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कथा मंच से रामभद्राचार्य ने डा. नीरज बोरा को दिया ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद

लखनऊ (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। सीतापुर रोड स्थित बृज की रसोई परिसर में आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा महोत्सव के विश्राम दिवस पर मंगलवार को जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने लक्ष्मण टीला के मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय व्यक्त करते हुए कहा कि “लक्ष्मण टीला हमारा था, हमारा है और हमारा ही रहेगा।” उन्होंने इस संबंध में स्थानीय विधायक डॉ. नीरज बोरा को जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि इस स्थान को खाली कराने का कार्य आगे बढ़ाया जाए।

कथा मंच पर डॉ. नीरज बोरा को माला पहनाकर आशीर्वाद देते हुए रामभद्राचार्य ने कहा, “बेटे, मैं तुम्हें एक कार्य दे रहा हूं। लक्ष्मण टीला हमें खाली कराना है।” उनके इस वक्तव्य पर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक प्रतिक्रिया दी।

कार्यक्रम के दौरान एक भावनात्मक और हल्का-फुल्का प्रसंग भी देखने को मिला। रामभद्राचार्य ने मुस्कुराते हुए डॉ. नीरज बोरा का चश्मा पहन लिया। इसके बाद उन्होंने डॉ. बोरा की पत्नी बिंदु बोरा की ओर देखते हुए मजाकिया अंदाज में कहा, “ये क्या किया मैंने?” कुछ क्षण बाद चश्मा उतारकर वापस करते हुए उन्होंने कहा, “इसमें मैंने कुछ डाल दिया है।” इस पर पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं के बीच हंसी और आनंद का माहौल बन गया।

रामभद्राचार्य ने बिंदु बोरा को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे सदैव डॉ. नीरज बोरा के साथ खड़ी रहें। उन्होंने कहा, “ये मेरे बेटे-बहू हैं। कथा तो अपनी जगह है, लेकिन जीवन भर नीरज और बिंदु मेरे बेटे-बहू रहेंगे।”

अपने संबोधन में उन्होंने कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं से भी भावनात्मक अपील की। उन्होंने कहा कि वे डॉ. नीरज बोरा और बिंदु बोरा को जनता के हाथों सौंप रहे हैं और आग्रह किया कि आगामी चुनाव में उन्हें पुनः विजयी बनाया जाए।

रामभद्राचार्य ने कहा कि यदि जनता का आशीर्वाद बना रहा तो डॉ. नीरज बोरा को मंत्री बनाया जाएगा। उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा कि लक्ष्मण टीला से जुड़े विवाद का समाधान होगा, वहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया जाएगा और वह स्वयं लक्ष्मण टीला पर श्रीरामकथा करने आएंगे। उन्होंने कहा, “मैं वचन देता हूं कि उस दिन लक्ष्मण टीला पर कथा होगी।”

रामकथा महोत्सव के विश्राम दिवस पर रामभद्राचार्य के वक्तव्यों को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। कथा स्थल पर बड़ी संख्या में भक्त उपस्थित रहे और उन्होंने संत के आशीर्वचन एवं विचारों को श्रद्धापूर्वक सुना।