(डा. एस.के. गोपाल)
इतिहास केवल बीते समय का लेखा-जोखा नहीं होता। इतिहास समाज की स्मृति होता है। इतिहास भविष्य का मार्गदर्शक भी होता है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने युग की सीमाओं से आगे निकल जाते हैं। वे केवल व्यक्ति नहीं रहते, विचार बन जाते हैं। महाराजा सुहेलदेव ऐसे ही राष्ट्रनायक हैं। उनका जीवन शौर्य की गाथा है। उनका संघर्ष राष्ट्रचेतना का प्रतीक है। उनकी विजय भारतीय समाज की संगठन शक्ति का प्रमाण है।
10 जून को मनाया जाने वाला महाराजा सुहेलदेव विजय दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं है। यह भारतीय स्वाभिमान का उत्सव है। यह उस चेतना का अभिनंदन है जिसने विदेशी आक्रमणों के सामने झुकने से इनकार किया। यह उस परंपरा का स्मरण है जिसने राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा को सर्वोच्च कर्तव्य माना।
ग्यारहवीं शताब्दी का भारत अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ था। उत्तर-पश्चिम से विदेशी आक्रमण लगातार हो रहे थे। राजनीतिक शक्तियां बिखरी हुई थीं। समाज भी अनेक स्तरों पर विभाजित था। ऐसे समय में विदेशी शक्तियों को अवसर मिलता है। इतिहास साक्षी है कि जब भी समाज अपनी सामूहिक शक्ति को भूलता है, संकट गहराते हैं। जब समाज संगठित होता है, तब परिस्थितियां बदल जाती हैं।
महाराजा सुहेलदेव की सबसे बड़ी विशेषता उनका नेतृत्व था। उन्होंने केवल युद्ध नहीं लड़ा। उन्होंने समाज को जोड़ा। उन्होंने लोगों में आत्मविश्वास जगाया। उन्होंने यह विश्वास पैदा किया कि राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा सामूहिक प्रयास से ही संभव है। यही कारण है कि उनका नाम केवल एक योद्धा के रूप में नहीं बल्कि एक संगठक और जननायक के रूप में भी लिया जाता है।
बहराइच का युद्ध भारतीय जनस्मृति में विशेष स्थान रखता है। परंपरागत विवरणों के अनुसार विदेशी सेनानायक सालार मसूद उर्फ गाज़ी मियां उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। उस समय महाराजा सुहेलदेव ने प्रतिरोध का नेतृत्व किया। उन्होंने अनेक स्थानीय शक्तियों को साथ लेकर संघर्ष का आह्वान किया। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था। यह सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का संघर्ष था।
युद्ध में प्राप्त विजय ने यह सिद्ध किया कि संगठन किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति है। बिखरी हुई शक्तियां कमजोर होती हैं। संगठित शक्तियां इतिहास बदल देती हैं। यही संदेश महाराजा सुहेलदेव के जीवन का केंद्रीय संदेश है। आज भी यह उतना ही प्रासंगिक है जितना एक हजार वर्ष पहले था।
वर्तमान समय में भारत आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। देश अपनी सांस्कृतिक विरासत को नए दृष्टिकोण से देख रहा है। लंबे समय तक इतिहास के अनेक नायक उपेक्षित रहे। उनकी गाथाएं लोक स्मृतियों में तो जीवित रहीं किंतु राष्ट्रीय विमर्श में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। महाराजा सुहेलदेव ऐसे ही नायकों में शामिल हैं। आज उनका स्मरण केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह अपने राष्ट्रीय चरित्र को समझने का प्रयास भी है।
महाराजा सुहेलदेव का जीवन एक और महत्वपूर्ण संदेश देता है। राष्ट्र की शक्ति केवल शासन या सेना से नहीं बनती। राष्ट्र की वास्तविक शक्ति समाज में होती है। समाज जागृत हो, संगठित हो और अपने मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं रहती। इतिहास में जितनी भी निर्णायक विजय हुई हैं, उनके पीछे समाज की सामूहिक शक्ति रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी अपने इतिहास के ऐसे प्रेरणादायी अध्यायों से परिचित हो। इतिहास का उद्देश्य केवल तिथियां और घटनाएं याद रखना नहीं है। इतिहास का उद्देश्य प्रेरणा ग्रहण करना है। यदि महाराजा सुहेलदेव का जीवन हमें संगठन, साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरणा देता है, तभी उनका स्मरण सार्थक होगा। महाराजा सुहेलदेव विजय दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम अपने इतिहास के उन अध्यायों को पुनः पढ़ें जिनमें संघर्ष है, त्याग है, संगठन है और विजय है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रीय स्वाभिमान किसी एक पीढ़ी की देन नहीं होता। इसके लिए अनेक पीढ़ियों ने संघर्ष किया है। अनेक वीरों ने अपना सर्वस्व समर्पित किया है। महाराजा सुहेलदेव उसी गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उनका जीवन बताता है कि चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी हों, यदि समाज संगठित हो और नेतृत्व दृढ़ हो तो विजय निश्चित होती है। यही कारण है कि उनका नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। महाराजा सुहेलदेव का शौर्य इतिहास का विषय है। उनका संदेश वर्तमान की आवश्यकता है। उनका आदर्श भविष्य का पथप्रदर्शक है।

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