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ज्ञान से साधना तक गोपीनाथ कविराज की लोक यात्रा

जयंती (7 सितंबर) पर विशेष 

(डॉ. एस.के. गोपाल)

भारतीय ज्ञान-परंपरा में महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज का स्थान इसलिए विशिष्ट है कि उनके व्यक्तित्व में शास्त्र और साधना, तर्क और अनुभूति तथा आधुनिक शिक्षा और परंपरागत ज्ञान का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान, दार्शनिक और शोधकर्ता होने के साथ तंत्र, योग और भारतीय साधना-परंपरा के गंभीर अध्येता थे।

7 सितंबर 1887 को धामराई, ढाका में जन्मे गोपीनाथ कविराज 1910 में काशी आए। अध्ययन के बाद 1914 में वे राजकीय संस्कृत कॉलेज में सेवारत हुए और 1937 में स्वैच्छिक अवकाश लिया। 1934 में उन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि मिली। 1964 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसी वर्ष उनकी कृति तान्त्रिक वांग्मय में शाक्त दृष्टि को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1971 में वे साहित्य अकादमी के फेलो चुने गए। उनकी विद्वत्ता केवल संस्कृत साहित्य तक सीमित नहीं थी। वे वेदांत, न्याय, सांख्य-योग, बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव और तांत्रिक परंपराओं के गंभीर अध्येता थे। लेकिन उनकी जिज्ञासा ग्रंथों से आगे बढ़कर अनुभूति तक पहुंचती थी। वे यह समझना चाहते थे कि जिन सिद्धांतों का वर्णन शास्त्रों में है, उनका साधना और अनुभव के स्तर पर क्या स्वरूप है।

इसी खोज में 1918 में उनका संपर्क स्वामी विशुद्धानंद परमहंस से हुआ और वे उनके शिष्य बने। इस गुरु-शिष्य संबंध ने उनके जीवन को नया आयाम दिया। स्वामी विशुद्धानंद को उनके अनुयायी गंधी बाबा के नाम से भी स्मरण करते हैं। उनकी साधना-परंपरा में सूर्य विज्ञान का विशेष उल्लेख मिलता है। कविराज जी ने भी इस विषय पर लिखा। इस परंपरा में सूर्य विज्ञान को सूर्य की ऊर्जा और उसके सूक्ष्म प्रभावों से संबंधित एक गूढ़ साधना-विधि माना गया।

सूर्य विज्ञान से जुड़े अनेक असाधारण प्रसंग परंपरा में मिलते हैं। आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर इन्हें प्रमाणित वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं माना जा सकता। इसलिए इनका उल्लेख आध्यात्मिक साधना-परंपरा के संदर्भ में ही उचित है। फिर भी इस विषय के प्रति कविराज जी की जिज्ञासा उनके ज्ञान-बोध की व्यापकता को दर्शाती है। वे भारतीय ज्ञान की उन धाराओं को भी समझना चाहते थे, जिन्हें सामान्यतः रहस्य या लोकविश्वास कहकर छोड़ दिया जाता है। इसी संदर्भ में ज्ञानगंज का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय योग और साधना-साहित्य में ज्ञानगंज को एक गुप्त सिद्धभूमि या सिद्धाश्रम के रूप में वर्णित किया गया है। स्वामी विशुद्धानंद की साधना-परंपरा को भी इससे जोड़ा जाता है। पंडित गोपीनाथ कविराज ने सिद्धभूमि ज्ञानगंज और उससे जुड़ी आध्यात्मिक परंपराओं पर लिखा।

कविराज जी की विशेषता थी कि उन्होंने तंत्र और योग को केवल चमत्कार या रहस्य की दृष्टि से नहीं देखा। वे आधुनिक शिक्षा से प्रशिक्षित विद्वान थे, लेकिन भारतीय गुरु-परंपरा और साधना को भी गंभीरता से समझते थे। उनके व्यक्तित्व में शास्त्रीय अनुशासन और आध्यात्मिक अनुभव का ऐसा संतुलन दिखाई देता है, जो विरल है। काशी उनकी कर्मभूमि और भारतीय विद्या का जीवंत केंद्र थी। सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद उनका जीवन अध्ययन, लेखन और साधना में अधिक गहराई से लगा। उन्होंने अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया और योग, तंत्र तथा शैव दर्शन के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े रहे। बाद के वर्षों में उनका संबंध श्री आनंदमयी माँ से अत्यंत निकट हुआ। जीवन के अंतिम चरण में वे उनके आश्रम से जुड़े रहे और 12 जून 1976 को उनका निधन हुआ।

आज गोपीनाथ कविराज की प्रासंगिकता इसलिए और बढ़ जाती है कि वे परंपरा को आंख मूंदकर स्वीकार करने और आधुनिकता के नाम पर उसे पूरी तरह खारिज करने, दोनों अतियों से अलग दिखाई देते हैं। वे परंपरा के भीतर उतरकर उसके दर्शन, अनुभव और अंतर्निहित प्रश्नों को समझने वाले मनीषी थे। ज्ञानगंज, सूर्य विज्ञान और स्वामी विशुद्धानंद की परंपरा को भी इसी विवेकपूर्ण दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। इनके चमत्कारिक दावों की सत्यता पर बहस अपनी जगह है, लेकिन इनके पीछे मौजूद भारतीय जिज्ञासा महत्वपूर्ण है। यह जिज्ञासा पूछती है कि क्या मनुष्य का ज्ञान केवल बाहरी प्रकृति तक सीमित है या चेतना और अनुभूति के भी ऐसे आयाम हैं, जिनकी अपनी खोज-पद्धति हो सकती है। गोपीनाथ कविराज की यात्रा अंततः किसी रहस्यमय स्थान तक पहुंचने की यात्रा ही नहीं, ज्ञान के विभिन्न आयामों को समझने की यात्रा थी। शास्त्र से साधना और साधना से अनुभूति तक फैली उनकी यह यात्रा उन्हें भारतीय मनीषा की परंपरा में विशिष्ट स्थान देती है। उनका जीवन आज भी यह संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान मनुष्य को अधिक विनम्र, व्यापक और स्वयं की खोज के लिए अधिक सजग बनाता है।

(लेखक डॉ. एस.के. गोपाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)