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सुरक्षा, संवाद और आपसी सहयोग : कर्मचारी कल्याण के तीन मुख्य आधार

मेघा गोयल

स्क्रोल करना, लाइक करना और शेयर करना—आजकल हर तरफ बनावटी जीवन की चमक दिखाई देती है। हर जगह बेहतरीन तस्वीरें, जश्न और आसान दिखने वाली दिनचर्या का बोलबाला है। हम में से बहुत से लोगों के लिए यह सिलसिला काम शुरू होने से काफी पहले शुरू हो जाता है और काम खत्म होने के बहुत बाद तक चलता रहता है। ऑफिस की डेडलाइन और काम के बीच, सोशल मीडिया पर रील्स की एक अंतहीन धारा बहती रहती है, जैसे सूर्यास्त के समय योग, सजे-धजे होम ऑफिस और बिना मेहनत के मिली करियर की सफलताएं। ये चीजें हमें धीरे से अहसास कराती हैं कि ‘आप पर्याप्त मेहनत नहीं कर रहे हैं।’

जब कर्मचारी काम के दबाव में होते हैं, तो ये तुलना अंदर ही अंदर हीन भावना को बढ़ा सकती है। लेकिन असली बात यह नहीं है कि लोग क्या देखते हैं, बल्कि यह है कि वे हर दिन काम पर क्या महसूस करते हैं। जो दिखता नहीं है, वह है संघर्ष, आत्म-संदेह और उन पलों के पीछे की मेहनत।

वर्कप्लेस डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट के अनुसार, 76% कर्मचारी खुलकर बोलने में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, यानी हर चार में से एक कर्मचारी चुप रहता है। जब कर्मचारी पहले से ही खुद को बेअवाज़ महसूस करते हैं, तो ऑनलाइन दिखने वाली दूसरों की जीत उन्हें और पीछे छूट जाने का अहसास कराती है, जिससे उनकी उत्पादकता और मानसिक मजबूती कम होने लगती है।

यही कारण है कि कर्मचारी कल्याण को केवल प्रोग्राम या सुविधाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यह हमारे रोजमर्रा के व्यवहार और नेतृत्व के तरीके से तय होता है। ऑफिस में कल्याण के तीन सरल लेकिन शक्तिशाली स्तंभ हैं: पहचाना जाना (Seen), सुना जाना (Heard) और सहयोग मिलना (Supported)। रियल एस्टेट कंपनियों सहित अन्य क्षेत्र भी अब यह मान रहे हैं कि कर्मचारी कल्याण को अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसका समाधान कल्याण को संगठन की बुनियादी रणनीति का हिस्सा बनाने में है। 

आज रियल एस्टेट कंपनियाँ भी समझ रही हैं कि कर्मचारी कल्याण को अलग करके नहीं देखा जा सकता। समाधान यह है कि कल्याण को संगठन की रणनीति की नींव में शामिल किया जाए। सबसे पहले, संगठनों को सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए—सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक (मनोवैज्ञानिक) सुरक्षा भी।

अग्रणी कंपनियाँ अपनी कार्य संस्कृति पर फिर से विचार कर रही हैं और ऐसे कदम उठा रही हैं जो कर्मचारियों की ज़रूरतों को पूरा करें—जैसे लचीलापन, काम और निजी जीवन का संतुलन, और करियर विकास। साथ ही, वे डेटा के आधार पर महिलाओं, अलग-अलग आयु वर्ग, विभिन्न समुदायों और दिव्यांग लोगों की भागीदारी और समावेशन को बढ़ा रही हैं।

यह पूछना ज़रूरी है:

क्या कर्मचारी खुद को उनके असली रूप और योगदान के लिए देखा गया महसूस करते हैं?

क्या वे अपनी कमजोरी के समय सुने जाते हैं?

क्या मुश्किल समय में उन्हें सहयोग मिलता है?

पहचाना जाना – पहचाने जाने का मतलब सिर्फ नजर आना नहीं है, बल्कि यह सम्मान और देखभाल के बारे में है। कर्मचारी तब अच्छा महसूस करते हैं जब उनके नतीजों के साथ-साथ उनकी मेहनत को भी सराहा जाता है। जब मैनेजर प्रगति और संघर्ष को नोटिस करते हैं, तो लोगों को अपनी अहमियत महसूस होती है। आभार व्यक्त करने की संस्कृति बहुत मायने रखती है। जीत का जश्न सिर्फ बड़ी उपलब्धियों के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि छोटी जीत और पर्दे के पीछे की मेहनत को भी पहचान मिलनी चाहिए। जब लोग खुद को अदृश्य महसूस करते हैं, तो वे काम से कटने लगते हैं, लेकिन पहचाने जाने पर उनमें अपनेपन की भावना बढ़ती है।

सुना जाना (Heard) – सुने जाने का अर्थ है बिना किसी डर के अपनी आवाज उठाना। कर्मचारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी राय मायने रखती है और बोलने पर उन्हें किसी नुकसान का सामना नहीं करना पड़ेगा। कंपनियों को सिर्फ फीडबैक इकट्ठा करने के लिए नहीं, बल्कि उस पर कार्रवाई करने के इरादे से सुनना चाहिए। 

इसके लिए ऐसे माहौल की जरूरत है जहां लोग अपने विचार और शंकाएं विश्वास के साथ रख सकें। जब नेता मतभेदों का स्वागत करते हैं और अनिश्चितता को स्वीकार करते हैं, तो भरोसा मजबूत होता है। 

सुना जाना जिम्मेदारी का अहसास कराता है और ऐसी संस्कृति बनाता है जहां ईमानदारी का सम्मान होता है।

सहयोग मिलना – सहयोग ही सिद्धांतों को हकीकत में बदलता है। लचीलापन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और छुट्टी की स्पष्ट नीतियां कंपनी के नेक इरादों को दर्शाती हैं। लेकिन सहयोग का सबसे मजबूत अनुभव मैनेजरों के माध्यम से होता है। मैनेजरों की वह क्षमता, जिससे वे मानसिक सुरक्षा का माहौल बनाते हैं और तनाव के शुरुआती लक्षणों को पहचानकर सहानुभूति दिखाते हैं, कर्मचारी के अनुभव को परिभाषित करती है। सहयोग का अर्थ मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना और यह स्वीकार करना भी है कि कर्मचारी ऑफिस में अपनी व्यक्तिगत चुनौतियों के साथ आता है।

जब टीमें बिना किसी डर के अपनी परेशानियां साझा कर पाती हैं, तो उनका आपसी जुड़ाव गहरा होता है। इसे बनाए रखने के लिए कंपनियों को अपने मूल्यांकन के तरीकों को बदलना होगा। सिर्फ उत्पादकता के आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते; तनाव का स्तर, भरोसा और मानसिक सुरक्षा जैसे संकेतक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ये जानकारियां नेतृत्व को सही समय पर कदम उठाने और एक स्वस्थ कार्यस्थल बनाने में मदद करती हैं। ये उपाय तुलना की संस्कृति के बोझ को कम करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हर आवाज को जगह मिले। संदेश स्पष्ट है: एक ईमानदार कार्य संस्कृति बनाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि एक टिकाऊ इमारत बनाना। ऐसी दुनिया में जो परफेक्शन का जश्न मनाती है, कार्यस्थलों को वास्तविकता और सच्चाई की जगह बनना चाहिए, जहां लोग हर दिन सुरक्षित और समर्थित महसूस करें।

(लेखिका मेघा गोयल, गोदरेज प्रॉपर्टीज़ लिमिटेड की CHRO हैं और ये उनके निजी विचार हैं)