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स्वच्छ ऊर्जा से रोशन हुआ पसका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिली नई रफ्तार

गोंडा (शम्भू शरण वर्मा/टेलीस्कोप टुडे)। उत्तर प्रदेश के दूरदराज ग्रामीण इलाकों में बिजली संकट अब व्यवसाय की राह में बाधा नहीं बन रहा है। सोलर माइक्रोग्रिड और बायोगैस आधारित समाधान ने न केवल बिजली की समस्या को दूर किया है, बल्कि ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी आगे बढ़ाया है। इसका सजीव उदाहरण गोंडा जिले के परसपुर ब्लॉक के पसका क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जो जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है।

यहां स्थापित सोलर माइक्रोग्रिड और बायोगैस व्यवस्था ने गांवों को रोशन करने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति दी है। टाटा पावर कंपनी लिमिटेड की सहायक कंपनी टीपी रिन्यूएबल माइक्रोग्रिड द्वारा संचालित यह पहल ग्रामीण समुदायों के सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

दिसंबर 2020 में पसका गांव में 30 किलोवाट पीक (kWp) क्षमता का सोलर माइक्रोग्रिड स्थापित किया गया था, जिसे बढ़ती मांग को देखते हुए अब 50 kWp कर दिया गया है। इस विस्तार के बाद करीब 150 उपभोक्ताओं को स्वच्छ, किफायती और निर्बाध बिजली उपलब्ध हो रही है। इस बिजली से किराना दुकानें, चाय-नाश्ते की दुकानें, मिठाई प्रतिष्ठान, भोजनालय, आटा चक्कियां और डेयरी केंद्र सुचारु रूप से संचालित हो रहे हैं।

पसका बाजार अब क्षेत्रीय दुग्ध मूल्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां आसपास के 5 से 10 किलोमीटर के दायरे से दूध एकत्र कर बल्क मिल्क कूलर्स (BMCs) में संग्रहित किया जाता है। बाजार में स्थापित पांच BMC में से तीन अब माइक्रोग्रिड से संचालित हो रहे हैं, जिससे दूध के सुरक्षित भंडारण और खराब होने की समस्या में कमी आई है।

स्थानीय उद्यमियों को भी इस पहल से सीधा लाभ मिला है। राहुल दूध डेरी के संचालक राहुल यादव ने बताया कि दिसंबर 2020 से पहले उन्हें जनरेटर के सहारे काम करना पड़ता था, लेकिन अब सौर ऊर्जा से निर्बाध बिजली मिलने से हर महीने लगभग 10 हजार रुपये की बचत हो रही है।

वहीं विश्वकर्मा फैब्रिकेटर्स के संचालक कृष्णा कुमार विश्वकर्मा के अनुसार, पहले जहां डीजल पर 10 हजार रुपये से अधिक खर्च होता था, अब यह घटकर लगभग आधा रह गया है।

इसके साथ ही, टीपी रिन्यूएबल माइक्रोग्रिड बायोगैस आधारित छोटे समाधान भी विकसित कर रहा है। यह पहल विशेष रूप से किसानों के लिए लाभकारी है, जिससे वे गोबर को कच्चे बायोगैस में बदलकर खाना पकाने के लिए उपयोग कर सकते हैं और जमीनी स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं।

हाल ही में, पसका से लगभग 2 किलोमीटर दूर नयाबपुरवा बस्ती में किसान उदय भान सिंह द्वारा 2 घन मीटर क्षमता का बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया है, जिससे उन्हें खाना पकाने के लिए गैस के साथ-साथ जैविक खाद भी प्राप्त हो रही है।

करीब 2,500 परिवारों की आबादी वाले पसका क्षेत्र में पहले बिजली की अनियमित आपूर्ति और डीजल जनरेटर पर निर्भरता आम बात थी। साथ ही, बाढ़ का खतरा भी हर साल बना रहता है। ऐसे में डेयरी व्यवसाय यहां की आजीविका का प्रमुख साधन है, जिसमें दूध का संग्रह और शीतलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह पहल न केवल व्यवसायों के स्थायित्व को सुनिश्चित कर रही है, बल्कि उत्पादकता बढ़ाने और आय के नए अवसर भी सृजित कर रही है। साथ ही, हर वर्ष लगभग 16 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रही है।

टीपी रिन्यूएबल माइक्रोग्रिड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज गुप्ता ने कहा कि कंपनी स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में दीर्घकालिक परिवर्तन लाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि पसका माइक्रोग्रिड परियोजना इस बात का उदाहरण है कि एकीकृत नवीकरणीय ऊर्जा समाधान कैसे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाते हुए ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ा सकते हैं और पारंपरिक ईंधनों का प्रभावी विकल्प बन सकते हैं।