी में ढाला। उनका काम गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण है, जहाँ भाषा और धर्म की भिन्नताएँ साहित्यिक संवाद में बाधा नहीं बनतीं। मीरा और कबीर की वाणी को उर्दू में प्रस्तुत करना साझा संस्कृति के प्रति उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

लोक संस्कृति शोध संस्थान की सम्मान-परंपरा सांस्कृतिक साधकों के योगदान को सार्वजनिक पहचान देती है। लोकगीत और भक्ति संगीत तभी जीवित रहते हैं, जब कलाकारों को मंच मिले और नई पीढ़ी उनसे जुड़े। सम्मान समारोहों के साथ लोकसंगीत का दस्तावेजीकरण, कार्यशालाएँ और पारंपरिक गायन के प्रशिक्षण जैसे प्रयास भी आवश्यक हैं। संस्कृति का संरक्षण निरंतर अभ्यास और पीढ़ियों के बीच संवाद से ही संभव है।

आज मीरा को याद करने का अर्थ उनके पदों का गायन भर नहीं, उनके प्रेम, आत्मसम्मान और स्वतंत्र चेतना से प्रेरणा लेना भी है। उनका रंग सदियों बाद भी फीका नहीं पड़ा, क्योंकि वह अंतर्मन की अनुभूति का रंग है। उसमें कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, अन्यायपूर्ण बंधनों को चुनौती देने का साहस और लोकसंगीत की जीवंत परंपरा समाहित है। शरद पूर्णिमा पर उनके पदों का गूँजना अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करता है। मीरा के बहाने लोकसंस्कृति का उत्सव मनाने का वास्तविक अर्थ अपनी विरासत को समझना, उसके साधकों का सम्मान करना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)