हर वर्ग में फैल रही लिवर बीमारी, महिलाओं में भी तेजी से बढ़ रहे केस
नई दिल्ली (टेलीस्कोप टुडे संवाददाता)। भारत लिवर (यकृत) के स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी समस्या का सामना कर रहा है जो लगातार बढ़ रही है, लेकिन इस पर अभी बहुत ध्यान नहीं गया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, एनएएफएलडी (नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिज़ीज़) से 9% से 32% आबादी प्रभावित है, यानी हर तीन में से लगभग एक व्यक्ति इसकी चपेट में है, और इसे अब एक ‘अनदेखी महामारी’ माना जा रहा है।
लिवर से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का विभिन्न वजहों से होने वाली कुल मौत में 66% से अधिक का योगदान है और इलाज के बढ़ते खर्च की वजह से यह बड़ा आर्थिक बोझ बनाता जा रहा है। भारत ने एनएएफएलडी की स्क्रीनिंग को अपने एनपी-एनसीडी (गैर-संक्रामक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम) में शामिल कर लिया है, लेकिन इस सरकारी पहल के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी मज़बूत आर्थिक तैयारी होना बेहद ज़रूरी है।
‘विश्व लिवर दिवस’ के अवसर पर केयर हेल्थ इंश्योरेंस के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि व्यक्तिगत और पारिवारिक, दोनों ही स्तरों पर यह चुनौती गंभीर है। विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले तीन साल में लिवर से जुड़े दावे दोगुने हो गए हैं; इसकी मुख्य वजह इलाज की बढ़ती जटिलताएं और भौगोलिक व जनांकिकी (डेमोग्राफिक) स्तर पर इसका लगातार बढ़ता दायरा है। आज, लिवर की बीमारियों के इलाज का खर्च 3 साल पहले के मुकाबले लगभग 100% ज़्यादा हो गया है। दावे के अनुभव से ज़ाहिर होता है कि लिवर की बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कम से कम ₹15 लाख या उससे ज़्यादा का स्वास्थ्य बीमा कवर होना अब एक ज़रूरी मानक (बेसलाइन) बनता जा रहा है।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि युवा पॉलिसीधारकों में लिवर की बीमारियों के मामलों में साल-दर-साल 5–10% की बढ़ोतरी हो रही है। साथ ही टियर 2 और टियर 3 शहरों से आने वाले दावों में हर साल 10-15% की बढ़ोतरी हो रही है और महिला पॉलिसीधारकों के दावे साल-दर-साल लगभग 10% की दर से बढ़ रहे हैं। इन आंकड़ों से यह रेखांकित होता है कि लिवर की बीमारी अब केवल बुज़ुर्गों, पुरुषों या महानगरों (मेट्रो) तक ही सीमित नहीं रह गई है।
केयर स्वास्थ्य इंश्योरेंस के मुख्य परिचालन अधिकारी मनीष डोडेजा ने इन निष्कर्षों पर अपनी टिप्पणी में कहा, “लिवर की बीमारी अब कुछ जोखिम वाले क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि तेज़ी से फैल रही हैं और यह चिंताजनक है। हमने इन बीमारियों के स्वरूप के साथ-साथ तीव्रता में भी स्पष्ट बदलाव देखा है। मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है, युवा प्रभावित हो रहे हैं और परिवारों पर इसका वित्तीय बोझ काफी बढ़ रहा है। यह केवल नैदानिक समस्या नहीं है, बल्कि यह आर्थिक समस्या भी बनती जा रही है। इसलिए लोगों के लिए समय-समय पर अपने स्वास्थ्य बीमा की समीक्षा करना और यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि उनकी बीमा राशि इन बढ़ते जोखिमों के अनुरूप हो। जागरूकता, शीघ्र निदान और वित्तीय तैयारी का समरूप होना आवश्यक है कि जोखिम और तैयारी के बीच का अंतराल न बढ़े।”
ये अवलोकन व्यापक नैदानिक और महामारी विज्ञान संबंधी निष्कर्षों के अनुरूप हैं। भारतीय बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंटरोलॉजी मानकों पर आधारित हालिया नैदानिक दिशानिर्देश के मुताबिक फैटी लिवर रोग बच्चों में, विशेष रूप से मोटापे और संबंधित चयापचय (मेटाबॉलिक) से जुड़े जोखिम कारकों जूझ रहे बच्चों में, दीर्घकालिक लिवर रोग के प्रमुख कारण के रूप में तेज़ी से उभर रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी ऑब्ज़र्वेटरी के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो 2040 तक लगभग 1.19 करोड़ भारतीय बच्चे लिवर संबंधी रोग से पीड़ित हो सकते हैं, जिससे स्पष्ट है कि जीवनशैली और आहार संबंधी जोखिम हर आयु वर्ग के लिए बड़ी चिंता का विषय है।
उपचार के बढ़ते खर्च और देखभाल की जटिल प्रक्रियाओं के कारण लिवर संबंधी रोग आज भारतीय परिवारों के लिए सबसे अधिक आर्थिक बोझ डालने वाले रोगों में से एक बन गया है। विश्व लिवर दिवस पर, केयर हेल्थ इंश्योरेंस हर व्यक्ति से आग्रह करता है कि वे सक्रियता से जांच करवाएं, स्वस्थ आदतें अपनाएं और निदान से पहले अपने स्वास्थ्य बीमा की समीक्षा करें।
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