(श्रीधर अग्निहोत्री)
भगवान परशुराम सनातन परंपरा में विष्णु के एक अवतार के रूप में पूज्य माने जाते हैं। उनका स्वरूप किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समस्त समाज के लिए आदरणीय हैं। यदि इतिहास और परंपरा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि उन्हें किसी विशेष समुदाय तक सीमित करने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत आधुनिक समय की देन है, जो प्रायः राजनीतिक और सामाजिक विमर्शों के प्रभाव में उभरी है।
भारतीय समाज की संरचना मूलतः समन्वयकारी और बहुस्तरीय रही है। यदि ब्राह्मण समाज स्वभावतः संकीर्ण जातिवाद का परिचायक होता, तो भारतीय सांस्कृतिक चेतना में राम और कृष्ण जैसे लोकनायक सर्वोच्च स्थान प्राप्त न कर पाते। समाज ने सदैव उन आदर्शों को वरण किया है, जो मर्यादा, करुणा, नीति और धर्म के संतुलन को स्थापित करते हैं। यही कारण है कि रावण जैसे महाविद्वान होते हुए भी अहंकार और अधर्म के प्रतीक के रूप में स्थापित हुए, और उनके दहन के माध्यम से समाज ने धर्म की विजय का संदेश ग्रहण किया।
इस सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने में संत-परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया और समाज को एक संतुलित जीवन-दृष्टि प्रदान की। उन्होंने शक्ति और प्रतिशोध की अपेक्षा धर्म, संयम और करुणा को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि जनमानस में राम का स्वरूप व्यापक और स्थायी रूप से स्थापित हुआ।
परशुराम का चरित्र भी अपने आप में अद्वितीय है—वे अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध और धर्म की पुनर्स्थापना के प्रतीक हैं। उनके जीवन का उग्र और संघर्षशील पक्ष तत्कालीन परिस्थितियों की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। किंतु यही उग्रता सामान्य जनजीवन के लिए अनुकरणीय आदर्श के रूप में व्यापक रूप से स्थापित नहीं हो सकी। इसी कारण वे श्रद्धा और सम्मान के पात्र तो हैं, परंतु जनसामान्य की आराधना में राम और कृष्ण की तरह सर्वव्यापक रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो पाए।
यह भी उल्लेखनीय है कि परंपरागत ब्राह्मण परिवारों में आराधना का केंद्र प्रायः राम, कृष्ण या अन्य लोकमंगलकारी देवताओं को ही बनाया जाता है। परशुराम के प्रति श्रद्धा अवश्य बनी रहती है, किंतु उनकी पूजा अपेक्षाकृत सीमित रूप में दिखाई देती है। विभिन्न क्षेत्रों में उनके मंदिर और पूजा-परंपराएं विद्यमान हैं, परंतु वे दैनिक आराधना के व्यापक स्वरूप का हिस्सा कम ही बन पाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण समाज ने स्वयं भी उन्हें किसी संकीर्ण दायरे में सीमित नहीं किया, बल्कि व्यापक सामाजिक समन्वय और लोककल्याणकारी आदर्शों को प्राथमिकता दी।
सनातन धर्म की मूल भावना समावेश, संतुलन और लोककल्याण की है। इसमें किसी भी देवता या अवतार को संकीर्णता के घेरे में बाँधना उसकी मूल आत्मा के विपरीत है। परशुराम हों या राम, कृष्ण हों या शिव—सभी स्वरूप उसी व्यापक सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं, जो मानवता को जोड़ने का संदेश देती है, न कि विभाजन का।

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