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घरेलू कारकों के चलते आरबीआई बढ़ा सकता है रेपो रेट: बंधन लाइफ

लखनऊ (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। बढ़ती मैक्रोइकोनॉमिक चुनौतियों और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के बीच, बंधन लाइफ इंश्योरेंस के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक मौजूदा दौर में पॉलिसी रेपो दर में 50–75 बेसिस पॉइंटकी बढ़ोतरी कर सकता है। 

अविनाश अग्रवाल (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ इक्विटी, बंधन लाइफ) ने कहा, “आरबीआई द्वारा यूएस फेडरल रिज़र्व की ब्याज दरों की दिशा का अनुसरण किए जाने की संभावना कम है। कोई भी पॉलिसी कार्रवाई घरेलू इन्फ्लेशन, आर्थिक विकास, लिक्विडिटी और वित्तीय स्थिरता पर आधारित होगी। यदि दरों में बदलाव आवश्यक हुआ, तो यह केवल फेड की दरों में बढ़ोतरी के बजाय घरेलू कारकों से अधिक प्रेरित होगा। 

उन्होंने कहा, भारतीय इक्विटी के लिए, वैश्विक स्तर पर बढ़ी हुई अनिश्चितता और अपेक्षाकृत ऊंचे वैल्यूएशन के कारण बाजार मेंस्टॉक-विशिष्ट रुझानबढ़ने की संभावना है। इसलिए, जिन कंपनियों की आय की स्पष्टता अधिक मजबूत है और जिनमें टिकाऊ विकास की क्षमता है, वेइन्वेस्टर का अधिक ध्यान आकर्षित कर सकती हैं।

उन्होंने कहा, आईटी सेक्टरको चुनौतीपूर्ण आय परिवेश का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि एआई को तेजी से अपनाए जाने से कॉर्पोरेट टेक्नोलॉजी खर्च का स्वरूप बदल रहा है। एआई के लिए अधिक आवंटन से पारंपरिक IT सेवाओं पर होने वाला खर्च कम हो सकता है, जिससे निकट अवधि में आय अनुमानों में बढ़ोतरी को उचित ठहराना कठिन हो सकता है। एफवाई 27 की दूसरी छमाही तक आईटी आय अनुमानों में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर दृश्यता सीमित बनी हुई है।

उन्होंने कहा, वहीं, लंबे समय में अस्पताल क्षेत्र में विकास की मजबूत संभावनाएं बनी हुई हैं। भारत में प्रति हजार लोगों पर अस्पताल के बेड की संख्या अभी भी काफी कम है, जिससे अस्पतालों की जरूरत और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। संगठित हेल्थकेयर कंपनियों का विस्तार, बेड की संख्या बढ़ाना और लगातार हो रहा प्राइवेट इक्विटी निवेश इस क्षेत्र की ग्रोथ को बढ़ावा दे रहे हैं, भले ही इस क्षेत्र में ज्यादा निवेश की जरूरत होती है। हेल्थकेयर की बढ़ती मांग और इस क्षेत्र के तेजी से संगठित होने से अस्पताल उद्योग के लिए माहौल लगातार अनुकूल बना हुआ है।

यूएस फेडरल रिज़र्व की ब्याज दरों की दिशा इन्फ्लेशन, श्रम बाजार की स्थितियों, उपभोक्ता खर्च और समग्र आर्थिक वृद्धि पर निर्भर करेगी। यदि इन्फ्लेशन फिर से बढ़ती है या श्रम बाजार की स्थितियाँ असामान्य रूप से तंग बनी रहती हैं, तो फेड एक से दो अतिरिक्त बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।

हालांकि, बाजार का कुलआउटलुकतेल की कीमतों, अमेरिका की बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक तनाव में होने वाले बदलावों से प्रभावित हो सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर घरेलू मांग पर पड़ सकता है और भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, मिडिल ईस्ट में लगातार जारी संकट का असर केमिकल और फर्टिलाइजर जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।